स्मृति-लेख|2009/10/20 1:53 pm

उदबोधन का दूसरा कवि पैदा नहीं हुआ

                          janokti/ jayram/

 

"सुनूँ क्या सिंधु मैं गर्जन तुम्हारा, स्वयं युगधर्म का हुँकार हूँ मैं
                                                                   कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का, प्रलय गांडीव की टंकार हूँ मैं "

मानवीय आत्मबल को झकझोरने वाली उपरोक्त पंक्तियों के रचयिता , भारतीयों के स्वाभिमान को चिंगारी भरने वाले रामधारी सिंह दिनकर को राष्ट्र कवि होने का गौरव प्राप्त है।   बिहार के बेगुसराय जिले के सिमिरिया ग्राम में 23 सितंबर 1908 को जन्मे राष्ट्रकवि दिनकर के पिता श्री रवि सिंह एक साधारण किसान थे. इनकी माता का नाम मनरूप देवी था जो अशिक्षित व सामान्य महिला होने के बावजूद, जीवटता की जीती जागती मूर्ति थीं। पटना विश्वविद्यालय से बी.ए ऑनर्स की पढाई पूरी करने के उपरांत  दिनकर नें पहले कुछ दिनों सब-रजिस्ट्रार के पद पर और फिर प्रचार विभाग के उप-निदेशक के रूप में कुछ वर्षों तक सरकारी नौकरी की। इसके बाद इनकी नियुक्ति मुजफ्फरपुर के लंगट सिह क़ॉलेज में हिन्दी प्राध्यापक के रूप में हुई। दिनकर के काव्य जीवन की शुरुआत 15 वर्ष की अवस्था में हीं हो गयी थी जब वो माध्यमिक के छात्र थे . उनकी पहली कविता १९२५ में जबलपुर से प्रकाशित पत्रिका "छात्र सहोदर " में छपी थी . उनकी पहली काव्य पुस्तक 'प्राण-भंग' सन १९२९ में प्रकाशित हुई जो महाभारत के कथानक पर आधारित थी. रेणुका, द्वंद्वगीत, हुँकार, रसवंती, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, नीलकुसुम, परशुराम की प्रतीक्षा, धूपछाँह आदि दिनकर की प्रमुख काव्य कृतियों की रचना करने वाले दिनकर १९४० के आसपास
गद्य लेखन की और भी प्रवृत्त हुए . हालाँकि , आम लोगों को दिनकर के गद्य लेखक होने की जानकारी अब भी नहीं है लेकिन साहित्य को पढने वाले भारतीय संस्कृति की कालजयी रचना "संस्कृति के चार अध्याय " को कैसे भूल सकते हैं ? 'भारतीय एकता' , 'मिटटी की ओर ' , 'वेणुवन ' , 'चेतना की शिखा ' ,हमारी सांस्कृतिक एकता ' , लोकदेव नेहरु ' आदि गंभीर गद्य साहित्य की रचना के अलावा उनका निबंध संकलन आज भी पढ़ा जाता है . अपनी शादी के ५४ साल बाद 'विवाह की मुसीबतें ' नामक संकलन में उनकी सूक्ष्म दृष्टि की पहचान छुपी हुई है .दिनकर की काव्य पंक्तियाँ तो आज भी जनमानस की जुबान पर हैं .

                     " क्षमा शोभती उस भुजंग को
                          जिसके पास गरल हो .
                         उसको क्या जो दंतहीन

                         विष रहित ,विनीत ,सरल हो !"
जिस समाज में दिनकर ने होश संभाला वह साधारण किसानों और खेतिहर मजदूरों का समाज था , जहाँ अधिकांश लोग निरक्षर और अन्धविश्वाशी थे . दिनकर ने अपने जीवन मूल्य इसी परिवेश में स्थापित किये .इसी वातावरण में उन्होंने अपने साहित्य की दिशा तय कर देश में नई चेतना का संचार किया . १ दिसम्बर १९७३ को राष्ट्रकवि दिनकर ने अपने ज्ञानपीठ पुरुस्कार के सम्मान समारोह में उपस्थित लोगों को उद्बोधित करते हुए कहा था – "भगवान् ने मुझको जब इस धरा पर भेजा तो मेरे हाथ में एक हथोड़ा दिया और कहा कि जा टू इस हथोड़े से से चट्टान तोड़ेगा और तेरे तोड़े हुए अनगढ़ पत्थर भी कला के समुद्र फूल के सामान तैरेंगे ! …….. मैं रंदा लेकर चिकनाने नहीं आया था . मेरे हाथ में तो कुल्हाडा था जिससे मैं जड़ता की लकडियों को फाड़ रहा था ! …." हिंदी साहित्य के इतिहास में अब तक उदबोधन का दूसरा कवि पैदा नहीं हुआ .

"वह प्रदीप जो दीख रहा है, झिलमिल दूर नहीं है
थक कर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं "

भारतीय जनता को उजाले की ओर ले जाने वाला यह दिनकर यहीं नहीं रुका . दिनकर ने राजनीति के गलियारों से  गुजरते हुए अनेकों संस्थाओं को अपनी रौशनी से आलोकित किया . सन 1952 में इन्होंने संसद सदस्य के रूप में राजनीति में प्रवेश किया।बारह वर्षो  तक राज्यसभा के सदस्य रहते हुए राष्ट्रहित का काम किया . फ़िर  कुछ समय तक वे भागलपुर विश्वविद्यालय के उप-कुलपति भी रहे। भारत सरकार नें १९५९ में उन्हें “पद्मभूषण” की उपाधि से सम्मानित किया। जीवन के अवसान की बेला आने से तीन साल पहले यानि १९७१ तक इन्होने भारत सरकार के गृहमंत्रालय में सलाहाकार के रूप में अपनी सेवा राष्ट्र को समर्पित की . नौकरी ,आन्दोलन ,इतिहास ,परम्परा,साहित्य ,विद्रोह और संघर्ष का दिनकर के जीवन और कृति -कर्म में अनोखा संयोग दृष्टिगोचर होता है .रामधारी सिंह दिनकर की कविता का मूल स्वर क्रांति, शौर्य व ओज रहा है। उनकी कविता में आत्मविश्वास, आशावाद, संघर्ष, राष्ट्रीयता, भारतीय संस्कृति आदि का ओजपूर्ण आस्वादन चखने को मिलता है । जनमानस के अवचेतन को चेतन बनाना ही उनकी कविताओं का प्रमुख उद्देश्य रहा है।  भारतीय संस्कृति के प्रति उनके इसी अगाध प्रेम नें उन्हें राष्ट्र कवि के रूप में प्रतिष्ठा दिलायी। जनाक्रोश को प्राचीन सन्दर्भों में पिरो कर देश और भाषा की अमिट सेवा करने वाले दिनकर को भारत कभी अपने दिल से बिसार नहीं पायेगा !
 

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