यह जानकर सचमुच अच्छा लगा और वह भी गृह सचिव जीके पिल्लई से कि माओवादियों का लक्ष्य 2050 तक भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकना है। इससे हमें पूरे चार दशक मिलते हैं, जिसमें 40 पार के लोग शायद जीवित नहीं रहें, 2010 में पहली नौकरी करने वाले आसानी से रिटायर हो सकते हैं और क्रांति को बहुत पास से देखने की उम्मीद कर सकते हैं। चिंता उन्हें होगी जो आज 20 साल से कम उम्र के हैं और क्रांति के हिस्से नहीं होंगे।
ईमानदारी से कहें तो यदि 2050 तक हम गरीबी को नहीं मिटा पाते हैं तो फिर भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए कुछ बचेगा ही नहीं। सरकार का मानना है कि वह सात से आठ साल के भीतर उन 34 जिलों में माओवादियों का सफाया कर सकती है, जहां वे अभेद्य बने हुए हैं। पिल्लई एक बहुत अच्छे अधिकारी व शानदार गृह सचिव हैं, लेकिन माओवादियों की धमकी का समाधान उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। माओवादियों के दुर्गो की संख्या 34 से 100 होती है या 34 से शून्य, यह सबकुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार ‘वंचित भारत’ को ‘राइजिंग इंडिया’ में उसके एक हिस्से के तौर पर शामिल करती है या नहीं। यह तब तक नहीं होगा, जब तक कि सरकार ‘हमेशा की तरह’ काम करना नहीं छोड़ती।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माओवादियों को ‘अस्तित्ववादी’ खतरा करार दिया है। अब तब उनकी सरकार माओवाद से कानून एवं व्यवस्था की समस्या मानकर निपटती आई है। यह भूख एवं दमन की समस्या है : माओवाद के प्रभाव वाले क्षेत्रों में लोग लगभग भुखमरी की स्थिति में जीते हैं और जब भी लोग विरोध करते हैं तो पुलिस उन्हें क्रूरता के साथ दबाती है जो गरीब आदिवासियों को तुच्छ प्रजाति के रूप में देखती है। क्रूरता झूठ के मुलम्मे के पीछे छिपी रहती है, जिसका पूरा तंत्र चाहे वह राजनीतिज्ञ हों, नौकरशाह हों, उद्यमी हों या फिर मीडिया, चुप्पी साधकर अनदेखी करता आया है।
प्रधानमंत्री के बयान में उनकी लाचारगी साफ झलकती है। उन्होंने संसद में कहा कि शक्कर की कीमतों को लेकर सरकार विफल रही है। जो सरकार विफल रही है और जिसके बारे में वे बात कर रहे हैं, वह उनकी ही सरकार है। दूसरी बात, कुप्रबंधन के लिए वे सार्वजनिक तौर पर सीधे-सीधे अपने ही वरिष्ठ साथी कृषि मंत्री शरद पवार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। तो हुआ क्या ? कुछ नहीं। जिसने गलती की है, यदि उसे जवाबदेह नहीं ठहराया गया है तो उस गलती को स्वीकारने का कोई मतलब नहीं है। लेकिन यह बात केवल पवार पर ही लागू करना ठीक नहीं होगा।
डा सिंह ने संसद में यह भी स्वीकार किया कि सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों (मुस्लिमों के लिए कोड वर्ड) को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। स्वीकारोक्ति अच्छी बात है, लेकिन यह सरकार छह साल से सत्ता में है। इस समस्या के समाधान के लिए इसने इतने सालों में क्या किया है? निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री ने इसकी कोशिश की और इसीलिए रंगनाथ मिश्र आयोग का गठन किया गया। लेकिन इसकी सिफारिशों को लागू करने के लिए वे इच्छाशक्ति नहीं जुटा पाए। संयोग से बंगाल में हमारे मार्क्सवादी ऐसा करने में सफल रहे हैं। दरअसल हमारे लोकतंत्र के मानदंड बदल गए हैं : अब केवल वादे नहीं चाहिए, उनका क्रियान्वयन जरूरी है।
वादों और उनके क्रियान्वयन के बीच इस अंतर से प्रधानमंत्री के दूसरे कार्यकाल के प्रमुख मुद्दे पर असर पड़ सकता है, जो पाकिस्तान के साथ रिश्तों में प्रगति से संबंधित है। निश्चित रूप से डॉ सिंह की मंशा अच्छी है, लेकिन केवल अच्छी मंशा रखना ही काफी नहीं होता। बीबीसी ने हाल ही में इस्लामाबाद से एक रिपोर्ट दी है, जिसके अनुसार कश्मीर घाटी में २क्क्९ से आतंकी गतिविधियों में इजाफा हुआ है। घाटी में आतंकवाद का फिर से उदय डॉ सिंह के शांति प्रक्रिया की बहाली के प्रयासों के साथ हुआ है। यह प्रक्रिया अनौपचारिक चैनलों के जरिए शुरू हुई थी और शर्म-अल-शेख में संयुक्त बयान तक पहुंची। इस्लामाबाद दिल्ली की सद्भावना को उसकी कमजोरी समझता है। वह यह भी मानता है कि भारत दो मोर्चो पर झुक जाएगा : आतंकवाद में बढ़ोतरी और कश्मीर समस्या के समाधान के लिए भारत पर अमेरिकी दबाव।
यदि दिल्ली को आसन्न संकटों का सामना करने की कोई उम्मीद रखनी है तो उसे यथार्थवादी होना होगा। भारत गरीबी को हटाकर ही माओवादी उग्रवाद से बच सकता है। इसके अलावा और कोई चारा नहीं है। यह अच्छे प्रशासन के जरिए ही संभव है और अच्छा प्रशासन जवाबदेही के बगैर असंभव है। पाकिस्तान के साथ शांति स्वागतयोग्य है और जिसकी हम सराहना भी करते हैं। लेकिन उससे हाथ मिलाना वाकई जोखिमभरा है, जिसके दूसरे हाथ में बंदूक हो।


