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	<title>Comments on: बहू-बेटियों के हत्यारे, चले हैं बाघ बचाने</title>
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	<description>Daily news analysis , Hindi samachar ,Hindi magazine,Hindi website,a6V3sbK3z0d4m7JTOT6OQOVo1jQ</description>
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		<title>By: Krishna</title>
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		<dc:creator>Krishna</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 23 Feb 2010 10:16:42 +0000</pubDate>
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		<description>क्या बात कही आप ने सिंह साहब, यहाँ किसी के कलेजा नामक चीज़ ही नही है, और है भी रूमानी होने भर के लिए, मैं आप से निवेदन करूंगा कि दुधवा लाइव के लिए कुछ विचार अवश्य दें, ताके होमोसैपिएन्स नामक इस जीव की बुद्धि पर जूं रेग सके, और वह रूमानी होकर नही, बल्कि संजीदाह होकर बाघ और भ्रूण हत्याओं को रोकने के लिए आगे आये</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>क्या बात कही आप ने सिंह साहब, यहाँ किसी के कलेजा नामक चीज़ ही नही है, और है भी रूमानी होने भर के लिए, मैं आप से निवेदन करूंगा कि दुधवा लाइव के लिए कुछ विचार अवश्य दें, ताके होमोसैपिएन्स नामक इस जीव की बुद्धि पर जूं रेग सके, और वह रूमानी होकर नही, बल्कि संजीदाह होकर बाघ और भ्रूण हत्याओं को रोकने के लिए आगे आये</p>
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		<title>By: जयराम "विप्लव"</title>
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		<dc:creator>जयराम "विप्लव"</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 22 Feb 2010 09:33:33 +0000</pubDate>
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		<description>यह सब एक धन्धा बन गया है उच्च वर्ग के बीच . बाघ को बचाने की की इस मुहीम का मकसद सिर्फ उस तबके में एक आत्म संतुष्टि पैदा करना है की वो भी प्रकृति के लिए कुछ कर रहे हैं ! और इफ मुहीम का झंडा उठाने वालों का भी तो फायदा हीं फायदा है . बाघ रहे ना रहे कंपनी तो हिट है ! एक विज्ञापन में ब्लॉग लिखने की अपील भी की जा रही है लेकिन क्या यह सब एक स्वांग नहीं है ? क्या हम अपने स्तर पर पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार है ? ब्लॉग लिखने से पहले यह सोचना पड़ेगा . बाघ तो जंगल में हैं , पहले आस-पास की गायब होती गौरैयों के बारे में सोचना पड़ेगा. क्या कभी सोचा है हमने ? नहीं क्योंकि इनके गायब होने में हम हीं कसूरवार है . बाघ के बारे में इसीलिए सोचते और लिखते हैं क्योंकि इसके लिए सरकार और शिकारियों को दोष देकर अपनी भड़ास निकली जा सकती है .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>यह सब एक धन्धा बन गया है उच्च वर्ग के बीच . बाघ को बचाने की की इस मुहीम का मकसद सिर्फ उस तबके में एक आत्म संतुष्टि पैदा करना है की वो भी प्रकृति के लिए कुछ कर रहे हैं ! और इफ मुहीम का झंडा उठाने वालों का भी तो फायदा हीं फायदा है . बाघ रहे ना रहे कंपनी तो हिट है ! एक विज्ञापन में ब्लॉग लिखने की अपील भी की जा रही है लेकिन क्या यह सब एक स्वांग नहीं है ? क्या हम अपने स्तर पर पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार है ? ब्लॉग लिखने से पहले यह सोचना पड़ेगा . बाघ तो जंगल में हैं , पहले आस-पास की गायब होती गौरैयों के बारे में सोचना पड़ेगा. क्या कभी सोचा है हमने ? नहीं क्योंकि इनके गायब होने में हम हीं कसूरवार है . बाघ के बारे में इसीलिए सोचते और लिखते हैं क्योंकि इसके लिए सरकार और शिकारियों को दोष देकर अपनी भड़ास निकली जा सकती है .</p>
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