महंगाई की चौतरफा मार


महंगाई रे महंगाई
मार गई ये महंगाई
दाना-पानी छीन गया मेरा
दे गई मुझको ये तनहाई

ना मुझको अब काम मिले
ना मुझको आराम मिले
दौड़ा-दौड़ा फिरता हर दिशा
फिर भी ना कोई राम मिले

क्या मीठा ये मन होगा
कड़वा सारा जग होगा
की बादल है छाई
भीगा इससे जो तन होगा

क्या हम दौड़ेंगे जो सरपट
विकास की सीढ़ी क्या ख़ाक चढ़ेंगे
टूटी पड़ी होगी कमर हमारी
आतंकवाद से हम क्या ख़ाक लड़ेंगे

भ्रष्टाचार हर दिशाओं में है फैला
यहाँ पाप का भर गया है घैला
अब दौड़ प्रभु यहाँ आन लड़ो तुम
हर इंसानों/नेताओं का मन हो गया है मैला

Tags: , , ,

About नरेन्द्र निर्मल

नरेन्द्र निर्मल , जनोक्ति के कार्यकारी संपादक हैं . निर्मल मूलतः बोकारो (झारखण्ड) के निवासी है और वर्त्तमान में दिल्ली में पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं. गत पांच वर्षो से विभिन्न सामाजिक और काव्य मंचो पर उपस्थित रहे. निर्मल जी कवि और समाजसेवक के रूप में भी जाने जाते हैं. “वाई एम् सी ए ” से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर करने के बाद ‘ जन आवाज’ निर्माण संवाद ‘ जिन्दा लोग’ आदि पत्रिकाओं के साथ -साथ जयप्रकाश अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थान से भी जुड़े रहे हैं .
Subscribe to Comments RSS Feed in this post

One Response

  1. shabd vinyas sahi hai, parantu chhand muktlekhani ko itni sahajta se nahi liya jaa sakta.

    bhav tandra tut jaati hai…

    http://www.vicharmimansa.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*
*

  (To Type in English, deselect the checkbox. Read more here)
SEO Powered by Platinum SEO from Techblissonline Lingual Support by India Fascinates