साहित्य-सिनेमा|Shortlink: 2010/07/19 12:01 pm

झूठी है यह “अमन की आशा”, फिर काँटों भरी एक चमन की आशा

अमन-अमन हम रटते आये,

घाव पुराने भरते आये ,

झूठी पेश दलीलों पर ,

शत्रु को मित्र समझते आये ।


झूठी है यह “अमन की आशा”,

फिर काँटों भरी एक चमन की आशा,


अमन-चैन के मिथ्या-भ्रम में ,

शीश के मोल चुकाते आये ।

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