शिक्षकों की गुणवत्ता में गिरावट


विश्वव्यापी आर्थिक संक्रमणकाल में जिसे देखो वही देश के हालात का रोना लेकर बैठा हुआ है। बौद्धिक जुगाली के केंद्र दिल्ली में तो विमर्श की कोई कमी नहीं है। हर दिन सैकड़ों सेमिनार, संगोष्ठियां आयोजित होती है। कुछ सुनने आते है और कुछ सुनाने। वाक् और श्रवण कला की इन प्रदर्शनियों में महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी आदि को याद करते हुए भ्रष्टाचार राग अक्सर सुनाई देता है।
राज अर्थ समाज, संस्कृति को लेकर भी बौद्धिक महकमें में बड़ी चिंताए छाई हुई है। वास्तव में सूक्ष्म रूप से अध्ययन किया जाए तो ये चिंताएं राष्ट्रव्यापी समस्या रूपी वृक्ष की पत्तियां, टहनियां वे शाखाएं है, जड़ तो है शिक्षा व्यवस्था! ज्ब बात शिक्षा व्यवस्था की हो तो मैकाले को अपशब्द स्नान करवा के हम कर्तव्यमुक्त हो जाते है। ऐसा अनुभव करते है जैसे पीढ़ीयों के पापों का हमने उद्धार कर दिया। लेकिन, जरा सोचिए कि आज का भ्रष्ट राज-समाज और संस्कृति कितने दिनों की हो?
आज से तीस वर्ष पहले भी तो उसी मैकाले की पद्धति रही लेकिन तब तो इंसानी मूल्यो में इतनी गिरावट नहीं थी। तो कालान्तर में ऐसा क्या परिवर्तन हुआ? दरअसल सब कुछ यथावत है, शिक्षक बदल गए है, उनकी गुणवत्ता, उनकी मानसिकता बदल गई है। शिक्षण का पेशा एक ऐसा व्यवसाय बन चुका है जहां लोग अन्य जगहों से लात मारे जाने के बाद पहुंचते है तब उनके पास कुछ बचा नहीं होता है और बचा भी होता है तो मनपसंद कार्यक्षेत्र न होने की वजह से अपना सौ प्रतिशत इस्तेमाल नहीं करते है।
शिक्षकों की गुणवत्ता में आई इस गिरावट का जिम्मेदार कौन है? वे लोग जो यू.पी.एस.सी., एस.एस.सी., पी.ओ. आदि की परिक्षाओं में नाकाम रहने के बाद मजबूरी वश शिक्षण या पत्रकारिता के पेशे में आते है। अथवा वे चयनकर्ता जो इन्हें चयननित कर लेते है यह जानने के बावजूद कि इनकी रूचि किसी और क्षेत्र में है।
क्या यह चयन प्रक्रिया दोषी नहीं है, जिसमें रूचि और समर्पण के बाद भी कुछ अंकों के हेर-फेर से सुयोग्य उम्मीदवार पीछे छट जाते है और अन्य कार्यक्षेत्र से ठुकराए हुए लोगों को जगह दी जाती है।

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About जयराम "विप्लव"

जयराम "विप्लव" , मुंगेर (बिहार) के रहनेवाले हैं. अपनी प्रारंभिक शिक्षा भागलपुर से पूरी करने के बाद दिल्ली का रुख किया. जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में स्नातक की उपाधि ग्रहण करने के बाद स्नातकोत्तर की पढाई कर रहे हैं .”जनोक्ति ” ब्लाग से अंतरजाल पर दस्तक देने के बाद आपने जनोक्ति डाट कॉम को स्थापित किया, जिसे आज वैचारिक जगत में अपने सुसंस्कृत और प्रभावी पाठ्य सामग्री के लिए जाना जाता है .आप अनेक सामाजिक संगठनो में उच्च पदों पर आसीन हैं और पथभ्रमित पत्रकारिता को प्रोफेसन से पैशन की ओर प्रवाहित करने के लिए निरंतर संघर्षरत हैं. आपसे संपर्क करने का पता है. ई-मेल – editor@janokti.com , janokti@gmail.com संपर्क सूत्र – +91-9555798502
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3 Responses

  1. समाज में किसी भी कमी पर दूसरों पर दोष मढ़ना एक आम बात है। आप ने भी ऐसा ही किया। शिक्षकों को दोष देने से पहले ये तो जान लीजिए कि हमारी सरकारी व्यस्था इस पेशे को ले कर कितनी गंभीर है। आप के लेख से ऐसा लगता है कि आप ने किसी एक राज्य (संभवत उत्तर प्रदेश) में प्रचलित प्रणाली को मद्दे नजर रखते हुए लिखा है और फ़िर उसको पूरे देश की शिक्षा प्रणाली का सच मान लि्या है। अलग अलग राज्यों में शिक्षकों की दशा एक सी नहीं है और उच्च शिक्षा और स्कूल शिक्षक की परिस्थतियां भी अलग हैं ।बेहतर होगा कि इस बारे में और विस्तार से चर्चा करें जनरलाइस करने के पहले।
    जैसी चिन्ता आप शिक्षक को ले कर बता रहे हैं वैसी ही चिन्ताएं समाज में डाक्टर, वकील, जज, पुलिस सब को ले कर जाहिर की जाती है। कौन पहले से बेहतर है?

  2. यथार्थ एवं आदर्श के बीच संतुलन आवश्यक है। पहले भारतीय शिक्षक आदर्शवादी होता था। वह स्वभावत: शिक्षक होता था, केवल धनार्जन के लिए नहीं। शिक्षा का भी मुख्य लक्ष्य ज्ञान होता था। वैश्वीकरण के युग में अब वह यथार्थवादी अर्थात भौतिकतावादी हो गया है। अतएव, अब शिक्षकों में अन्तर्निहित शिक्षणवृत्ति नहीं रह गयी है । वे अधिक आमदनी वाले रोजगारों को हासिल करने में असफल होने पर शिक्षण व्यवसाय की ओर रुख करते हैं।

  3. main aapki bat se puri tarah sahmat hun.Mujhe lagta hai ki sikshakon ki chayan prakriya bhi sahi nahi hai.

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