पुस्तके पढ़ने का शौक कभी इतना भारी पढ़ेगा, सोचा भी नहीं था। प्रेम कथाओं को पढ़ने में बढ़ा ही आनन्द मिलता था। एक पुरसकुन की प्राप्ति होती है। ‘कसप’ पढ़ी थी तो बड़ा ही अच्छा लगा था, उस वक्त मैं भी एक शादी से लौटा था और कुछ वैसे ही हादसे मेरे साथ हुए थे इसलिए मैं खुश था, मगर अंत न जाने क्यों, मुझे अच्छा नहीं लगा। शायद इसलिए की मैं भी सामान्य पाठकों की तरह ही प्रेमी-प्रेमिकाओं के मिलन को ही कहानियों का अंत मानता हूँ । यहाँ मैं आपकों एक बात स्पष्ट कर दूं कि वास्तविक जीवन में मुझे प्रेम का व्यवहारिक ज्ञान था। मैंने कभी किसी के प्रति अपने प्रेम को इस हद तक गुज़रने ही नहीं दिया कि मैं उसके बिना जीने की कल्पना ही न कर सकूं । मैंने अपनी ज़िंदगी को एक रेलवे प्लेटफार्म की तरह माना था जिस पर हर रेलगाड़ी निश्चित समय पर आती थी और फिर निश्चित समय पर चली जाती थी। पता नहीं जाने वो कौन सी रेलगाड़ी होगी जिसका अंतिम स्टॉप मैं होऊंगा। बहरहाल, मैं आपसे एक ऐसी ही पुस्तक की चर्चा करना चाहता हूँ जिसने मुझे एक बार ये भी अहसास दिलाया था कि मैं भी कमज़ोर हूँ आम आदमी की तरह। लोग चाहे जो माने, मैं चाहे खुद के बारे में जो भी सोचूं । मैं भी एक कमज़ोर इंसान हूँ जो भावनाओं और भावुकताओं में बंधा है। और उसमें बंधे रहना बहुत पसंद करता है। मेरे व्यक्तितव पर न जाने किस शक्ति का अधिकार है कि आंसुओं ने तो साथ ही छोड़ दिया है। मगर फिर भी अगर आज कुछ आंसू गिर जाते तो शायद मेरा अपराध बोध कम हो जाता, मैं भी देवत्व की प्राप्ति कर पाता। मैंने धर्मवीर भारती का उपन्यास ‘‘गुनाहों का देवता’’ पढ़ा । पहली बार अहसास हुआ की प्रेम भी होता है और वह पवित्र भी होता है। इस पुस्तक को पढ़कर मैं क्या समझा ये तो मैं आपको शायद नहीं बता सकता मगर इतना ज़रूर बता सकता हूँ कि इस पुस्तक की समाप्ति ने मेरे अस्तित्व को इस कदर झिंझोड़ा है कि फिर कभी प्रेम कथा को पढ़ने से पहले दस बार ज़रूर सोचूंगा । अगर मेरे वश में रहा तो मैं उस पवित्र प्रेम की सौगंध खाकर कहता हूँ , मैं अब कभी किसी प्रेम कहानी को नहीं पढूंगा। इस पुस्तक से मेरा आर्कषण तो उस वक्त से बन गया था जब मित्रों द्वारा इसकी चर्चा सुनी थी, मगर पढ़ने का सौभाग्य अब जाकर प्राप्त हुआ था। 
सुधा जैसी जादूगरनी का सारा जादू ‘‘उसके दो उजले मासूम से पैरों’’ में था। जो इतने मासूम थे कि चन्दन के अंदर का वासना से ग्रसित जानवर भी उन्हें देखकर पवित्र हो गया और फिर उसने अपने गुनाहों की श्रमा याचना भी की। चन्दन जिस तरह से उन पैरो से प्यार करता था शायद उसी प्यार ने मेरे जैसे जानवर से इन शब्दों को लिखवाया कि मैंने भी कभी उस प्यार की पूर्णता का अहसास किया है मगर अब नहीं करना चाहता हूँ । क्योंकि न तो मैं वो देवता हूँ और न ही बनना चाहता हूँ । हाँ , कभी उस स्वर्गलोक के देवता ने कभी मुझसे मेरी आखिरी इच्छा पूछी तो उन्हीं उजले पैरों पर अपना सिर रखकर उस चिरनिंद्रा में सोना चाहूंगा ।
