गीत-ग़ज़ल|Shortlink: 2010/06/21 2:12 pm

पिंजड़े में बंद थी एक चिड़ियाँ

aपिंजड़े में बंद थी एक चिड़ियाँ

पल-पल गिने वो तो घड़ियाँ

उड़ना चाहे वो उड़ ना पाए वो

सोचे बन गई ये कैसी दुनियां

पिंजड़े में बंद थी एक चिड़ियाँ….

कोई न किया था उसने कसूर

पेड़ की डाल पे थी बैठी वो दूर

शिकारी आया तीर वो चलाया

घायल कर दिया था उसे पर जरूर

फिर फड़फड़ाये वो उड़ ना पाए वो

सोचे बन गई ये कैसी दुनियां

पिंजड़े में बंद थी एक चिड़ियाँ…

इंसा आजाद है करने बर्बादी है

करोडो से निकल गया अरबो की आबादी है

हमसे छतों को छिना है

बस हक़ उन्हें ही जीना है

आंशू बहाए वो उड़ ना पाए वो

सोचे बन गई ये कैसी दुनियां

पिंजड़े में बंद थी एक चिड़ियाँ…

1 Comment

  • वन्दना गुप्ता

    वाह्………………दर्द उभर कर आ गया है।

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