एक ठूंठ और एक चील ,
देख रहे थे एक-दूसरे को .
एक शांत ,निर्लिप्त,
दूसरा, स्वच्छंद और चंचल .
एक की खामोशी,
दूसरे की वाचालता ,
क्या कुछ नहीं कहती थी !
शायद चिंतित थे दोनों ,
मनुष्य की चपलता से ,
या फ़िर प्रकृति की दशा पर .
और अब चील उड़ रहा है ,
नितांत अकेला, आसमां में ,
और ललकार रहा है ,
मनुष्य को उसकी कायरता पर .



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