अंधेर नगरी|Shortlink: 2010/02/21 3:07 pm

शिक्षकों की गुणवत्ता में गिरावट

3 Comments

  • main aapki bat se puri tarah sahmat hun.Mujhe lagta hai ki sikshakon ki chayan prakriya bhi sahi nahi hai.

  • यथार्थ एवं आदर्श के बीच संतुलन आवश्यक है। पहले भारतीय शिक्षक आदर्शवादी होता था। वह स्वभावत: शिक्षक होता था, केवल धनार्जन के लिए नहीं। शिक्षा का भी मुख्य लक्ष्य ज्ञान होता था। वैश्वीकरण के युग में अब वह यथार्थवादी अर्थात भौतिकतावादी हो गया है। अतएव, अब शिक्षकों में अन्तर्निहित शिक्षणवृत्ति नहीं रह गयी है । वे अधिक आमदनी वाले रोजगारों को हासिल करने में असफल होने पर शिक्षण व्यवसाय की ओर रुख करते हैं।

  • समाज में किसी भी कमी पर दूसरों पर दोष मढ़ना एक आम बात है। आप ने भी ऐसा ही किया। शिक्षकों को दोष देने से पहले ये तो जान लीजिए कि हमारी सरकारी व्यस्था इस पेशे को ले कर कितनी गंभीर है। आप के लेख से ऐसा लगता है कि आप ने किसी एक राज्य (संभवत उत्तर प्रदेश) में प्रचलित प्रणाली को मद्दे नजर रखते हुए लिखा है और फ़िर उसको पूरे देश की शिक्षा प्रणाली का सच मान लि्या है। अलग अलग राज्यों में शिक्षकों की दशा एक सी नहीं है और उच्च शिक्षा और स्कूल शिक्षक की परिस्थतियां भी अलग हैं ।बेहतर होगा कि इस बारे में और विस्तार से चर्चा करें जनरलाइस करने के पहले।
    जैसी चिन्ता आप शिक्षक को ले कर बता रहे हैं वैसी ही चिन्ताएं समाज में डाक्टर, वकील, जज, पुलिस सब को ले कर जाहिर की जाती है। कौन पहले से बेहतर है?

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