
महंगाई रे महंगाई
मार गई ये महंगाई
दाना-पानी छीन गया मेरा
दे गई मुझको ये तनहाई
ना मुझको अब काम मिले
ना मुझको आराम मिले
दौड़ा-दौड़ा फिरता हर दिशा
फिर भी ना कोई राम मिले
क्या मीठा ये मन होगा
कड़वा सारा जग होगा
की बादल है छाई
भीगा इससे जो तन होगा
क्या हम दौड़ेंगे जो सरपट
विकास की सीढ़ी क्या ख़ाक चढ़ेंगे
टूटी पड़ी होगी कमर हमारी
आतंकवाद से हम क्या ख़ाक लड़ेंगे
भ्रष्टाचार हर दिशाओं में है फैला
यहाँ पाप का भर गया है घैला
अब दौड़ प्रभु यहाँ आन लड़ो तुम
हर इंसानों/नेताओं का मन हो गया है मैला


shabd vinyas sahi hai, parantu chhand muktlekhani ko itni sahajta se nahi liya jaa sakta.
bhav tandra tut jaati hai…
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