मैं मॉल के बाहर खड़ा अपेक्षा और उपेक्षा की मानसिक स्थिति से गुजर रहा हूँ . लाजिमी है राजू के निर्देशन में आमिर की फिल्म है कुछ अलग तो होगी हीं . मैं सिनेमा जाने से पूर्व फिल्म समीक्षाओं को पढने से परहेज करता हूँ ताकि फिल्म को लेकर किसी भी पूर्वाग्रह से बचा जा सके . मल्टीप्लेक्स में मौजूद दो अन्य फिल्मों में से ३ इडीयट के चुनाव के जो भी उत्प्रेरक तत्व रहे हों परन्तु इतना तो तय मानिए कि राजकुमार हिरानी और आमिर खान की प्रयोगधर्मिता सबसे ज्यादा बाध्य कर रही है . अंततः मैं अपनी सीट पर बैठा कहानी की स्वकल्पना में उलझा हुआ हूँ . अक्सर ऐसा होता है कि फिल्म शुरू होते हीं आपके दिमाग में आगे के सीन की कल्पना उभरने लगती है पर जैसे -जैसे कहानी आपकी सोच से परे होती जाती है आप फिल्म से बंधते चले जाते हैं . और अपनी इस हार में आपको बड़ा मज़ा आता है . क्योंकि इस हार में हीं फिल्म की जीत और आपके पैसों की वसूली छिपी होती है . राजकुमार हिरानी को एक व्यक्ति विशेष के रूप में देखें तो यह जाहिर होता है कि उम्र के किसी कालखंड में हर कोई एक सोच या बदलाव को लेकर समर्पित रहता है . यह बदलाव की अवधारणा उसके परिवेश और बौद्धिक समझ की फसल होती है . राजू शायद गत कुछ वर्षों से मानवीय मूल्यों को क्षरण को लेकर चिंतित मालुम पड़ते हैं . उनकी पिछली फिल्म मुन्नाभाई एम् बी बी एस ,चिकित्सा जगत में व्याप्त अमानवीय व्यवहार के साथ -साथ सामाजिक भेदभाव पर चोट करते हुए एक बेहतरीन आदर्श स्थापित करती है . फिल्म में डॉक्टर द्वारा मरीज को सबजेक्ट बताना और चिकित्सा के दौरान मानवीय संवेदनाओं को भूल जाना एक अभिशाप के तौर पर दिखाया गया है .
मनु के मानव को मनी की माया ने इस कदर घेर रखा है कि आज मानव के लिए मानव संसाधन जैसे शब्दों का प्रचलन हो चला है . जबकि व्यक्ति "मौजूद" होता है उपलब्ध नहीं होता . मानव के सापेक्ष में उपलब्ध शब्द का इस्तेमाल ही बदलते हुए मनोवैज्ञानिक मनुष्य का पतन है . फिल्म में नायक मुन्नाभाई द्वारा एक भावशून्य {सेंसलेस} तथाकथित सब्जेक्ट के प्रति आत्मीयता का भाव मात्र सारे प्रचलित दावों को झुठलाते हुए यह साबित करता कि एक आदमी का दूसरे आदमी से आदमीयता की भावना सर्वोपरि होनी चाहिए . राजू की फिल्म ३ इडीयट में भी शैक्षणिक प्रतिष्ठानों में फैले gair मानवीय व्यवहार पर करारा प्रहार किया गया है . प्रोफेसनल होने की होड़ में प्रतिष्ठानों में सफलता की बनी-बनाई परिभाषा को पुनः मूल्याँकन की मांग करती यह फिल्म कई अनुत्तरित प्रश्नों को दिमाग में छोड़ जाती है . कहीं ना कहीं दर्शक अपने आपको राजू रस्तोगी ,रणछोड़ दास और फरहान में से एक पाते हैं . यह किरदार कितने वास्तविक है, इन किरदारों को आप अपने आस -पास हर रोज देखते हैं . भीड़ में से कोई भी एक चेहरा उठा लें. आपको मिल जायेगा एक किरदार जो स्वयं को सामाजिक मानको और अपेक्षाओं को पूरा करते – करते अपने आप को खो चुका है. यह पहलु मात्र छात्रों पर हीं लागू नही होता. अभिभावकों पर भी अपेक्षाओं का दबाव उन्हें मनुष्य कम और प्रेसर कुकर का दाना अधिक बनाता है. यहाँ सब दबाव में है. वस्तुतः यह दबाव है हमारी अपनी नासमझी का. हमारी समझ पश्चिम द्वारा प्रचलित मूल्यों और संस्कारगत परिपोषित आदतों के बीच उलझ गयी है. यह सत्य है की अभिभावक अपने उम्रपर्यंत अपने बच्चों के सुखद भविष्य की कामना करते हैं. परन्तु कब यह कामना, बच्चों पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव में परिणित हो जाती, इसका आभास उन्हें भी नहीं होता. यह द्वन्द आज की जीवन शैली की उपज है. वर्ना भीष्म अपने पिता के सुखों हेतु स्वयं ब्रह्मचारी नहीं रहता , वर्ना श्रवण अपने माँ- बाप को तीर्थ भ्रमण कराने से पूर्व अपनी डिग्री पूरी करता.
फ़िल्म आज के दौर में बढ़ते आत्महत्या की प्रवृति के पीछे के कारणों को उद्घृत करती है. अभिभावकों की सोच और समझ पर गहरा आघात करती यह फिल्म उन्हें अपनी बात समझाने में सफल होती है. आज व्यावसायिकता के वृहत परिदृश्य में सभी हुनर और काबिलियत अपनी विशिष्ट पहचान और आर्थिक समर्थता का मद्दा रखतें है.
हिंदी फिल्मो का यह मान्य सत्य रहा है कि प्रमुख किरदार के नामकरन को लेकर काफी घिच-पिच मची रहती है. परन्तु इस फ़िल्म में रणछोड़ जैसे नाम के साथ भी आप आमिर को स्वीकारते हैं.
फ़िल्म बेहतरीन हास्य-पुट के साथ गंभीर विषयों को उठाने में पूरी तरह से सफल रही है. पूरी फ़िल्म में जो बात सबसे ज्यादा असरदार तरीके से मानसिक पटल पर छा जाती है वह है " काबिलियत के पीछे भागो , सफलता झक मारकर खुद-ब-खुद पीछे आएगी".
—–क्यों कि मेरी ज़िन्दगी उधार की है. यह कविता शायद ऐसी हीं मनोस्थिति की उपज थी.
क्यों कि मेरी ज़िन्दगी उधार की है
क्योंकि कई आसरे पलते हैं मुझसे
क्योंकि किसी ने मुझे पैमाना बनाया है
अपनी सफ़लताओं को बुलंद करने का
मेरी स्वतंत्रता, उनकी अज्ञानता!
दोनों ने परिभाषित किया है मुझे
मेरी हर कदम पर दयित्वबोध
मेरे कितने हीं अरमानों का गला घोंटता है
और मैं टुकडें टुकड़े मे जिता
बनाने में लगा हूं, एक पूरी तस्वीर
जो मेरे अपनों के बरामदे में टांगी जायेगी
मेरे सपनों की कब्र को देख, सब कहेंगे
वाह! बेटा हो तो ऐसा!
January 6, 2010 at 4:37 pm
फिल्म की कहानी के अतिरिक्त अन्य पहलुओं पर भी चर्चा होनी चाहिए . फिल्म में कैमरा और संपादन का कार्य भी बेहद शानदार रहा है . आमिर के साथ करीना वाली गाने में संपादन और विशेष प्रभाव की बेहतरीन प्रतुती की गयी है .
January 6, 2010 at 4:34 pm
आमिर खान की सारी फिल्मे काफी अच्छी होती है और उसमें मेहनत भी काफी की जाती है . एक शिकायत है फिल्म की कहानी के अलावा अन्य पहलुओं पर भी चर्चा होनी चाहिए .
January 6, 2010 at 4:32 pm
" all is well " बहुत उम्दा समीक्षा है …..इस स्तम्भ को जारी रखिये ……. नए साल की बधाई -