वो पहला सफर

‘‘जिंदगी एक सफर है सुहाना, यहां कल क्या हो किसने जाना?’’ षायर ने जिंदगी की सच्चाई को कलम से कजग पर उतार, जीवित कर डाला है इन पंक्तियों ने। जिंदगी के कुछ सफर ऐसे भी होते हैं जो अपनी यादें छोड़ जाते हैं। ऐसी ही एक खुबसूरत सफर की याद आज भी मेरे जहन में है। बीएसएसी (वायो) और फिर पोस्ट ग्रेजूएषन (जर्नलिज्म) तक पूरी पढ़ाई मैंने अपने षहर में रहकर ही की थी।
उन दिनों यूनीवर्सिटी से जर्नलिज्म की पढ़ाई कर रहा था। तभी एक स्वास्थ्य विभाग के इंटेंस टेस्ट का काॅल लेटर आया। जिसके लिए मुझे लखनऊ जाना था। इससे पहले मैं कभी घर से अकेला इतनी दूर नहीं गया था। मेरे सहपाठियों में से किसी ने भी उस पोस्ट के लिए आवेदन नही किया था। तो टेस्ट देने के लिए मुझे लखनऊ अकेले ही जाना था।
बैसे तो पिताजी के साथ कई सफर किये थे पर यह सफर मेरे लिए बड़ा ही रोमांचक था। क्योंकि मैं इस बार अकेला ही जा रहा था। किसी ने सही कहा है कि दुनिया में रहने वाले लोग कभी तन्हा नहीं होते, यहां आने-जाने वालो का तांता लगा ही रहता है। ऐसा ही मेरे साथ हो रहा था। घर से अपने प्रिय मित्र को साथ लेकर निकला था। वह मुझे स्टेषन तक छोड़ने आया था। मुझे लग रहा था कि मैं अकेला ही लखनऊ तक जाऊंगा पर ऐसा नहीं हुआ। चिरगांव स्टेषन से कुछ दोस्त मेरे हमफर बने, रास्ता कब कट गया मुझे पता ही नहीं चला। सुबह होते ही मैं लखनऊ में था। वहां से अब मुझे अपने परीक्षा केन्द्र तक जाने के लिए रिक्सा किया और अपने निर्धारित समय से पहले ही मैं परी

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