भाषा पर ग्रहण

आज के भारत के परिप्रेक्ष्य में भाषा के संस्कृति के साथ अन्योन्याश्रयी रिश्ते पर कुछ और बात की जाए। आज के काल-खण्ड में हमारे लिए यह रिश्ता तीव्र तनाव से दो-चार हो रहा है। मानविकीविद् बतलाते हैं कि मनुष्य के विकास की लम्बी यात्रा में जब तक भाषा की उत्पति नहीं हुई थी, मनुष्य की सांस्कृतिक प्रगति की दर बहुत धीमी थी और वह पैत्रागतिकी परिवर्तनों पर निर्भरशील थी। भाषा की उत्पति एवम् विकास के बाद संस्कृति के परिवर्तन की गति पैत्रागतिकी में परिवर्तन से आजाद और काफी तेज भी हो गई ।

“जब एक भाषा मरती है तब उसकी संस्कृति भी उसके साथ मर जाती है।“ शीर्षक को मैं  “जब एक संस्कृति लुप्त होने लगती है तो उसके साथ उसकी भाषा पर ग्रहण लगता ही है”, के रूप में पढ़ना चाहता हूँ। हिन्दी सह अन्य भारतीय भाषाओं के संकट को उनके बदलते सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में देखने से यह नजरिया सही लगता है।

अभी पिछले दिनों मेरे बड़े भाई की पोती की शादी का निमंत्रण-पत्र मेरे और मेरे बेटे के नाम भेजे गए थे। मुझे हिन्दी में और मेरे बेटे को अंगरेजी में आमंत्रित किया गया था। इस आचरण को आज की प्रवृत्ति का मानक माना जा सका है। जाहिर है कि हिन्दी परम्परा और अंगरेजी आधुनिकता के प्रतीक बन गए हैं। सामान्यतः जहाँ हम अपने बच्चों के अंगरेजी ज्ञान को अपने बाद की पीढ़ी की प्रगति का मापदण्ड मानते हैं, और हिन्दी में उनकी कमजोरी को इतराते हुए प्रदर्शन करते हैं।

केक काटने की संस्कृति के साथ तो हिन्दी की संगति नहीं बैठ सकती. “Good morning”  का तो सुप्रभात कर लिया पर Happy birthday to you  तो रह ही गया।  अब माँ से ममता नहीं मॉर्टिन की संगति(माँ और मॉर्टिन से सावधान) बैठाई जाती है। माँ का आँचल वाला मुहावरा अचल हो गया है, माँ के जिन्स में आँचल के लिए जगह कहाँ?

“Boy friend –Girl friend”  के लिए हिन्दी समाज में जगह बन गई हो, पर हिन्दी भाषा को तो जगह छोड़ देनी ही होगी।

 

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2 Comments

  • अरे ऐसा भी होने लगा है.

  • हिन्दी परम्परा और अंगरेजी आधुनिकता के प्रतीक बन गए हैं, वाकई आज हिन्दी को हमने अपनी रहने नहीं दिया और अग्रेजी को अपना बना नहीं पारहे, नतीजा हम कंगाल हो रहे हैं.

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