हाय ! ऐसी मोहब्बत

इस भरी दोपहरी में, क्यूँ शमा जलाए बैठी हो |
किसका इंतजार है , जो द्वार खोले बैठी हो||

ये कैसी तलब है, जो पलके बिछाए बैठी हो|
ये कैसी तन्हाई है, जो बेचैन हुए बैठी हो||

निकला पतझड सावन, निकला बसंत-बहार |
किसका इंतजार है, जो आस लगाए बैठी हो ||

कैसे कैसे राज़ जो ख़ामोशी ने छिपायें रखे है |
हाय ! ऐसी मोहब्बत जो परदेसी से कर बैठी हो ||

:- शेखर कुमावत

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