जमी है महफिल शेरों की, शेरों से डर लगता है,
बड़े बड़े घाघों के डर से, भगने को मन करता है.
कभी सामना किया न हमने, पर हिम्मत जुटाई है,
इसही लिए लिखने को हमे अपनी कलम उठाई है.
इसही लिए लिखने को हमे अपनी कलम उठाई है.
ज़रा सी जि़द ने इस ऑंगन का है बँटवारा करा दिया!
जिस माटी के हम बाशिंदे वहीँ से हमें भगा दिया
अपना घर रहते हुए भी क्योंकर लूटने चले आते
घर लूटते हो बाशिंदों को घर से बेघर करते.
दुनिया की मट्टी छानी अपनी मट्टी की जिद लिए
सम्भल सके न अबतक हम, जबसे घरसे जुदा हुए.
धर्म की आढ़ में लूट मचाकर धर्म ही नारा लगा दिया.
ज़रा सी जि़द ने इस ऑंगन का है बँटवारा करा दिया!

