: – कविता विकास
धुंध के उस पार जो प्रकाश -पूँज है
वह महज किरण नहीं इक आस है।
भेदकर अंधकार की शून्यता जो आती है ,
अरमानों की बगिया खिल -खिल जाती है ।
भला किस द्वार पे वसंत ताउम्र टिका है
पतझड़ का झंखाड़ बार -बार दस्तक देता है ।
जिस चौखट को लांघ खुशियाँ आती हैं
वहीँ से उदासियों की कतार खड़ी हो जाती है ।
सृजन का गणित ही ऐसा है
विनाश का अनुपात उसी जैसा है ।
जिस रोशनदान के पीछे रजनी गहराती है
आखिर वहीँ से छनकर रश्मि आती है।
समय के स्वर्णिम पन्ने पर मौज़ूद
नहीं है चिरकाल स्थायी कोई वज़ूद।
मिलन में छिपी है विरह – वेदना
समझ नहीं पाता इसे मानव चेतना ।
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आज फिर उड़ने की इच्छा हुई ।
आशाओं के पंख लगा कर
क्षितिज पर उगते सूरज की
लालिमा में डूबने की इच्छा हुई
वाष्प में परिणत होकर
नभ में तैरते पयोद की
कालिमा में घुसने की इच्छा हुई ।
फूलों के सुर्ख रंग चुराकर
फुनगी पर लगे कोपलों की
सम्वृद्धि में खोने की इच्छा हुई ।
चंद लम्हे व्यस्त घंटों से निकालकर
कुछ उनकी पीड़ा ,कुछ खुशियों की
परिधि में विचरने की इच्छा हुई ।
आज फिर उड़ने की इच्छा हुई ।


it was really nice go through these 2 wonderful poems depicting the inner feelings bounded in beautiful sequence of words…