गीत-ग़ज़ल|Shortlink: 2009/07/02 8:02 pm

एक ग़ज़ल : ज़माने की अगर हम…

ज़माने की अगर हम बेरुखी से डर गए होते

वह दिल की आग थी वरना कभी के मर गए हो्ते

अगर हम ज़ब्त ना करते सदा-ए-दिल गमे-उल्फ़त

जो टकराते पहाड़ों से पिघल पत्थर गए होते

हमारा ज़िक्र भूले से कोई जो कर गया होता

यकीनन उनकी आँखों में भी आँसू भर गए होते

अगर बुतख़ाने से पहले तिरी महफ़िल नहीं मिलती

सकूँ दिल को कहाँ मिलता कि किसके दर गए होते

सभी के वास्ते ’आनन्द’ ज़ुदा राहें यहाँ सबकी

किसी भी रास्ते जाते तुम्हारे घर गए होते

–आनन्द

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