जीना कैसे बतलाये कोई
दिल को मेरे समझाए कोई
न प्यार है ना हमदर्द है
काश मेरे पास आये कोई
जीना कैसे बतलाये कोई ….
अकेला खड़ा हू अनजाने डगर में
हमदम कोई ना जो आये सफ़र में
जो मुश्किल जीना आसां करदे
खुशियों से मेरा दमन वो भर दे
ये सपना जो सच हो जाये कोई
काश मेरे पास आये कोई
जीना कैसे बतलाये कोई….
ख्वाब हकीकत ना बन पति है
आकर वो दूर चली जाती है
रोकू मै कितना गुजारिश करू मै
उससे ना कितना सिफारिश करू मै
समझाया इतना अब समझाए कोई
काश मेरे पास आये कोई
जीना कैसे बतलाये कोई….
Author: नरेन्द्र निर्मल
नरेन्द्र निर्मल , जनोक्ति के कार्यकारी संपादक हैं . निर्मल मूलतः बोकारो (झारखण्ड) के निवासी है और वर्त्तमान में दिल्ली में पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं. गत पांच वर्षो से विभिन्न सामाजिक और काव्य मंचो पर उपस्थित रहे. निर्मल जी कवि और समाजसेवक के रूप में भी जाने जाते हैं. “वाई एम् सी ए ” से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर करने के बाद ‘ जन आवाज’ निर्माण संवाद ‘ जिन्दा लोग’ आदि पत्रिकाओं के साथ -साथ जयप्रकाश अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थान से भी जुड़े रहे हैं .