फ़िर दिल तोड़ा हॉकी ने

दिल्ली के ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में कुछ दिनों पहले जब हॉकी विश्वकप का आगाज हुआ था, तो क्रिकेट को धर्म की तरह पूजने वाले भारतीय खेल प्रेमियों ने अपने क्रिकेट मोह से परे जाकर भारतीय हॉकी टीम को भी अपने दिलों में जगह दे दी थी. देश के करोड़ों खेल प्रेमियों के लिए क्रिकेट में महेंद्रसिंह धोनी की ‘टीम इंडिया’ की तरह ही हॉकी टीम भी दुलारी बन गई थी. और जब, विश्वकप के पहले ही मैच में भारतीय हॉकी  टीम के लड़ाकों ने चिर-परिचित प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ धमाकेदार जीत हासिल कर ली थी, तो मानों क्रिकेट को भूलकर समूचा देश हॉकी के रंग में डूब गया था. दो साल पहले रिलीज होकर भारत में हॉकी को फिर से जिंदा कर देने वाली शाहरूख खान की फिल्म ‘चक दे इंडिया’ की तर्ज पर खेलप्रेमियों ने टीम को एक नया नारा भी दे दिया था-‘चक दे हॉकी ’.

लेकिन अफसोस, पाकिस्तान के खिलाफ यह शुरूआती जीत चार दिन की चांदनी ही साबित हुई. पाकिस्तान को पहले ही मुकाबले में 4-1 से करारी शिकस्त देने वाली टीम ने अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ जोश, जूनून और जीतने का जज्बा सबकुछ दिखाया था. इसी के साथ अचूक डिफेंस, सटिक पेनल्टी कार्नर और आक्रामक रणनीति की भी इस मैच में पाकिस्तान के खिलाफ जीत में अहम भूमिका रही थी. लेकिन बाद के मुकाबलों में टीम की यह सभी खूबियां पूरी तरह से बेअसर साबित हुई. स्पेन और इंग्लैंड के खिलाफ टीम के मिडफिल्डरों, पेनल्टी कार्नर विशेषज्ञों ने मूलभूत गलतियां की, जिसके चलते टीम ग्रुप राउंड में ही विश्वकप की खिताबी दौड़ से बाहर हो चुकी है. अब भारतीय हॉकी के लिए यह पोस्टमार्टम का दौर है. नतीजतन, जब दूसरी टीमें विश्वकप के अपने अभियान में पूरे जोश के साथ जुटी हुई थी, भारतीय हॉकी के तारणहार एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे थे या फिर बहानेबाजी करते हुए अपने प्रशंसकों के मायूस और गुस्सेल चेहरों से आंखें चुरा रहे थे.

सवाल यह उठता है कि आखिर भारतीय टीम की ऐसी दुर्गति क्यों हुई ? घरेलू मैदानों और अपने दर्शकों के बीच खेलने का मनोवैज्ञानिक फायदा दुनिया के किसी भी खेल में किसी भी देश की टीम को मिलता है. जाहिर है, भारतीय हॉकी टीम के लिए भी यह फायदा मौजूद थी. वह अपने घरेलू मैदानों पर अपने समर्थकों के बीच खेल रही थी. बावजूद इसके, घरेलू मैदान और प्रशंसक भी भारतीय टीम में वह जज्बा पैदा नहीं कर पाएं, जो उन्हें खिताब जीतने के करीब पहुंचा पाता. और इस दुर्गति के लिए कईं वजहें जिम्मेदार हैं. सबसे बड़ी वजह यह रही कि भारतीय खिलाड़ियों अन्य देशों के खिलाड़ियों की तुलना में न सिर्फ शारीरिक तौर पर बेहद कमजोर थे, बल्कि मानसिक तैयारी के लिहाज से भी वे विपक्षियों के मुकाबलें उन्नीस ही साबित हुए. विश्वकप अभियान में पेनाल्टी कार्नर में मिले दर्जनों मौको को गोल में तब्दील न कर पाना भारतीय खिलाड़ियों की सबसे बड़ी नाकामी साबित हुई. तीन विषेषज्ञ डेग फ्रिलकरों के साथ मैदान में उतरने के बावजूद भारतीय खिलाड़ी पेनाल्टी कार्नर का फायदा उठानें में फीसड्डी साबित हुए. दूसरी ओर, विपक्षी टीमों ने भारतीय गोलकीपर को धता बताते हुए पेनल्टी कार्नर के लगभग सभी मौकों को गोल में तब्दील किया. भारतीय खिलाड़ियों की डीफेंस पंक्ति भी बेहद कमजोर साबित हुई. भारतीय खिलाड़ी विपक्षी टीम के खिलाड़ियों की न तो सही ढंग से मार्किंग कर पाएं, न उन्हें गोलपोस्ट के पास पहुंचने से रोक पाने लायक व्यूह रचना बना पाए. इसी का नतीजा रहा कि टीम स्पेन और इंग्लैंड के खिलाफ 5-2 और 3-2 के बढ़े अंतर से हारी. टीम के खिलाड़ियों के बीच तालमेल का अभाव तो था ही, विपक्षी टीम से निपटने के लिए अचूक रणनीति और आक्रामकता भी उनके खेल से नदारद थी.

मैदान में हुई भयावह तकनीकी गलतियों के साथ ही मैदान के बाहर के माहौल ने भी टीम को कमजोर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. विश्वकप में अपने अभियान के आगाज से ठीक पहले तक भी टीम विवादों से घिरी हुई थी. पैसे के विवाद को लेकर हॉकी इंडिया और खिलाड़ियों के बीच की लड़ाई सड़क तक पहुंच गई थी. यह विवाद जैसे-तैसे सुलझा, तो विश्वकप से ठीक पहले एक प्रदर्शनी मैच में खिलाड़ियों द्वारा एक करोड़ रूपए मांगे जाने की बात ने भी खूब तुल पकड़ा था. इन्हीं विवादों के चलते विश्वकप में अपने अभियान के आगाज से पहले ही टीम का मनोबल बूरी तरह गिरा हुआ था.

हालांकि विश्वकप में शर्मनाक प्रदर्शन के लिए पूरी तरह से खिलाड़ियों को ही जिम्मेदार ठहराना तर्कसंगत नहीं है. हॉकी इंडिया के पदाधिकारी और सरकार में हॉकी के प्रति उदासीनता भी इसके लिए बराबर जिम्मेदार हैं. हॉकी का ककहरा भी न जानने वाले पदाधिकारी बीतें सालों में देश में हॉकी की दुर्दशा के बीच भी उदासीन रवैया अपनाएं हुए हैं. इसी का नतीजा है कि न तो खिलाड़ियों को पर्याप्त पैसा मिल पाता है और न ही पर्याप्त सुविधाएं. यह भारतीय खेलों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं, आंखें खोल देनी वाली हकीकत भी है कि जहां भारतीय क्रिकेटर करोड़ों रूपए की सालाना कमाई करते हुए दुनिया के सबसे अमीर खिलाड़ियों में शुमार होते हैं, वहीं हाॅकी समेत अन्य खिलाड़ी एक लाख रूपए के लिए भी तरस जाते हैं. चंद लाख रूपयों के लिए हाॅकी खिलाड़ियों को जिस तरह हॉकी इंडिया के पदाधिकारियों से जीहूज्जत करना पड़ी, वह निश्चित ही शर्मनाक है. और पैसों के मामलें को खिलाड़ियों को किसी भी तरह से दोषी नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि इसके लिए हॉकी इंडिया पूरी तरह से जिम्मेदार है. हाॅकी इंडिया के उदासीन पदाधिकारियों ने न तो हॉकी की हालत सुधारने के लिए बरसों से कोई गंभीर प्रयास किया है और न ही अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से निभाया है. नहले पर दहला यह कि वर्तमान में यूपीए सरकार में खेल मंत्रालय वहीं केपीएस गिल संभाल रहे हैं, जो देश में हॉकी की दुर्दशा के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है. हॉकी इंडिया देश में हॉकी के गिरते स्तर को लेकर किस कदर उदासीन है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह टीम के साथ कोच के तौर पर एक विदेशी कोच जोसे ब्रासा को जोड़े हुए है. विश्वकप के सभी मैचों में यह बिल्कुल साफ था कि भारतीय खिलाड़ियों और कोच के बीच सामंजस्य का बेहद अभाव था. विदेशी होने की वजह से ब्रासा भारतीय खिलाड़ियों के खेल, उनके बेकग्राउण्ड और उनकी खूबियों-कमजोरियों के बारे में ज्यादा नहीं जानते. ऐसे में टीम से मैदान में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है. विष्वकप में शर्मनाक षिकस्त के बाद ब्रासा ने बहानेबाजी बनाते हुए बयान दिया कि भारतीय खिलाड़ियों में अनुभव का अभाव था. जबकि हकीकत यह है कि टीम के आधा दर्जन खिलाड़ी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सौ से भी ज्यादा मैच खेल चुके हैं. विदेषी कोच ब्रासा भारतीय खिलाड़ियों के बारे में कितना जानते हैं, इसका अंदाजा उनके इसी बयान से लगाया जा सकता है. सरकार का हाॅकी को लेकर उदासीन रवैया भी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है. पहले से ही करोड़पति क्रिकेटरों के ऊपर वक्त-बेवक्त पैसे की बारिश करने वाली सरकार को हाॅकी के खिलाड़ियों पर तरस नहीं आता. चूंकि हाॅकी में क्रिकेट की तरह ग्लैमर नहीं है, इसलिए सरकार भी उससे दूर ही रहती है.

वैसे, इस बार विश्वकप भारत में ही हो रहा था, इसलिए कुछ उम्मीदें फिर भी बंध गई थी. टीवी पर वीरेंद्र सहवाग, प्रियंका  और राज्यवर्धन राठौर जैसी ग्लैमर शख्सियतें विश्वकप में भारतीय टीम को समर्थन देनें की बात कहते नजर आती थी. लेकिन अफसोस कि इससे कुछ नहीं हुआ. कड़वी हकीकत यह है कि भारतीय हॉकी अभी भी रसातल में है. उसे फिर से जिंदा करने के लिए प्रियंका चैपड़ा और वीरेंद्र सहवाग को जोड़ने से बात नहीं बनने वाली, बल्कि इसके लिए जमीनी स्तर पर जरूरी कदम उठाने होंगे. अफसोस कि ऐसा दूर-दूर तक होता दिखाई नहीं होता.

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About पुष्पेन्द्र आल्बे

मैं हमेशा से ही लेखक बनना चाहता था, लेकिन जीवन के शुरूआती सालों में पता नहीं था कि लक्ष्य तक पहुंचा कैसे जाए ? सो, माता-पिता के दबाव में साइंस सब्जेक्ट लिया और एमएससी कर लिया. लेकिन सरकारी नौकरियों से अपना जी घबराता है, शुरू से ही. सो, घर से बगावत की और शहर से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर आ गए, अखबार में नौकरी करने. शुरूआत खराब रही,, चपरासी के तौर पर भी एक अखबार में काम करना पड़ा, लेकिन अपन भी कहां हार मानने वाले थे. दो सालों के भीतर ही उस अखबार के न्यूज एडिटर बन बैठे. अखबार का नाम है ‘प्रभातकिरण-मप्र का सबसे प्रतिष्ठित सांध्यकालिन अखबार. अब पत्रकारिता जगत में आठ साल होने को आए हैं, उसी अखबार में न्यूज एडिटर हैं, तो एक राष्ट्रीय न्यूज पत्रिका में काॅपी एडिटर की जिम्मेदारी संभाल रहा हूं. क्रिकेट और फिल्मों के अपन बचपन से शौकीन हैं, सो हाल ही में दो नए ब्लाॅग भी शुरू किए हैंः WWW.bollywoodextraa.blogspot.com www.cricextraa.blogspot.com उम्मीद है, जल्द ही इन ब्लाॅग को वेबसाईट का रूप देने में कामयाब हो जाऊंगा. तब तक, सफर जारी है, जिंदगी का.... मेरा मंत्र बहुत स्पष्ट है: "you cannot reach out to people by saying things the same way you have been saying them. You have to say them differently.” . "और मुझे लगता है कि मैं उस के लिए अब तैयार हूँ ...

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