मुंबई से अमेरिका तक ……

सम्पादक उवाच | जयराम "विप्लव" | January 28, 2010 at 8:01 pm


वैश्वीकरण के इस दौर में जब दुनियां एक गांव बनने जा रही है तब ” आउट सोर्सिंग ” जैसे शब्द हम भारतीयों के लिए बेमानी है। एक ओर ओबामा आउट सोर्सिंग बंद करने के लिए अमेरिकी कंपनियों में टैक्स में छूट की घोषणा कर रहे है। तो दूसरी तरफ हमारे ही देश में महाराष्ट्र सरकार ने एक शासनादेश जारी कर अप्रत्यक्ष रूप से कुछ ऐस ही कदम उठाया है। इस आदेशानुसार मुम्बई में टैक्सी चलाने का परमिट केवल उन्हीं लोगों को दिया जाएगा जो मराठी लिखना, पढ़ना या बोलना जानते हैं। ठाकरे समूह की अलगाववादी कुकृत्यों से उभरने वाले वोट बैंक को लपकने की मारामारी के पीछे जो भी तर्क दिये जा रहे है वो भारत की मूल भावना के साथ खिलवाड़ है। “वसुधैव कुटुंबकम” की परंपरा का ढोल पीटने वाले भारत में ही वैश्विक सोहार्द की भावना को कुचला जा रहा है। ऐसा लगता है कि भाषा, बोली, क्षेत्र, रंग, रूप संस्कृति आदि के आधार पर देश ही नहीं संपूर्ण विश्व एक बार फिर विघटन के मुहाने पर खड़ा नजर आता है।

लोकतंत्र की अवधारणा के अनुसार कोई भी कानून या आदेश किसी के उपर जबरदस्ती थोपा नहीं जा सकता। यही कारण रहा कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में बहुमत होते हुए भी अब तक कोई भी सरकार हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा नहीं दे सकी है। विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में प्रत्येक नागरिक अपनी भाषा का इस्तेमाल कर रोजी-रोटी कमाने के लिए स्वतंत्र है। भेदभाव की भावना से ग्रसित होकर भाषाई अथवा क्षेत्र के आधार पर आउट सोर्सिंग को बंद करने का फैसला सीधे-सीधे मानवाधिकार का हनन है। विघटन के इन विषबेलों को यूं ही फलने-फूलने दिया गया तो अंततः राष्ट्र खण्डित होने के कगार पर पहुंच जाएगा, विश्व में पुनः औपनिवेशिक संक्रमणकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। यह सच है कि रोजी-रोजगार का परिदृश्य विभिन्न सामाजिक कारणों से बदलता जा रहा है। यह दबाव राष्ट्रीयता और उपराष्ट्रीयता के बोध को और भी संकीर्ण बना रहा है। महाराष्ट्र से लेकर अमेरिका तक जारी इस गैर मानवीय अभियान के विरूद्ध कोई तीखी प्रतिकृया सामने नहीं आ रही है तो इसे महज एक संयोग ही कहा जाएगा। विरोध के अभाव को सिर्फ पीड़ितों की कमजोरी मानकर अपनी छाती चौड़ी करने वाले लोग उनके क्षोभ को हवा देना चाहते है। आज जो विघटनकारी फिजा बन रही है उसमें वंचितों के संयंम को अधिक समय तक कायम रखना संभव नहीं होगा। जिस तरह से आंतरिक उपनिवेशीकरण का भय हिन्दी पट्टी में लोगों के अंदर स्थानीयता की भावना को भड़का रहा है। उसे राष्ट्रीयता की दुहाई देकर कब तक रोका जाएगा?

मानव स्वतंत्रता को गंभीरता से समझा जाए तो इसके मूल में रोजी-रोटी का सवाल निहित दिखाई पड़ता है। संसार के किसी भी स्वतंत्रता आंदोलन में आर्थिक पक्ष कितनी प्रबलता से समाहित था इसे समझना कोई कठिन काम नहीं हैं। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि रोजी-रोटी के अभाव का सीधा संबंध विकास से जुड़ा है। भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप उभरे इसके लिए आवश्यक हो जाता है कि राष्ट्रीय समग्र विकास की प्रक्रिया में आम लोगों को समान भागीदार बनाया जाए। ऐसा तभी संभव होगा जब भेदभाव से उपर उठकर, अखिल भारत को एक मानकर अलगाववादी ताकतो को दरकिनार करते हुए रोजगार सृजन की दिशा में कारगर कदम उठाए जाए।
फिलवक्त, अंतर्राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय माहौल में भाषा और क्षेत्र के आधार पर आउटसोर्सिंग बंद करने की विषमता मूलक नीति विश्व मानवता के लिहाज से चिंता जनक है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर ओबामा तक दुनिया को एकसूत्र में पिरोने और विकास को समावेशी बनाने की जरूरत पर बल देने की बात कहते है। लेकिन यह हकीकत से ज्यादा राजनीतिक स्वांग नजर आता है। अगर उनकी मंशा सही है तो वे इस दिशा में कुछ करते क्यों नहीं?

Tags: , , , ,

4 Comments

  1. कुमार अवि says:

    हिंदी को अभी तक राष्ट्रभाषा का क़ानूनी दर्जा नहीं मिला है ….. इस पर भी कुछ लिखना चाहिए . 

  2. Anonymous says:

    इन कांग्रेस्सियों का तो यही इतिहास रहा है . अपनी गद्दी बचाए रखने के किसी भी हद तक जा सकते हैं . एक तरफ मुंबई में अशोक चाहुव्वान  बिहारियों की जम के ले रहा  हैं दूसरी ओर बिहार में राहुल गाँधी भारत को सभी का देश बता रहा है . खुद को परगतिशील कहने वाला यह युवा नेता अपनी पार्टी की दोगली नीति को   प्रदर्शित कर रहा है . क्षेत्रवाद और भासावाद के बढ़ते उत्पात को कम करना कांग्रेस सरकार की जिम्मेदारी नहीं है ?  

  3. आपने एक गहन समस्‍या को विश्‍व परिप्रेक्ष्‍य में गंभीरता से उठाया है। वैसे अब हमें हिन्‍दी को राष्‍ट्रभाषा नहीं सीधे विश्‍वभाषा बनाने की ओर जुट जाना चाहिये।

  4. स्वेता चौबे says:

    मुंबई में मराठी मानुष के नाम पर जो गन्दा खेल ठाकरे खेल रहे थे उसे कांग्रेसी सरकार ने हथियाने की कोशिश की है . अब तो संघ अपने राष्ट्रवादी अजेंडे के साथ बीच में कूद पड़ा है . संघ ही क्यों भरत को एक मानने वाले तमाम शक्तियों को महारास्त्र सरकार और ठाकरे गुंडों के खिलाफ एक जुट होना चाहिए . आपने सही कहा पहले अपना घर संभाल लें फ़िर अमेरिका को भी देख लेंगे .

Leave a Reply

SEO Powered by Platinum SEO from Techblissonline