आयोजक : आनंद जी शर्मा
हिन्दी भाषा-प्रदूषण के विरुद्ध प्रहार कीजिये ! क्या हिंदी बदल रही है?
विजय कुमार मल्होत्रा : पिछले डेढ़ दशक में हिंदी का स्वरूप काफ़ी बदल गया है या फिर इसे जान बूझ कर बदलने की कोशिश हो रही है. कई हिंदी अख़बारों ने तो हिंदी की जगह हिंग्लिश का प्रयोग धड़ल्ले से शुरू कर दिया है. इसके पक्ष में तर्क ये दिया जाता है कि आज की युवा पीढ़ी जैसी भाषा बोलती है वैसी ही भाषा हम सबको प्रयोग करनी चाहिए. यानी प्रधानमंत्री की जगह प्राइम मिनिस्टर, छात्र की जगह स्टूडेंट्स और दुर्घटना की जगह एक्सीडेंट!
लेकिन क्या ऐसे प्रयोगों से हिंदी का अस्तित्व बच पाएगा? क्या हिंदी भाषा का ये बदलता चेहरा आपको स्वीकार्य है?
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पूर्व निदेशक (राजभाषा),, रेल मंत्रालय,भारत सरकार
राजकिशोर:- आजकल संसद सदस्यों, मध्य प्रदेश के विधायकों और देश भर के हिन्दी समाचार पत्रों के संचालकों तथा संपादकों को डाक से एक बड़ा-सा लिफाफा मिल रहा है।
वे जब इसे खोलते हैं तो उन्हें एक पुड़िया में राख मिलती है। यह राख किस चीज की है इस उत्सुकता को मिटाने के लिए लिफाफा भेजने वालों ने वक्तव्य भी भेजा है। जिसमें कहा गया है- आज हिंदी दिवस के अवसर पर हम इंदौर नगर के बुद्धिजीवी गांधी प्रतिमा के समक्ष देश भर के लगभग सभी हिंदी अखबारों की एक-एक प्रति जुटा कर उनकी होली जलाने के लिए एकत्र हुए हैं। हम सब जानते हैं कि जब निवेदन के रूप में किए जाते रहे संवादात्मक प्रतिरोध असफल हो जाते हैं, तब विकल्प के रूप में एकमात्र यही रास्ता बचता है, जो हमें गांधीजी से विरासत में मिला है।
यह वक्तव्य का बहुत छोटा-सा हिस्सा है। इसे इंदौर में हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) पर जारी किया गया था। इसमें विस्तार से बताया गया है कि अंग्रेजी शब्दों को जबरदस्ती ठूंस-ठूंस कर हिन्दी को एक ऐसी मिश्रित भाषा बनाया जा रहा है जिसमें हिन्दी के शब्द केवल 30 प्रतिशत हों और अंग्रेजी शब्दों का अनुपात 70 प्रतिशत हो जाए। यह भाषा कैसी होगी, इसका एक नमूना इंदौर के ही एक स्थानीय समाचार पत्र से लिया गया है- ‘इंग्लिश के लर्निंग बाय फन प्रोग्राम को स्टेट गवर्नमेण्ट स्कूल लेवल पर इंट्रोड्यूस करे, इसके लिए चीफ मिनिस्टर ने डिस्ट्रिक्ट एज्युकेशन ऑफिसर्स की एक अर्जेंट मीटिंग ली, जिसकी डिटेल्ड रिपोर्ट प्रिंसिपल सेक्रेटरी जारी करेंगे।
यह कोई हंसाने के लिए बनाया गया कोई काल्पनिक वाक्य नहीं है, वास्तव में उस अखबार में ऐसा ही छपा था। और यह कोई एक अकेली घटना नहीं है। हिन्दी के बहुत-से समाचार पत्र ऐसी ही भाषा के प्रयोग की ओर बढ़ रहे हैं। मामला अखबारों तक ही सीमित नहीं है। अंग्रेजी के बढ़ते हुए प्रकोप के परिणामस्वरूप और शब्द-निर्माण में हिन्दी वालों के आलस्य के कारण हिन्दी का जो रूप बन रहा है, उसकी कुछ बानगी भी इस वक्तव्य में पेश की गई है- मसलन, छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेंट्स, माता-पिता की जगह पेरेंट्स, अध्यापकों की जगह टीचर्स, विश्वविद्यालय की जगह यूनिवर्सिटी, परीक्षा की जगह एक्जाम, अवसर की जगह अपार्चुनिटी, प्रवेश की जगह इंट्रेंस, संस्थान की जगह इंस्टीट्यूशन तथा भारत की जगह इंडिया। इसके साथ ही, पूरे के पूरे वाक्यांश भी हिंदी के बजाय अंग्रेजी के छपना, जैसे आउट ऑफ रीच, बियांड अप्रोच, मॉरली लोडेड, कमिंग जनरेशन, डिसीजन मेकिंग, रिजल्ट-ओरियंटेड प्रोग्राम आदि।
हिन्दी के सुविख्यात कथाकार-चित्रकार प्रभु जोशी, जो इंदौर में ही रहते हैं, हिन्दी के इस क्रियोलीकरण से अरसे से चिंतित रहे हैं। यह उन्हीं का आग्रह है कि हिन्दी-अंग्रेजी मिश्रण से पैदा हो रही दोगली हिन्दी |
आशीष तिवारी - मैं एक ऐसे अखबार में काम करता हूँ जिसकी भाषा ही हिंग्लिश है…खरें लिखते और पढ़ते वक़्त हमें इस बात का जरा भी एहसास नहीं होता कि हम जो लिख रहें हैं वो हमारी भाषा नहीं है. मेरा मनाना है कि भाषा और समाज का अपना एक रिश्ता होता है. समाज के अनुरूप ही भाषा होती है. कभी कामायनी कि पंक्तियाँ पढ़ता हूँ तो यह भेद पुष्ट होता है…ऐसा नहीं है कि हिंदी हमारे समाज से दूर हो रही है, हाँ उसका स्वरुप परिवर्तित हो रहा है. लेकिन ध्यान इसपर भी देना होगा कि हमारा समाज भी परिवर्तित हो रहा है. लिहाजा भाषा में बदलाव तो आना ही था. भारतेंदु ने एक साहित्य में एक नयी शैली का प्रारम्भ किया. वर्तमान में एक अलग ही शैली है. भविष्य में एक अन्य शैली होगी…
हरेन्द्र कुमार- कितना शर्मनाक तर्क दिया है आपने आशीष जी..अगर आपको एहसास नहीं होता है तो ये आपकी कमजोरी है.आपका स्वाभिमान मर चुका है इसलिए…जगाईए अपने स्वाभिमान को…आपका बेटा अगर बिगड़ने लगे,उसमें बुराईयाँ आने लगे तो आप उसे और प्रोत्साहित नहीं करेंगे यह सोचकर कि जमाना ही बुरा हो रहा है बल्कि आप उसे सुधारने का प्रयास करेंगे और ये अपका उत्तरदायित्व भी बनता है..अगर हिन्दी भाषा बर्बाद हो रही है तो उसमें सबसे ज्यादा योगदान आप जैसे लोगों का ही है क्योंकि समाचार-पत्रों में प्रयुक्त शब्द ही सबसे ज्यादा अपनाए जाते हैं..ऐसा नहीं है कि अगर आप शुद्ध हिन्दी लिखेंगे तो लोग समझ नहीं पाएँगे या पसंद नहीं करेंगे…अपनी कमजोरी का बहाना मत बनाइए..आपलोगों के उपर बहुत बड़ी जिम्मेवारी है…ये आपका कर्त्तव्य है कि चाहे जहाँ से भी वहाँ से शुद्ध हिन्दी शब्द को ढूँढकर लाइए…मेरी उम्र २३ वर्ष ही है लेकिन मुझे याद है कि आज से करीब १० साल पहले हमलोग १००% हिंदी बोलते थे..अगर कोई yes या no भी कह देता था तो उसका मजाक बन जाता था..फ़िर आप तो मुझसे बहुत बड़े हैं,मैं नहीं समझता हूँ कि आपको ज्यादा परेशानी होनी चाहिए शुद्ध हिन्दी के प्रयोग में….आशा है मेरे किसी बात का बुरा नहीं मानेंगे आप…
आलोक मोहन- किसी देश की भाषा उसकी आत्मा होती है .अगर वही मर जाये तो जीने का की फायदा
आशीष तिवारी- मुझे हैरानी है आप लोगों के विधवा विलाप पर..हिंदी के प्रति आप लोगों ने शायद कोई बहुत बड़ा काम किया हो और मुझे पता ना हो तो मै क्षमा चाहता हूँ . आप सभी हिंदी के बहुत बड़े समर्थक हैं इतना तो समझ आ गया लेकिन मैं कहाँ से हिंदी का विरोधी हूँ ये मैं नहीं समझ पा रहा हूँ. जहाँ तक हरेन्द्र जी ने मुझे शर्मिंदा होने का इशारा किया है तो बंधू आप किसी डरपोक राजनीतिज्ञ की तरह कहते हैं कि बुरा मत मानियेगा. खैर, भैया मै क्यों बुरा मानू? लेकिन हरेन्द्र जी कोई दस ऐसे उदाहरण आप लिख दीजियेगा जहाँ आपने अंग्रेजी के शब्दों को हटा कर वहां शुद्ध हिंदी के शब्द लिखे हो. देश के स्कूलों में विज्ञान की किताबों की होली जला देना क्योंकि वह सब अंग्रेजी में लिखी हैं. अंग्रेजी और अंग्रेजियत का फर्क समझिये हरेन्द्र जी..
आलोक मोहन - क्या आप को ये नही लगता इंग्लिश की आवश्कता ने हिंदी को निगल लिया है
इंग्लिश को अनिवार्यता खुद हमने तय की है
इस दुनिया ने कितने ही राष्ट ने इंग्लिश को दरकिनार कर अपनी भाषा को आगे किया है
अपनी भाषा में उन्होंने कंप्यूटर पुस्तके मोबाइल आदि २ तैयार किये है
वो आज भारत से आगे है
यदि हम अपनी भाषा में अच्छा काम कर सकते है तो इंग्लिश की क्या जरूरत है ?
जहा सरकारे अरबो रूपये पार्क और पता नही कहाँ २ खेर्च कर रही है
उसे हिंदी के विकाश में लगाना चाहिए
हरेन्द्र कुमार- मेरे कहने के बावजूद भी आप बुरा मान ही गए ना….!आप मुझसे बड़े हैं इसलिए आपका सम्मान करने के लिए ऐसा कहना पड़ा था..ये जगह झगड़ा करने के लिए नहीं है..मैं आपको दस क्या सौ उदाहरण दे सकता हूँ जहाँ अँग्रेजी की जगह हिन्दी शब्दों के प्रयोग के लिए मैंने प्रयास किए हैं और शब्दकोश का सहारा भी लिया है…यहाँ तक कि सिर्फ़ अँग्रेजी ही नहीं बल्कि हिंदी में घुसे हुए उर्दू-फ़ारसी शब्दों की के लिए भी मैं नेट पर उसका हिंदी अर्थ ढूँढता हूँ…आशीष जी मेरे कुछ करने से समाज पर कोई असर नहीं पड़ता है लेकिन आपके कारण समाज पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ता है और आप अपनी गलती को सुधारने के बारे में सोचने के बजाय उसे छुपाने के लिए तर्क दे रहे थे..इसलिए कहना पढ़ा..आप अगर तर्क करके हमलोगों से जीत भी जाएँ तो क्या लाभ अगर आपकी मातृभाषा ही दूषित हो जाय..जरा कल्पना कीजिए कैसा लगेगा उस समय जब हमलोग दूषित हिंदी भाषा में बात करेंगे…….
माँ सीता की जगह मदर सीटा कहेंगे और श्री राम की जगह Mr. Ram कहेंगे…भाषा बदल जाने से बहुत कुछ बदल जाता है,बहुत कुछ…सभ्यता-संस्कृति,संस्कार-चरित्र यहाँ तक की पसंद-नापसंद,रहन-सहन,सब कुछ…आज भी अँग्रेजी माध्यम से पढ़े-लिखे बच्चों का रहन-सहन,उसके सोच,उसके पसंद-नापसंद सब अंग्रेजों जैसे होते हैं,हिंदी माध्यम से पढ़े बच्चों से काफ़ी भिन्न होते हैं वो……
हो सके तो एक बार ठंडे मस्तिष्क से बिना किसी के लिए अपने मन में दुर्भावना या आलोचना का भाव रखे सोचकर देखिएगा…
आशीष तिवारी - बुरा मानने का तो प्रश्न ही नहीं उठता. क्योंकि आपके तर्क आँखों पर पट्टी बाँध कर दिए लगते हैं. ऐसा नहीं है कि मैं हिंग्लिश की रोटी खाता हूँ इसलिए ऐसा कह रहा हूँ. मुझे जहाँ तक लगता है कि आप लोगों को तेज आवाज में चीखने कअ शौक है. आपको इस बात का भी शौक है कि आपको लोग हिंदी का बहुत बड़ा समर्थ समझे. आप कहते हैं दस क्या सौ उदाहरण दे सकते हैं लेकिन अफ़सोस कि पटल पर एक भी नहीं दिखा. आप हिंदी में जिस प्रदुषण कि बात कर रहें हैं वो ट्रेन, सिगरेट, कंप्यूटर, मोबाइल, मोटर साईकिल, टीवी, बल्ब, शर्ट, पैंट, बेल्ट जैसे शब्दों से भी होता है. लेकिन इन शब्दों को सुन कर आप लोगों का हिंदी प्रेम ना जाने कहाँ चला जाता है. हो सकता है कि आप लोग इन शब्दों का जो इंग्लिश भाषा के हैं उनका प्रयोग ही ना करते हों.( जिसकी उम्मीद कम है) या फिर इन शब्दों का हिंदी में अनुवाद करके प्रयोग करते हों( इसकी भी उम्मीद कम ही है).मुझे आप सभी कथित हिंदी प्रेमियों जिन्होंने हिंदी का सबसे अधिक बेड़ा गर्क किया है उनसे आशा रहेगी कि वो मेरे द्वारा लिखे शब्दों का कोई हिंदी विकल्प देंगे.
चाणक्य शर्मा - भाषा एक ऐसा विषय है जिस पर एक और महाभारत लिखा ज सक्ता है , जब इस देश की राज भाषा का मजाक राजनीतिक पार्टी करती है और कहती है की इस देश की हिन्दी राष्ट्र भाषा नही है तब हिन्दी की रोटीखाने वाले राज भाषा विभाग वाले सोते रहे है . सिर्फ भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ की संसद की कोइ भाषा नहीं है , जो जिस भाषा मे चाहे बोल और लिख सक्ता है , आपको मालुम होने चाहिए चीनमे भारत से भी ज्यादा भाषाये है करीब१२५ . पर वहाँ भी संसद मे सिर्फ एक ही भाषा चलती है . कभी भी वहाँ भाषा के नां पर राजनीति नहीं होती है . मेरा बस चले तो हिन्दी के नामपर रोटी खाने वालो का श्राध्दकर कर दू. जिम्मेदार यही लोग है इनका जब पहला अधिवेशन देल्ही मे १९७३ मे हुआथा तब स्वागत भाषण भी हिन्दी मे ना होकर अंग्रेजी मे हुआ था .
आज भी क्या राज भाषा विभाग की वजहसे क्या हिन्दी जिंदा है क्या ? नहीं यह चमत्कार हिन्दी चलचित्र की वजह से है और इस भाषा का भी विस्तार अपने देश और विदेशो मे चलचित्रो की वजह से हो रहा है . जो क़ि एक बडा सच् है .
आज भी कोइ ऐसा न्यायालय बताइए जहाँ पर हिन्दी मे काम हो रहा हो . हिन्दी भाषी छेत्रो मे भी अंग्रेजी मे आदेश आते है ..क्या वहाँ पर अग्रेजी वाले लोग ही रह्ते है ?
राजकुमार सिंह - भाई जरा साफगोई से कहूँ ? अपने बच्चों को गर हम अंगरेजी माध्यम से पढ़ायेंगे और तथाकथित ‘ शुद्ध हिन्दी ‘ की गुहार लगायेंगे तो एक नौटंकी के सिवा कुछ भी नहीं होगा .वैसे ये बताने की जरूरत नहीं की भाषा अवचेतन से चेतन और तब प्रतिक्रिया स्वरूप ‘ शब्द ब्रम्ह ‘ बनती है .
हरेन्द्र कुमार - इतना बचकाना जैसा प्रश्न करिएगा तो कोई क्या उत्तर देगा….! ठीक है मान गए आप बिल्कुल सही हैं..अब अपने गुस्से को नियंत्रित करिए और खुश रहिए…..
शायद आपको उत्तर पाए बिना संतोष भी नहीं मिलेगा,चलिए उत्तर दे ही देते हैं……….
बहुत से ऐसे शब्द हैं जिसकी उत्त्पत्ति विदेशों में हुई है तो उसका नाम भी उसी देश से होगा ना..उस शब्द का नामकरण हम करना चाहेंगे तो वो उतना अच्छा नहीं हो पाएगा..टेलिविजन का आविष्कार विदेशों में हुआ तो वहाँ जो इसका नाम रखा गया वो यहाँ भी प्रचलित हो गया…अगर हैरी नाम का कोई व्यक्ति अमेरिका से भारत आए तो उसे उसे हैरी नाम से पुकारा जाना ही ज्यादा उचित होगा ना कि हैरी के बजाय हरि से..उसी प्रकार राम नाम का कोई व्यक्ति इंग्लैण्ड पहुँच जाए तो उसे राम पुकारना ही उचित होगा ना कि “रैम”..कैसा लगेगा अगर गाँधी को अँग्रेज गैण्डी बोले तो….!!
हिंदी के भी बहुत से ऐसे शब्द हैं जो विदेशों में नही थे तो उनका आँग्ल रुपान्तरण किया गया,जैसे-चूड़ा का beaten rice,मुरमुरे का puffed rice,कुछ शब्द ऐसे हैं जिसका अँग्रेजी का नाम काफ़ी बड़ा है जो नाम ना होकर उसका परिभाषा बन गया है जैसे तवा,पतीला,परात(wide shallow plate upturned sloping edge) आदि… जरा सोचिए टीवी बल्ब बेल्ट ये सब कितने छोटे-छोटे आसान शब्द हैं जिसका हिंदी नामकरण करने पर जटिलता आ जाएगी..हमलोग हिंदु हैं मुसलमान या ईसाई नहीं जो कट्टर होंगे..हमलोगों को इन शब्दों के प्रयोग से कोई आपत्ति नहीं क्योंकि हिंदी को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है…चेहरे पर अगर एक-दो तिल हों तो उससे चेहरे की सुंदरता घटती नहीं और बढ़ ही जाती है पर अगर तिल ज्यादा हो जायें तो चेहरा कुरुप हो जाएगा…कालिख को आँखों में लगाया जाता है सुंदरता बढाने के लिए पर अगर वो कालिख जहाँ-तहाँ लग जाय तो वो गंदगी बन जाती है…
देखिए बुरा तब नहीं जब हम विदेशी चीजों को विदेशी नाम से पुकारते हैं,बुरा तब है जब हिंदी शब्द होते हुए भी हम उसे छोड़कर अँग्रेजी का प्रयोग करते हैं..जैसे मैं उदाहरण देता हूँ और आपका दस शब्द पूरे कर देता हूँ…
१.Tention–चिन्ता,तनाव,बोझ,सर-भारी हो जाना अदि..
२.Problem–समस्या,संकट,विषम परिस्थिति,उलझन
३.Confusion–दुविधा,असमंजस,
४.bore हो गए—उब जाना,थक जाना,झेलना,मन अंसा जाना
५.difficult–कठिन,जटिल
६.sorry–क्षमा कीजिए,गलती हो गई,माफ़ करिएगा
७.situation-परिस्थिति,स्थिति
८.disturb मत करो–परेशान मत करो,बाधा मत डालो…
९.main बात—मुख्य बात
१०.sentence–पंक्ति,वाक्य..
११.time–समय
१२.time-pass करना–समय काटना या बर्बाद करना…
tention,disturb,bore,problem आदि ऐसे शब्द हैं जिनके हिंदी अर्थ ना के बाराबर प्रयुक्त हो रहे हैं आजकल,इसका प्रभाव इतना बढ़ चुका है कि गाँव के बूढ़ी भी अब इन्हीं अँग्रेजी शब्दों का प्रयोग करते हैं जो सोचनीय है और दुःखद भी…समाज में रहकर मैं भी आदत से विवश हूँ परंतु यथाशक्ति हरेक बार इनके हिंदी प्रयोग की ही कोशिश करता हूँ…
कुछ आपके शब्दों का हिंदी अर्थ — टीवी-दूरदर्शन,रेडियो-आकाशवाणी,बेल्ट-पेटी………
कृपया स्वंय सोचने समझने की कोशिश करिए,आप इतना समर्थ हैं कि इन छोटी-मोटे बातों को समझ सकें..अगर अच्छे उद्देश्य के लिए तर्क-वितर्क करना है तो मैं हर पल तैयार हूँ और विश्वास दिलाता हूँ मैं कमजोर नहीं पड़ूँगा पर अगर जीतने के लिए सिर्फ़ झगड़ा करना है तो क्षमा करिए,मैं बेवकूफ़ हूँ आप ही बुद्धिमान हैं,मैं आपके किसी प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दे पाऊँगा………………..
प्रशांत प्रियदर्शी - मैं भारत के एक ऐसे हिस्से(चेन्नई) में हूँ जहाँ कि भाषा का ज्ञान ना होने के कारण मुझे पूरी तरह अंगरेजी पर निर्भर रहना पड़ता है.. मेरी व्यावसायिक भाषा भी अंगरेजी ही है, जिसके बिना मेरा काम नहीं चल सकता है.. मगर फिर भी मुझे कोई हिंदी में बात करने वाला मिलता है बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के ही अधिकाँश शब्द शुद्ध हिंदी या उर्दू के ही निकलते हैं.. एक उदाहरण देकर बताना चाहूँगा, “ऑफिस” किसी हिंदी भाषी के सामने मैं कभी ऑफिस नहीं बोलता हूँ.. “कार्यालय” अथवा “दफ़्तर” शब्द का प्रयोग करता हूँ..
आनंद जी.शर्मा – आदरणीय गुरुजनों – हिन्दी हितैषियों – सादर प्रणाम |
करबद्ध – क्षमायाचना करते हुए प्रार्थना करता हूँ कि व्यर्थ वाद-विवाद त्याग कर कृपया लक्ष्य पर दृष्टि केन्द्रित रखें | मेरे विचार से आप सब का लक्ष्य तो यही है ना कि हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग हो जिससे वह :
(१) अधिकाधिक लोगों द्वारा समझी – बोली – पढ़ी एवं लिखी जाय |
(२) भाषा में अल्प संख्या में सुसंस्कृत शब्दों का प्रयोग किया जाय एवं शनैः शनैः उनकी संख्या बढ़ा कर लोगों के मानसिक स्तर का उत्थान किया जाय |
(३) हिन्दी भाषा में शब्द होते हुए भी अंग्रेजी के जिन शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग होता आ रहा है – विशेषतः उन्ही शब्दों को हिन्दी में बारम्बार प्रयुक्त कर लोगों को हिंगलिश अथवा इन्ग्दी पर पराश्रित रहने की “विवशता” से मुक्ति दिलाई जाय |
इनके अतिरिक्त आप लोगों के भी अनेक विचार होंगे जिनका एकमात्र लक्ष्य हिन्दी की शीर्ष पर स्थापना है |एक विचार और भी आ रहा है – हिंगलिश अथवा इन्ग्दी का प्रयोग करने वाले टीवी अथवा समाचापत्रों के विज्ञापनों – लेखों का अधिकाधिक – परन्तु शिष्टतापूर्वक – उपहास किया जाय |जिन्हें भारत में अपना माल (विचार अथवा वस्तु) विक्रय करना हो वे हमारी मातृभाषा (भारत की प्रत्येक भाषा) के साथ खिलवाड़ न करें |
यदि लोगों को जागृत किया जाय कि उनकी शुद्ध रूप से बोली जाने भाषा में किये जाने वाले विज्ञापनों का ही माल क्रय करेंगे तो धीरे धीरे ही सही – यब बात हिन्दी अथवा भारत की अन्य भाषाओं के साथ मजाक करने वाले लोगों को भारी पड़ेगी |
यह बात विशेष रूप से विचारणीय है – किसी भी प्रकार का प्रतिकार – प्रतिरोध करना हो तो बिना कुछ आवाज किये – शांतिपूर्वक – उसके द्वारा विक्रय किये जा रहे माल (विचार अथवा वस्तु) का क्रय मत करो |
कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है कि हम अपनी भाषा का तिरस्कार – उपहास करने वाले का माल (विचार अथवा वस्तु) क्रय करें |
आर्थिक प्रहार बहुत कष्टकारी होता है एवं टीवी अथवा समाचापत्रों द्वारा हिंगलिश अथवा इन्ग्दी का प्रयोग करके हिन्दी भाषा का उपहास करने वालों की एकमात्र वही औषधि है |
एक और बात यह भी ध्यान रखने योग्य है कि अविष्कार एवं उसका नामकरण जिस भाषा के बोलने वाले ने किया है – वह उसी रूप में प्रयुक्त हो तो समझदारी कहलाती है | उदाहरण : हार्ड डिस्क – इसे हिन्दी में कड़क तश्तरी या कठोर थाली कहना हास्यास्पद होगा |
इसके अतरिक्त कई लोग हिन्दी का उपहास करने के प्रयोजन से “हिन्दीकरण” करते है : उदाहरण : सिग्नल = लौहपथ गामिनी गमनागमन सूचक हरितारुण लौह पट्ट | सिगरेट = श्वेत पत्रावरित ताम्बूल नलिका / दंडिका | ऐसे लोगों से सतर्क रहने की आवश्यकता है |

