सिनेमा|2009/10/12 3:39 pm

उदय प्रकाश से युवा साहित्यकार संजीव झा की बात-चीत

 

Uday prakash

मैंने उदय प्रकाश का एक साक्षात्कार पढ़ा था। उनसे इस तरह के सवाल पूछे गए थे कि जैसे लेखक को कटघरे में खड़ा किया जा रहा हो और उसे अपनी सफाई देनी हो । किसी भी साक्षात्कार का वह अंश मुझे हास्यास्पद लगता है कि जिसमें लेखक द्वारा स्वयं लिख दिए गए को जस्टीफाई करना पड़े जैसे लिखना कोई जुर्म हो और वह अदालत में बयान दे रहा हो ।
इस अवसर पर मुझे ओलिवर स्टोन की वह फिल्म याद आ रही है जिसमें उसका नायक जब अदालत में दीर्घ बयान देता है… कैसे लोग उसे उन्माद साबित करने पर तुल जाते हैं । प्रश्नकर्ता, सरकार, सत्ता, उनके चाटुकार… तब वह कहता है- आई एम अनिमि आॅफ माई गवर्नंमेंट, बिकाॅज़ आई लव माइ कंट्री ।
ऐसा ही होता है । आप जब अपने देश को प्यार करते हैं तो उस वक्त की सरकार आपके विरूद्ध हो जाती है… और ऐसा बार-बार होता है, हर देश में, हर समय और समाज में… और आखिर ऐसा क्यों होता है इस प्रश्न को बड़ी गहराई के साथ वह फिल्म उठाती है ।

राजकपूर की फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ का टाइटल सांग और उसका सिचुएशन आखिर किस बात को पुष्ट करता है ? फिल्म के नायक को डाकुओं की पूरी बस्ती पुलिसवाला समझती है । जबकि वह तो एक सीधा-साधा और अबोध व्यक्ति है जो डफली बजाता फिरता है । वह मेहमान बनकर डाकुओं की बस्ती में आ पंहुचा है । और कैसे एक दिन उसकी असलियत जानने के लिए डाकुओं की भीड़ चारों तरफ से उसपर पत्थर चलाने लगती है ! तब वह नगाड़ा बजाकर अपना परिचय देता है । कुछ कहने और दिखाने के लिए उसके पास या तो उसका नगाड़ा है या कि अबोध शब्द । गाने के दरम्यान, सबका जवाब वह अपने शब्दों से ही देता है ।

उदय प्रकाश के उस साक्षात्कार को पढ़कर कहीं न कहीं मुझे यह ज़रूर लगा था कि यह आदमी बोलता भी बहुत अच्छा है । लिखता तो अच्छा है ही ।

आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि एक व्यक्ति जब लिखता है तो उसके माध्यम से पहले के सैकड़ों लेखक लिखते-बोलते हैं । ठीक इसी प्रकार, जब एक व्यक्ति बोलता है तो उसके माध्यम से सैकड़ों व्यक्ति बोलते हैं- सदियों का अभिज्ञान बोलता है, अनेक पुस्तकें ,परिस्थितियाँ और परिभाशाएँ बोलती हैं, परंपराएँ बोलती हैं…मृत्यु बोलती है, जन्म बोलता है । साहित्य की गतिशीलता की तो कसौटी ही यही है उसमें बहस और विमर्ष के लिए कितना स्थान है । और बातचीत तो फिर एक कलाकार के वैचारिक क्षितिज में झांकने की कोशिश ही है । इसी बहाने हम उसकी सोच से अवगत होते हैं । साक्षात्कार केवल अखबारी विधा नहीं, बल्कि उसमें सृजनात्मक संभावनाएं होती हैं । बशर्ते की बोलने वाले को मौका मिले । वर्ना मैंने देखा है कि वहां भी कभी कभी बोलने नहीं दिया जाता । बीबीसी का एक संवाददाता जब तारकोवोस्की से बातचीत करके लौटा तो उसे उसके बाॅस ने फटकार लगाई । दरअसल, पूरे बातचीत में सिर्फ वहीं बोलता रहा था और नतीज़ा यह हुआ कि उसे तारकोवोस्की के पास शर्मिंदगी के साथ फिर जाना पड़ा । सोचिए, अगर कोई चैपलिन के पास बातचीत के लिए जाता और वहां खुद बोलने का लोभ संवरण नहीं कर पाता, तो क्या होता । ‘बेचारा’ चैपलिन तो बस उसे निहारता रह जाता, अपनी उन अबोध निगाहों से । और आखिर में मुस्करा कहता- ‘आपका बहुत बहुत शुक्रिया’

पिछले दिनों ही एफटीआईआई में हुए एक सेमिनार से लौटा था । विषय था- सिनेमा एंड लिट्रेचर: क्वेश्चन आफ एडाप्टेशन । फिल्मकारों, आलोचकों और साहित्यकारों का जमघट देखा । ‘फिल्मी ख़ेमे’ में एक से एक योद्धा थे- गोविंद निहलानी, मणी कौल, शमा ज़ैदी, गुलज़ार, जावेद अख़्तर, विशाल भारद्वार, अनुराग कश्यप वगैरह-वगैरह । ‘साहित्यिक और आलोचक ख़ेमे’ में थे- अनंतमूर्ति, विष्णु खरे, विनोद भारद्वाज, प्रियंवद, असग़र वजाहत, ममता कालिया वगैरह । इन सबमें विष्णु खरे एक ऐसे वक्ता निकले जिन्हें लोगों ने पूरे मनोयोग से सुना । पूरे सेमिनार में दो लोगों की सबसे ज़्यादा कमी खली । विजयदान देथा और उदय प्रकाश की । वही पर निश्चय किया कि लौटकर इन दोनों से बातचीत करूंगा । उदय प्रकाश से पता चला कि उन्हें तो सेमिनार में बुलाया ही नहीं गया था ! एक बारगी सोचा कि इस ‘उन्मादी’ को बुलाए भी कौन ? तो याद आया कि माश्र्ल प्रूस्त को तो एक सभा में बुलाकर भी नहीं बोलने दिया गया था । कौरवों की सभा में तो एक से एक ‘वक्ता’ थे पर मूलतः ‘मूकबधिर’ और ‘नेत्रहीन’ ही थे । फिर उस ‘लिखने’ का क्या करें जिसने ‘बोलने’ के बारे में लिखा- ‘बोल की लब आज़ाद हैं तेरे… बोल अभी तु जिंदा है…’ । धर्मवीर भारती की कुछ पंक्तियां भी इसी संदर्भ में प्रासांगिक है जिन्हें पाठकों ने ज़रूर पढ़ा होगा- ‘‘कुछ होगा…. कुछ होगा अगर मैं बोलूँगा…. न टूटे तिलिस्म सत्ता का मेरे अंदर एक कायर टूटेगा ।’’ उदय प्रकाश की एक कविता है- ‘कुछ नहीं सोचने/ और कुछ नहीं बोलने पर/ आदमी/ मर जाता है ।’ मैंने उदय प्रकाश से सिनेमा और साहित्य पर बातचीत के लिए समय मांगा । हम एक घंटे के लिए बातचीत करने बैठे । लेकिन जब बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो संभवतः हमने इस विषय पर तीन घंटे से ज्यादा बात की ।

इंटरव्यू के आखिर में मैंने उदय प्रकाश से उनकी पसंदीदा फिल्मों के बारे में भी बात की । यहां आप पढ़िए कि हमारे समय की एक साहित्यिक प्रतिभा को किस तरह की फिल्में पसंद आती हैं ।

संजीव: अपनी कुछ पंसदीदा फिल्मों के बारे में बताइये… जो आपको खासतौर से पसंद हो । उदय प्रकाश: अभी मैंने कम्प्यूटर पर आपको ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ दिखाई… चार्ली चैपलिन की ये फिल्म मुझे बहुत पसंद है । इसी तरह से तारकोवोस्की की फिल्में मुझे पसंद हैं… ‘सेक्रिफाइस’, ‘मिरर’ और वो कौन सी फिल्म है… ‘स्टाल्कर’, वो भी मुझे बहुत पसंद है ।
संजीव: कोस्ता गावरास की ‘ज़ेड’ का नाम ले रहे थे आप । उदय प्रकाश: हाँ । उसकी दोनों फिल्में ‘कन्फेसन’ भी और ‘ज़ेड’ भी । कहीं न कहीं मुझे वैसे फिल्मकार बहुत पसंद हैं जो पोलिटिकल और ह्यूमन दोनों को मिला कर फिल्में बनाते हैं । जैसे कि ‘मिसिंग’ है । फिर लुई बुनुएल कि फिल्में मुझे बहुत ज्यादा पसंद है ।
संजीव: कौन-कौन सी ?
उदय प्रकाश: मुझे ‘नजारिन’ बहुत पसंद है । उसको मैं बार-बार देखता हूँ ।
संजीव: नजारिन… वो युवा पादरी वाली फिल्म जिसके अंदर गरीबों के प्रति दया व करूणा का भाव पैदा हो जाता है और आगे चलकर उसके अंदर क्राइस्ट बनने की ललक पैदा हो जाती है । लेकिन आखिर में उसे शूली पर लटका कर मार दिया जाता है ।
उदय प्रकाश: हां वहीं, उस पादरी को भी वही दंड मिलता है जो क्राइस्ट को मिला था । सत्यजीत रे की ‘पाथेर पांचाली’ । ऋत्विक घटक की फिल्मों का तो मैं फै़न रहा हूं । गुरूदत्त व राजकपूर की फिल्में भी । राजकपूर की ‘श्री 420’ और ‘आवारा’ बेहद पसंद है । बल्कि कई बार तो लगता है कि राजकपूर की फिल्मों का जितना मूल्यांकन होना चाहिए था उतना नहीं हुआ । उसका एक गीत बेहद पसंद आता है- ‘दिल का हाल सुने दिलवाला’ । वह कमाल का गीत है ।
संजीव: बहुत बढ़िया गीत है वो- ‘छोटे से घर में ग़रीब का बेटा… मैं भी हूँ माँ के नसीब का बेटा… रंजो ग़म बचपन के साथी… आंधियों में जली जीवन बाती’ । उदय प्रकाष जी, आपको ये मानना पड़ेगा कि शैलेन्द्र के गीतांे में अर्थों की कई परतें खुलती थीं । वे बड़ी आसान सी ज़बान में अपनी बात कह जाते थे । और जैसा कि जावेद अख्तर ने नसरीन मुन्नी कबीर से बातचीत के दरम्यान कहा था कि शैलेन्द्र के गीत किताबों में पाई जानेवाली शायरी और कविता के बजाय सैकड़ों बरसों से इस मुल्क के गांवों और शहरों में गाए जानेवाले गीतों की याद दिलाते हैं ।
उदय प्रकाश: सही कह रहे हैं आप… कमाल के गीतकार थे वो । बल्कि राजकपूर की ये फिल्म ही मुझे बेहद पसंद है । मैं ये मानता हुं शायद ये जो कोलोनाइजर्स थे इनकी शुरूआत को वो देख रहा था । एक चीज़ मैं आपसे और कहना चाहूंगा कि इस समय का जो गीत या संगीत है, वो जिस फिल्म का है, उसका भी हिस्सा है और उससे अलग भी उसने अपनी हैसियत बना ली है । तो आज के समय में ऐसा भी है ।

: संजीव झा 

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1 Comment

  • “.ओह, थोड़ा और होता तो….” हर अच्छी चीज ख़तम होती है तो मन यही सोचता है…बढ़िया साक्षात्कार…भूमिका भी कुछ कम नहीं…

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