बहू-बेटियों के हत्यारे, चले हैं बाघ बचाने

देश की जनता में एकदम से बाघों को बचाने की होड़ शुरू हो गई है। लिख-लिख कर कागज काले कर डाले (वैसे अब कागज काले करने की जरूरत नहीं ब्लाग जो है) टी-शर्ट पहन डाली और भी जो तमाशा हो सकता था किया। सवाल ये उठता है कि बाघों की ये संख्या एकाएक तो कम नहीं हो गई? 1411 तक आने में बहुत समय लगा होगा किन्तु अब तक किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।
अब जबकि टी0वी0 पर विज्ञापन दिखाया गया और देश में कई स्थानों पर मुख्य-मुख्य लोगों की दिलचरूपी इस ओर दिखी तो हमें भी लगा कि बाघों को बचाया जाये।
सवाल फिर एक कि बाघों को बचायें कैसे? हमारा वश चले तो बाघों को पाल लें और रोज उनके द्वारा बच्चे पैदा करवाने का विकल्प वैज्ञानिकों और पशु-वैज्ञानिकों को तलाशने को कहें। रोज बच्चे पैदा होगे और बच जायेंगे बाघ।
कितना हास्यास्पद और विद्रूपता से भरा लगता है कि जिस देश में अभी भी कन्या भ्रूण हत्या हो रहीं हों, लगभग रोज ही देश के किसी न किसी कोने में कन्या बचाओ अभियान चलाया जा रहा हो वहाँ हम बाघों को बचाने में इंसान से संवेदनशीलता की आशा लगाये हैं।
एक आँकड़ा बताता है कि देश में स्त्री-पुरुष की संख्या में प्रति हजार लगभग 70 का अन्तर आ चुका है। जिसने भी मूक चीख फिल्म देखी हो (यह एक चिकित्सक द्वारा बनाई गई फिल्म है जिसमें गर्भपात करते समय का दृश्य है, इसमें भ्रूण की हृदय गति बहुत बढ़ गई है। वह अपना छोटा सा मुँह खोल रहा है, उसको दर्द का एहसास हो रहा है आदि-आदि) वह संवेदनशील है तो किसी भी स्थिति में गर्भपात की सलाह नहीं देगा।
ऐसी स्थिति में जबकि हम सभी को पता है कि भ्रूण में जान है, हम उसकी भी हत्या कर देते हैं। इसके अलावा थोड़े से शारीरिक सुख के लिए जिस्मानी सम्बन्ध तो बना लिये जाते हैं बाद में हमारे कूड़े के ढेर बच्चे की कब्रगाह बनते हैं। कभी इन नवजात बच्चों को कुत्ते खाते दिखते हैं तो कभी कौवे नोंचते दिखते हैं। इसके बाद भी शारीरिक सुख के लिए अवैध यौन सम्बन्धों के बनने-बनाने में कोई कमी नहीं आई है।
कितनी बेटियों को मौत की नींद सुला देने के बाद, कितनी बेटियों के साथ भेदभाव करने के बाद, कितनी मन्नतों के बाद एक बेटे का जन्म होता है और उसी बेटे के सुख में हम ग्रहण की तरह लग जाते हैं। उसकी शादी के बाद चन्द सिक्कों की कमी के कारण किसी दूसरे घर की बेटी को, जतन से माँगे और पाले गये अपने बेटे की पत्नी को जला देने, मार डालने तक में नहीं हिचकते हैं।
ये उदाहरण हमारी संवेदनशीलता को दर्शाते हैं। इसके बाद भी हम बिना शर्म संवेदित हैं जानवरों को बचाने के लिए। हो सकता है कि हमारी इस पोस्ट के बाद हमें पशु विरोधी समझा जाये किन्तु हमारे साथ ऐसा नहीं है। हम भी जानवरों के प्रति, पर्यावरण के प्रति उतना ही चिन्तित रहते हैं जितना आज आप सभी बाघों के प्रति हो रहे हैं।
चलिए यदि जानवरों की बात की जा रही है तो सिर्फ बाघ ही क्यों? क्या अब आपको आसमान में उड़ती चालें दिखती हैं? समाज की गंदगी साफ करने वाले गिद्ध आपने अंतिम बार कब देखे? कोयल की कू-कू आपने कब से नहीं सुनी। नीलकंठ के दर्शन के शुभ संकेत आपको कब से नसीब नहीं हुए? बागों में नाचते मोर देखे हैं पिछले एक-दो वर्ष में? (अरे! बाग ही नहीं तो मोर कहाँ नाचेंगे) बत्तख का तैरना आपके बच्चों ने कहाँ देखा है? इन्हें बचाने का जिम्मा क्या हमारा नहीं है या फिर इनके लिए भी एक टी0वी0 विज्ञापन की आवश्यकता है?
अपने दिमाग की बत्ती जलाइये। एक विज्ञापन में ब्रह्म वाक्य है ‘अपनी अकल लड़ाओ, दिखावे पर मत जाओ’ आप भी उसी का अनुसरण करो।
बाघ बचेंगे उनके जागने से जो बाघों को मारने में लगे हैं, उनको जगाओ। हम तो अभी बेटियों को, बहुओं को मारने में लगे हैं जब इनसे ही फुर्सत पायें तो बाघों को बचाने की ओर ध्यान दें!!!!!

Tags: ,

About कुमारेन्द्र

उ0प्र0 के बुन्देलखण्ड क्षेत्र के जनपद जालौन में 1973 को जन्म। शिक्षा के रूप में डिग्रियाँ बटोरते हुए बी0एस-सी0 (गणित) के पश्चात अर्थशास्त्र, हिन्दी साहित्य और राजनीति विज्ञान में एम0ए0 और साथ ही हिन्दी साहित्य में (वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन) पी-एच0डी0 की उपाधि प्राप्त की। पत्रकारिता में विशेष रुचि होने के कारण पत्रकारिता एवं जनसंचार का स्नातकोत्तर डिप्लोमा भी हासिल किया। ---- लेखन में बचपन से ही रुचि होने के कारण साहित्यिक यात्रा की शुरुआत वर्ष 1983 में ही कविता लेखन और उसके प्रकाशन के साथ प्रारम्भ हो गई थी। देश की लगभग सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों, कविताओं, लेखों, शोध-आलेखों आदि का नियमित रूप से प्रकाशन होता रहता है। ---- वर्तमान में पत्र-पत्रिकाओं के साथ ही इंटरनेट पर ब्लॉग के द्वारा एवं विभिन्न साइट के द्वारा भी लेखन में सक्रिय हैं। ---- अद्यतन दस पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है। इसमें एक कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह के अतिरिक्त तीन पाठ्यक्रम सम्बन्धी, दो पर्यावरण सम्बन्धी, एक कन्या भ्रूण हत्या निवारण सम्बन्धी पुस्तक प्रमुख है। ---- सामाजिक क्षेत्र में रुचि होने के कारण विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक संस्थाओं में भी सक्रिय भागीदारी। स्वयं द्वारा संचालित सामाजिक संस्था ‘दीपशिखा’ के प्रमुख कार्यकारी होने के साथ-साथ सूचना अधिकार का राष्ट्रीय अभियान के निदेशक, पी-एच0डी0 होल्डर्स एसोसिएशन के संयोजक तथा शोध संस्था ‘समाज अध्ययन केन्द्र’ के निदेशक पद का कार्यभार। ---- अन्तर्राष्ट्रीय साहित्यिक पत्रिका ‘स्पंदन’ तथा अन्तर्राष्ट्रीय रिसर्च जनरल ‘मेनीफेस्टो’ के सम्पादक। ---- सम्प्रति गाँधी महाविद्यालय, उरई में हिन्दी विभाग में प्रवक्ता पद पर कार्यरत। ---- सम्पर्क 09793973686 ई-मेल - dr.kumarendra@gmail.com वेब पेज - रायटोक्रेट कुमारेन्द्र (http://kumarendra.blogspot.com) - शब्दकार (http://shabdkar.blogspot.com)
Subscribe to Comments RSS Feed in this post

2 Responses

  1. क्या बात कही आप ने सिंह साहब, यहाँ किसी के कलेजा नामक चीज़ ही नही है, और है भी रूमानी होने भर के लिए, मैं आप से निवेदन करूंगा कि दुधवा लाइव के लिए कुछ विचार अवश्य दें, ताके होमोसैपिएन्स नामक इस जीव की बुद्धि पर जूं रेग सके, और वह रूमानी होकर नही, बल्कि संजीदाह होकर बाघ और भ्रूण हत्याओं को रोकने के लिए आगे आये

  2. यह सब एक धन्धा बन गया है उच्च वर्ग के बीच . बाघ को बचाने की की इस मुहीम का मकसद सिर्फ उस तबके में एक आत्म संतुष्टि पैदा करना है की वो भी प्रकृति के लिए कुछ कर रहे हैं ! और इफ मुहीम का झंडा उठाने वालों का भी तो फायदा हीं फायदा है . बाघ रहे ना रहे कंपनी तो हिट है ! एक विज्ञापन में ब्लॉग लिखने की अपील भी की जा रही है लेकिन क्या यह सब एक स्वांग नहीं है ? क्या हम अपने स्तर पर पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार है ? ब्लॉग लिखने से पहले यह सोचना पड़ेगा . बाघ तो जंगल में हैं , पहले आस-पास की गायब होती गौरैयों के बारे में सोचना पड़ेगा. क्या कभी सोचा है हमने ? नहीं क्योंकि इनके गायब होने में हम हीं कसूरवार है . बाघ के बारे में इसीलिए सोचते और लिखते हैं क्योंकि इसके लिए सरकार और शिकारियों को दोष देकर अपनी भड़ास निकली जा सकती है .

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*
*

  (To Type in English, deselect the checkbox. Read more here)
SEO Powered by Platinum SEO from Techblissonline Lingual Support by India Fascinates