बदलाव की कहानी

अक्सर हम कुछ लोगों से या कुछ चीजों से दूरी बना लेते हैं । कई बार बिना किसी कारण के उनसे धृणा करने लगते हैं । जिनके बारे में या तो हम अनभिज्ञ होते हैं या फिर हमारा पूर्वाग्रह उन पर हावी होता है। कई बार सिर्फ कही-सुनी बातों को मान कर हम किसी व्यक्ति या वस्तु के बारे में नकारात्मक नजरिया बना लेते हैं। कुछ लोगों से सुन लिया कि ये विषय कठिन है, यह आदमी खडूस बदमाश या खराब है, तो हम उसे देखने-परखने से पहले ही उससे भागना अधिक पसंद करते हैं । इसी प्रकार बिना स्वाद चखे हम कई तरह के पकवानों को कभी खाने नकार देते हैं। चाहे वह कितना ही स्वादिष्ट या उत्तम क्यों न हो। इसी प्रकार कई बार कुछ चीजों से हमारा लगाव इतना अधिक हो जाता है कि हम उसके मोह में अन्य विकल्पों की पूरी तरह से उपेक्षा करने लगते हैं।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में अध्ययन के दौरान ऊपर की एक-एक बातें हमें जानने का अवसर प्राप्त हुआ | हमारे एक मित्र ने जब विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया तो वे ऊर्जा , उत्साह और आत्मविश्वास से लबरेज थे । हर विषय पर उनकी एक स्पष्ट और प्रभावी राय हुआ करती थी । देश-दुनिया-समाज-संस्कृति सब पर प्रखर विचार। लेकिन कुछ चीजें थी जिन पर उनके पूर्वाग्रह हावी थे । भारतीय संस्कृति, यहां की भाषा , वेश-भूषा के प्रति उनका प्यार बड़ा ही जुनूनी था और आज भी है । हिंदी की जबरदस्त वकालत करने वाले हमारे उक्त मित्र के अनुसार अंग्रेजी जाने-समझे बगैर भी एक व्यक्ति सफलता के सभी मानदंडो को छू सकता है । सार्वजनिक बहसों में भी उनकी यह मुहिम जारी रही । इसी क्रम में अंग्रेजी से उनका रिस्ता पूरी तरह से कट गया । वे हिंदी में ही अपनी पहचान और भविष्य दोनों को बेहतर करने के प्रति संकल्प बद्ध थे । मेरे दबाव में उन्होने अंग्रेजी विषय तो ले लिया था लेकिन पूरे वर्ष वे शायद ही कभी अंग्रेजी की कक्षाओं में गये हों। ऐसी ही मान्यताओं ने उन्हे कंप्यूटर-इंटरनेट-ब्लाग यानी न्यू मीडिया से दूर रखा था । वो समय भारत में इंटरनेट की क्रांति के शुरुआत का समय था खासकर हिंदी ब्लागिंग की तो बिल्कुल नई शुरुआत थी। समय बीतता गया | वे जनसत्ता,इंडिया टुडे आदि में लिखते रहे लेकिन उन्होने अपना ईमेल आइई तक नहीं बनाया था। फिर पहल मैने ही की । मैने जबर्दस्ती उनकी एक ईमेल आइडी और एक ब्लाग बना दिया । फिर क्या था सच बोलना मना है और बाद में I Proud To Be A Bihari नाम के दो ब्लागों से उन्होने शुरुआत कर ही दी। कभी इन्टरनेट पर बैठने को समय की बर्बादी बताने वाला अब उसके जाल में खुद फंस चुका था । उसकी दीवानगी दिनों-दिन बढंती जा रही थी । अचानक ऐसा भूत सवार हुआ कि सब कुछ छोड़-छाड़ कर वह इंटरनेट और ब्लोगिंग का दीवाना हो गया । कभी की-बोर्ड पर हाथ न फेरने वाला व्यक्ति अचानक नया कंप्यूटर और इंटरनेट खरीद लेता है। उसे अंतरजाल अर्थात न्यू मीडिया की शक्ति और सुनहरे भविष्य का भान हो चुका था । उनका ब्लॉग इतना चर्चित होता है कि उन्हे उसे वेबसाइट में तब्दील करना पड़ता है। अब वे हिंदी के सबसे लोकप्रिय सुचना और विचार पोर्टलों में से एक के मुख्य कार्यकारी बन चुके हैं । जगह-जगह गोष्ठियों में न्यू मीडिया के गुण गाते फिरते हैं । इसकी पुरजोर वकालत करते हैं । न्यू मीडिया पर ही अपनी पहली किताब भी संपादित कर चुके हैं । अब नाम में क्या रखा है… वैसे ये कथा थी जयराम विप्लव की जो अब किसी परिचय के मोहताज नहीं है।

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2 Comments

  • main apne mitra ke bare me zyada pranshatmak hona pasand nahi karta…………abhi unhe lamba safar unhe tay karna hai…..isliye jayram ji jaise lambi race ke ghode ko pranshatmak afeem se yathasambhav door rakhna hi behtar hoga…………

  • Lagey Raho!! Jagaate Raho!! Jay Bhai Ko Shubhkaamnaayen..

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