
जे.पी और कश्मीर समस्या
जे.पी. का व्यक्तित्व अनूठा था। वे स्वयं को किसी विचारधारा से बांध कर नहीं रख सके। कारण था कि हर विचारधारा में गुणों के साथ अवगुणों को भी स्वीकारना पड़ता है, जो जे.पी. के लिए संभव नहीं था। इसका निराला तरीका उन्होंने यह निकाला कि हर विचारधारा के गुणों को वे अपने में समाहित करते रहे और जिन बातो को उनका ह्दय नहीं मानता था, उन्हे वे अपने पास फटकने भी नहीं देते थे। उनके व्यक्तित्व में माक्र्स, लेनिन और महात्मा गांधी का एक शानदार सम्मिश्रण था। देश की आजादी के साथ विरासत में मिली कश्मीर समस्या के प्रति उनका नजरिया भी देश हित में बदलता रहा। कश्मीर के प्रति जे.पी. के दृष्टिकोण को यदि दो अलग-अलग भागो में समझा जाये तो इसमे हमे जमीन-आसमान का अन्तर दिखलाई पड़ता है।
भारत की स्वतंत्रता के साथ ही कश्मीर का भारत में विलय हो गया। हालांकि यह पूर्णतया वैधानिक विलय था तथापि जयप्रकाश नारायण के अनुसार कश्मीर के लोगो के दिलों में भी भारतीयता की भावना होगी तभी उसका वास्तविक विलय भारत में होगा। वे केन्द्र सरकार के इस रूख से भी इत्तफाक नहीं रखते थे कि शेख अब्दुल्ला को अलग-थलग कर दिया जाये। शेख अब्दुल्ला की नीतियां भारत के समर्थन में कम थी और विरोध में अधिक थी, फिर भी जे.पी. उनके समर्थन में थे। उन्होंने शेख अब्दुल्ला के इस तर्क का भी समर्थन किया था कि कश्मीर का भविष्य कश्मीर की जनता तय करेगी। यह केन्द्र सरकार के विरोध स्वरूप था या कोई अन्य कारण यह जे.पी. ही बेहतर जानते थे। 1953 में शेख अब्दुल्ला को जेलबन्द कर दिया गया और जे.पी. ने इसका मुखर विरोध किया। जे.पी. का तर्क भी दमदार था। उनके अनुसार शेख अब्दुल्ला के बगैर घाटी में हुए सभी चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र नहीं है। एक दशक बाद जब जनमत संग्रह की बात उठी तो इसका भी जे.पी. ने समर्थन किया। इसी दौरान उनके एक वक्तव्य ने जम कर राजनीतिक गर्मी पैदा कर दी। उन्होंने कहा,‘‘मुझे यह असत्य लगता है कि कश्मीर के लोगों ने भारत से मिलने का निर्णय कर लिया था। वे (कश्मीर के लोग) ऐसा कर सकते हैं, किंतु उन्होंने अभी तक ऐसा नहीं किया है। यदि हमें कश्मीर के लोगों के निर्णय में इतना विश्वास है तो हम उन्हे द्वितीय अवसर का विरोध क्यों कर रहे हैं ? इस वक्तव्य के बाद उनके प्रति देश के अनेक राष्ट्रवादी लोगों का नजरिया नकारात्मक रूप से बदला। कुछेक ने उनकी एक सभा में पहुंच कर बेहुदगी भी की।
जे.पी. पर इन सबका कोई असर नहीं हुआ उल्टे वे 1964 में ही पाकिस्तान की यात्रा कर आए। वहां उन्होंने राष्ट्रपति अयूब खां के साथ विचार भी किया और पाकिस्तान के संयुक्त प्रतिरक्षा के विचार का समर्थन भी किया।
1965 में भारत पाकिस्तान के मध्य युद्ध हुआ। इस युद्ध के बाद जे.पी. का कश्मीर के प्रति नजरिया पूरी तरह बदला हुआ माना जा सकता है। पहले वे कश्मीर से संबंधित किसी भी वार्ता में पाकिस्तान को शामिल किये जाने का समर्थन किया करते थे वहीं अब दो टूक शब्दों में उन्होंने कहा,‘‘Kashmir chapter is closed for Pakistan.Now there are only two party remains i.e.k~ Government of India and People of J & K”
जे.पी. के रूख में इस तरह के बदलाव के पीछे पाकिस्तान के प्रति उनके नजरिये में गंभीर परिवर्तन को समझा जा सकता है। उनकी नजर में यदि कश्मीर को स्वतंत्र कर दिया गया तो पाकिस्तान या तो उसके हड़प लेगा या बर्बाद कर देगा। जे.पी. ने यह स्पष्ट मत बना लिया था कि कश्मीर की भलाई इसी में है कि वह भारत का अंग बने। हालांकि उन्होंने शेख अब्दुल्ला से वार्ता का समर्थन किया लेकिन साथ ही कश्मीर की अधिक स्वायत्ता के प्रति भी उनके मन में समर्थन के भाव दिखलाई पड़ते थे।
जैसा का जे.पी. का व्यक्तित्व भी था। सही पक्ष के प्रति अपने समर्पण को उन्होंने कभी हीन नजरों से नहीं देखा। जो सही लगा, उसका अनुसरण किया, उसके समर्थन में जुट गये। कश्मीर के बारे मे जे.पी. के द्वितीय विचार आज कितने प्रासंगिक हैं यह हम समझ सकते हैं। पाकिस्तान के हिस्से वाले कश्मीर की बदहाली और भारतीय कश्मीर का अपेक्षाकृत विकास इसकी कहानी कहता है। वहीं पाकिस्तान कश्मीर की बर्बादी के लिए जुटा हुआ है, जिसके बारे में जे.पी. ने बहुत पहले ही आगाह कर दिया था। जे.पी. के कश्मीर के प्रति विचार उनके दो नजरियों को प्रदर्शित करते हैं लेकिन दोनों पर विचार करने से पूर्व हमें समकालीन परिदृश्य को भी मध्यनजर रखना चाहिये।


