कविता|2012/01/20 7:29 pm

नेता जी ! ऊब चुके हैं हम

केदारनाथ ”कादर”  (१९.०१.२०१२)

नेता जी ! ऊब चुके हैं हम

आपके मन लुभावन वायदों से

चांदनी चौक टू चाईना होने के

सपने बहुत सुंदर हैं आपके

लेकिन, आपके द्वारा खर्च हुए

करोड़ों रुपयों से मुझे क्या ?

मेरा विकास तो वहीँ का वहीँ है

तुम्हेंतोंद लग गयी है अब

कपडे भी ज्यादा साफ़ हो गए हैं

मुस्कान चिपक गयी है गाली पे भी

अब तुमहमनहीं रहे शायद

तुम्हारे विकास की प्रस्तावित सड़कें

मेरा घर पहले ही निगल गयी हैं

अब तो मेरे पैर के जूते भी

मुआवजे हेतु चक्कर लगाते-लगाते

खा चुकी है ये  तुम्हारी सरकार

मैं जूते का छेद तुम्हें कैसे दिखाऊँ ?

तुम्हारे चमचे तुम पर हमला मान लेंगे

पर, सच में मैं ऐसा ही चाहता हूँ

मेरी आशIओं के कातिल तुम्हें

मैं सच में जूता मारना चाहता हूँ


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