अनवर सुहैल की कविता “चावल का दाना”

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पहले मैं भी
तुम्हारी तरह नहीं जानता था
बनता है कैसे चावल का एक दाना
मैं किसी करोडपति का बेटा नहीं
मैं महानगरों में पला-बढा नहीं
लेकिन मध्यमवर्गीय परिवार में 
जन्म लेने के कारण
हाथ पहुंच सुविधाओं के बीच
नहा नहीं पाया किसी नदी में 
आउटडोर संडास में लोटा लेकर गया नहीं
ढिबरी की रोशनी में पढा नहीं कभी
बारिश में चूते छानी के नीचे रहा नहीं कभी 
शायद इसीलिए 
जाना नहीं कभी किसान के दुख-दर्द
 
मैंने तो यही जाना था 
कि हर महीने की पहली तारीख को 
पिता होते उदार
क्योंकि घर में आती थी पगार
और फ़िर भर जाते घर के तमाम 
डब्बे-कनस्तर, राशन-पानी से
स्कूल फ़ीस का समय से होता भुगतान
और हमें क्या चाहिए…
कि सफ़र के दौरान 
ट्रेन या बस की खिडकी से दीखते खेत 
या सिनेमा में नज़र आते खेत खलिहान
यही तो था खेतों से परिचय हमारा
 
यह एक कठिन प्रक्रिया है दोस्त
बडी लम्बी साधना 
 
इसे मैंने जाना
खदान जाने के दौरान
खेतों के बीच से गुज़रते हुए
लगभग पांच माह की 
इबादत का फ़ल है चावल का एक दाना
 
किसानों की उम्मीदों के धूप-छांव का
किसानों के पसीने के छिडकाव का
मेहनतकश के गीतों की आरती का
होता है प्रतिफल चावल का एक दाना
 
जेठ माह के बाद 
कितनी शिद्दत से देखता किसान 
आग उगलता सूना आसमान
खोजता बादलों के निशान
निहारता खेत की मिट्टी
जो उसकी एडियों की तरह
दीखती कटी-फटी…
 
जब आप देखते ख्वाब 
रियल-स्टेट में इन्वेस्टमेंट का
किसान देखता स्वप्न 
पानी से भरे झूमते बादलों का
जब आप को होती चिन्ता 
सेंसेक्स में गिरावट की
किसान खेत जुताई के लिए रहता परेशान
उसे होती चिन्ता
बीज और खाद का कैसे होगा जुगाड
बरसे नहीं भगवान तो फिर
बिटिया के गौने का कैसे होगा इंतेज़ाम
कैसे पटेगा साहूकार का कर्ज़ श्रीमान
 
भारत किसानों का देश है
अच्छा है कि आप रहते हो इंडिया में
जहां चंद लोगों को 
एकदम नहीं होती जानकारी
कि बनता नहीं चावल का दाना किसी कारखाने में
कि कैसे धान की बालियों में आता है दूध 
कैसे पकती हैं धान की बालियां
कैसे लीप-पोत कर किया जाता तैयार खलिहान
कैसे धान हो किसान के मेहमान
 
तुम्हें भी मालूम होना चाहिए दोस्त
कि चावल के एक दाना
बनता कितनी मुश्किलों से है
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