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	<title>Comments on: हिन्दू मन की खोज</title>
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		<title>By: shankar dutt</title>
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		<dc:creator>shankar dutt</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Sep 2010 13:17:15 +0000</pubDate>
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		<description>कृष्ण जी ! मेरा मानना है कि ;   हिन्दू न तो कोई धर्म है न हमारे ग्रंथों में कहीं लिखा है कि &quot;ये&quot; हिन्दू धर्म ग्रन्थ हैं हिन्दू तो केवल एक सभ्यता है संस्कृति है &#124; इसलिए &quot;ये&quot; (ढांचा गिराना)   इनका  मानव स्वभाव है  जो इन्होने किसी आक्रान्ता के द्वारा तोड़े गए मंदिर पर खड़े उसके नाम के सदियों पुराने ढांचे को ढहा दिया &#124; क्या करें दुनिया की बुराईयाँ देख कर और सह कर अब इन्हें भी उसी नीति पर चलना भा रहा है &#124;  ये मानव स्वभाव की कमजोरी हैं &#124; दुनिया वाले तो शांति के दूतों को नहीं बख्स रहे, ये कमसेकम केवल हमलावरों की निशानियों को ही तोड़ रहे हैं &#124; इसमें अधिक शर्मिदा      
लगभग दो अरब वर्ष ( हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार)  प्राचीन संस्कृति, या सबसे पौराणिक धर्म, इसके अनुसार मान्यता है कि; हमें अपने पूर्व जन्मों का पाप भोगना ही पड़ता है &#124; इसे हिन्दू लोग प्राकृतिक न्याय मानते हैं &#124; तो ! कुछ लोग अपने पिछले जन्मों में दूसरे श्रेष्ठ धर्मों (उनके अनुसार) में पैदा होकर पाप कर्म करके, सजा भोगने को इस जन्म में हिन्दू धर्म में पैदा हो गए &#124; अब उन्हें कदम - कदम पर शर्मसार होना पड़ता है ; क्या करें कर्म ही ऐसे करके आये हैं &#124; दीवार की लकीर होती तो मिटा देते या इससे बड़ी खींच देते &#124; ये जानते हैं कैसे-कैसे विद्वान् महापुरुष हुए, वे तक ऐसा कोई काम नहीं कर पाए &#124;
अब दुर्भाग्य ये है कि जो अच्छे कर्म करके इस धर्म में पैदा हुए गर्व करते हैं, उन्हें भी शर्मिंदा होना पड़ता है कि वे सबसे श्रेष्ठ थे आज कुछ लोगों की गुलाम मानसिकता के कारण ये दिन देखने पड़ रहे हैं &#124;  इस धर्म ने अरबों वर्षों से अपनी दादागिरी चला रखी है कभी जगढ़ुरु बन जाता है तो कभी शांति का मसीहा &#124; और आज अपने ही उसको जो मर्जी सो बोल देते हैं क्या दिन आ गए ?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कृष्ण जी ! मेरा मानना है कि ;   हिन्दू न तो कोई धर्म है न हमारे ग्रंथों में कहीं लिखा है कि &#8220;ये&#8221; हिन्दू धर्म ग्रन्थ हैं हिन्दू तो केवल एक सभ्यता है संस्कृति है | इसलिए &#8220;ये&#8221; (ढांचा गिराना)   इनका  मानव स्वभाव है  जो इन्होने किसी आक्रान्ता के द्वारा तोड़े गए मंदिर पर खड़े उसके नाम के सदियों पुराने ढांचे को ढहा दिया | क्या करें दुनिया की बुराईयाँ देख कर और सह कर अब इन्हें भी उसी नीति पर चलना भा रहा है |  ये मानव स्वभाव की कमजोरी हैं | दुनिया वाले तो शांति के दूतों को नहीं बख्स रहे, ये कमसेकम केवल हमलावरों की निशानियों को ही तोड़ रहे हैं | इसमें अधिक शर्मिदा<br />
लगभग दो अरब वर्ष ( हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार)  प्राचीन संस्कृति, या सबसे पौराणिक धर्म, इसके अनुसार मान्यता है कि; हमें अपने पूर्व जन्मों का पाप भोगना ही पड़ता है | इसे हिन्दू लोग प्राकृतिक न्याय मानते हैं | तो ! कुछ लोग अपने पिछले जन्मों में दूसरे श्रेष्ठ धर्मों (उनके अनुसार) में पैदा होकर पाप कर्म करके, सजा भोगने को इस जन्म में हिन्दू धर्म में पैदा हो गए | अब उन्हें कदम &#8211; कदम पर शर्मसार होना पड़ता है ; क्या करें कर्म ही ऐसे करके आये हैं | दीवार की लकीर होती तो मिटा देते या इससे बड़ी खींच देते | ये जानते हैं कैसे-कैसे विद्वान् महापुरुष हुए, वे तक ऐसा कोई काम नहीं कर पाए |<br />
अब दुर्भाग्य ये है कि जो अच्छे कर्म करके इस धर्म में पैदा हुए गर्व करते हैं, उन्हें भी शर्मिंदा होना पड़ता है कि वे सबसे श्रेष्ठ थे आज कुछ लोगों की गुलाम मानसिकता के कारण ये दिन देखने पड़ रहे हैं |  इस धर्म ने अरबों वर्षों से अपनी दादागिरी चला रखी है कभी जगढ़ुरु बन जाता है तो कभी शांति का मसीहा | और आज अपने ही उसको जो मर्जी सो बोल देते हैं क्या दिन आ गए ?</p>
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		<title>By: Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'</title>
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		<dc:creator>Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 30 Jul 2010 12:00:49 +0000</pubDate>
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		<description>आदरणीय श्री कृष्ण कुमार जी आपके लेख को समझ सकने की समझ रखने वालों के लिये आपका आलेख निश्चय ही सोचने पर विवश करता है। हिन्दू धर्म एवं हिन्दू धर्म के अनुयाईयों की मानसिकता का आपने बहुत ही उम्दा विश्लेषण किया है।

लेख को ओपान्त (शुरू से अन्त तक) पढने पर लगता रहा, जैसे मैं आपका लेख नहीं पढ रहा, बल्कि आपके मुख से ही एक एक शब्द सुन रहा हँू। आपकी लेखन शैली गजब की है। जिसके लिये मैं केवल आपका आभार ही प्रकट कर सकता हँू।
इसे या तो मेरी समझ की कमी कहँू या फिर कोई और बात लेकिन इस विश्लेषणात्मक लेख के माध्यम से मैं आम व्यक्ति को कोई एक लाईन का सन्देश देने में अपने आपको अक्षम पा रहा हँू। मुझे कोई निष्कर्ष समझ में नहीं आ रहा है। लेख में पाठक को बांधे रखने और उसके विचारतन्त्र को हिला देने की शक्ति है, लेकिन कहीं भी कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया है। शायद यह मेरी समझ की ही कमजोरी रही है। धन्यवाद।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आदरणीय श्री कृष्ण कुमार जी आपके लेख को समझ सकने की समझ रखने वालों के लिये आपका आलेख निश्चय ही सोचने पर विवश करता है। हिन्दू धर्म एवं हिन्दू धर्म के अनुयाईयों की मानसिकता का आपने बहुत ही उम्दा विश्लेषण किया है।</p>
<p>लेख को ओपान्त (शुरू से अन्त तक) पढने पर लगता रहा, जैसे मैं आपका लेख नहीं पढ रहा, बल्कि आपके मुख से ही एक एक शब्द सुन रहा हँू। आपकी लेखन शैली गजब की है। जिसके लिये मैं केवल आपका आभार ही प्रकट कर सकता हँू।<br />
इसे या तो मेरी समझ की कमी कहँू या फिर कोई और बात लेकिन इस विश्लेषणात्मक लेख के माध्यम से मैं आम व्यक्ति को कोई एक लाईन का सन्देश देने में अपने आपको अक्षम पा रहा हँू। मुझे कोई निष्कर्ष समझ में नहीं आ रहा है। लेख में पाठक को बांधे रखने और उसके विचारतन्त्र को हिला देने की शक्ति है, लेकिन कहीं भी कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया है। शायद यह मेरी समझ की ही कमजोरी रही है। धन्यवाद।</p>
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