बिहार के छोटे भाई झारखण्ड ने लड़-झगड़ कर नया राज्य बनाया कि जानवरों का चारा तक डकार जाने वाले नेताओं से वनवासी जनता को बचाया जा सके ,उन्हें उनका हक़ मिल सके . शुरूआती दौर में तीन चार साल लालूराज के अंधियारे में मरांडी और कुछ समय तक मुंडा सरकार द्वारा विकास की रौशनी मिलने से लोग खुश होने लगे थे . खुशहाली के इस युग को जल्दी हीं भ्रष्ट राजनीति से उपजी लोकतांत्रिक अस्थिरता ने लील लिया . आया राम,गया राम की सी हालत हो गयी . देश के इतिहास में पहली बार एक निर्दलीय विधायक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुआ .चारा चोरों से भागते -भागते एक दिन झारखण्ड वासी खुद अपने हीं आदमी के हाथों हलाल हो गये . उन्हीं के आदिवासी मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने उनके पाकेट से ४ हजार करोड़ रूपये मार लिए .भारतीय लोकतंत्र की भ्रष्ट राजनीति का एक और उत्कृष्ट नमूना पेश हुआ .अब सीबीआई इस पर जांच करेगी …..सालों जांच का नतीजा क्या होगा आप सबको पता है ! दरअसल,मधु-कोड़ा अथवा लालू या माया-मुलायम कोई मुद्दा नहीं है मुद्दा है राजनीति से गायब होते सरोकार और मूल्यों का ,मुद्दा है बढ़ते भ्रष्ट राजनीतिक-सामाजिक जीवन का .
इसी मसले पर प्रस्तुत है लोकसभा टीवी के पत्रकार रमेश भट्ट की संछिप्त पोस्ट :-
भ्रष्टाचार आज हमारे दैनिक जीवन का एक बडा हिस्सा बन गया है। इसी बीमारी ने हमारे देश के 62 साल के विकास के सफरनामें में बडी रूकावाट पैदा की। नीति निर्माता जानते है। सरकार जानती है यहां तक की भ्रष्टाचार को पानी पी पी के कोसने वाले हम भी कम भ्रष्ट नही है। हम अपनी नैतिक जिम्मेदारी से बचने के लिए दूसरों के भ्रष्ट और अपने को गंगा नहाया समझते है। सही मायने में यही इस समस्या का मुख्य कारण है। वो कहते है ना, बुरा जो देखन में चला, बुरा न मिलया कोई, जो मन देखा आपनों, मुझसे बुरा न कोई। हमें कोई हक नही है दूसरों को भ्रष्ट कहने का। राजीव गॉंधी ने यह बात 1985 में कही थी कि गरीबी उन्मूलन योजनाओं के लिए केन्द्र से भेजा एक रूपये में सिर्फ 15 पैसा ही जरूरत मंदों तक तक पहुंच पाता पाता है। अब उनके लाल राहुल भी यही राग अलाप रहे है। कई सर्वेक्षण भारत में भ्रष्टाचार की हालात बता रहे है। कैग तो हर बार भ्रष्टाचार का काला चिटठा लाती है। मगर होता क्या है कितने लोगों के सजा मिल पाती है। आज सीबीआई छापे मार के लोगो की अकूत संपत्ती का पता कर रही है। मगर क्या वो इसके लिए जिम्मेदार लोगों को अंजाम तक पहुंचा पायेगी। आज कोई कहता है कानून बनाने वाले नेता भ्रष्ट है कोई कहता है न्याय देने वाला न्यायालय भ्रष्ट है कोई कहता है कि सुरक्षा देने वाली पुलिस भ्रष्ट है । सही कहा एक न्यायाधीश ने कि, इस देश को भगवान ही बचा सकता है। मगर क्या सिर्फ रोने से इस बीमारी का हल निकल जायेगा। हमने जो भ्रष्टाचार को मौन स्वीकारोक्ती दे रखी है उससे हमें बहार आना होगा। सुविधा शुल्क लेने देने वालो की दुकानदारी को ताला लगाना होगा। विदेश में जमा काले धन के वापस लाना होगा। साथ ही देश में छिपे काले धन को भी निकालकर गरीबों के विकास के लिए खर्चना होगा। चलिए ये तो छोटा खेल है। बडे खेल यानि तू भी खुश मैं भी खुश का खेल जो नेता और अफसर खेलते है। उसके लिए सरकार को कठोर होना होगा। एक ईमानदार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इच्छा से यह सब नही होगा। सरकारी नीतियों के लिए जवाबदेही तय करनी होगी। हर सरकारी योजना में चाहे वो नरेगा हो, मीड डे मिल हो, सार्वजनिक वितरण प्रणाली हो यह कोई और सब पर गिद्ध दृष्टि रखनी होगी। नेताओं, अफसरों और ठेकेदारो की सरकारी माल को लूटने से रोकना होगा। इनके जमीर को जगाना होगा। आज हर क्षेत्र में सुधार होने है। मगर इनमें बदलाव के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव साफ दिखाई देता है। चुनाव सुधार, प्रशासनिक सुधार, पुलिस सुधार सबके सब ठंडे बस्ते में पडे है। कितनी शर्म की बात है कि आजादी के 62 साल बाद 77 फीसदी जनता के एक दिन में खर्च करने की क्षमता 20 रूपये हैं। सरकार को समझना होगा कि भ्रष्टाचार भी एक तरह का आर्थिक आतंकवाद है, जिसके खिलाफ भी जीरो टांलरेंस की नीति अपनानी होगी। इससे जुडे मामलों की सुनावाई जल्द से जल्द निपटाने के लिए अलग से कोर्ट बनाने होंगे। सूचना के अधिकार, ई गर्वनेंस, सीटीजन चार्टर और सोशल आंडिट जैसे पारदर्शी तरीकों के प्रति जनता को जागरूक करना होगा। मीडिया को अपनी जिम्मेदारी का विस्तार करना होगा। सरकारी नीतियों से जुडी जानकारियों को जन जन की तक ले जाना होगा। सिर्फ जुबानी खर्च करने से कुछ नही होगा। हमें हर हाल में बदलाव लाना होगा।
मैं चाहूं तो निजा में कुहून बदल डांलू, फकत यह बात मेरे बस में नही।
उठो आगे बढ़ो नौजवानों यह लडाई हम सब की है, दो चार दस की नही।



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