NGO माफियाओं का अड्डा बना कंस्टिट्यूशन क्लब

ngo स्वयंसेवी संस्था जिसके नाम से ही प्रतीत होता है कि यह संस्था गरीबो, लाचारों, असहाय लोगों की मदद पहुचाती होगी। सरकार भी अफसरशाहों और नौकरशाहों के रवैये से इस कदर परेशान है कि आने वाले कुछ वर्षों में अपने सारे सहायतार्थ योजनाएं को स्वयंसेवी संस्थाओं को देने पर विचार कर रही है। इन्ही हालातों को देखकर भारत में स्वयं सेवी संस्थाओं का निर्माण धड़ल्ले से हो रहा है। लेकिन सच तो यह है कि आज देश में संस्थाओं का निर्माण लोक हितों को ध्यान में रखकर नहीं किया जा रहा है। बल्कि निज स्वार्थों को साधने और धनोपार्जन करने के उद्देश्य से बनाए जाते है।
देश में लगभग हजारों संस्थाए है, जिसमें ज्यादातर हाथी के दांत हीं हैं और इस रैकेट में न केवल छोटी संस्थाए है बल्कि बड़ी संस्थाए भी  शामिल है। बाहर से कुछ और अन्दर कुछ और । अपनी राजनीतिक गलियारों और सरकारी तंत्र में पहुंच बनाकर बड़े-बड़े कार्यक्रमों का आयोजन कर सामाजिक, सांस्कृतिक और रचनात्मक भूमिका समाज में बढ़ाने के नाम पर लाखोंलाख की धनराशि का बंटाधार कर देते है। हांलाकि, इन कार्यक्रमों से न तो असहायों को मदद पहंच पाती है । ना ही सामर्थ लोगों में वह उत्साह जगा पाती है जिससे वे असहाय और कमजोर लोगों को मदद पहुंचा सके। लेकिन ये संस्थाए अवश्य ऐसे समृद्ध लोगों अर्थात धनाड्य लोगों को मदद पहुचाती है जो येन-केन-प्रकारेन कमाए गये अपने काले धन को अपनी तिजोरियां या घर की चार दिवारी में छुपा सकें।
कई लोग तो ऐसे है जो संस्था का निर्माण केवल अपनी राजनीतिक पहुच बनाने के लिए करते है। ऐसी संस्थाओं के कार्यालय ज्यादातर उनके घर पर होते है और संस्थाओं में काम करने वाले लोग परिवार जन। कुछ संस्थाए तो ऐसी होती है जो केवल जयंतियाँ और श्रद्घांजलि  समारोह मनाने में माहिर होती है। प्रदेश में जिस पार्टी की सरकार हो उनके दिवंगत हो चुके प्रमुख लोगों के जयंतियाँ और श्रद्घांजलि कार्यक्रमों का वे अक्सर आयोजन करते रहते है। विडम्बना यह भी है ऐसे कार्यक्रमों के लिए उन्हे फंड भी आसानी से उपलब्ध हो जाते है। हाँ थोड़ी बहुत उन्हें राजनेताओं के तलवे चांटने होते है।
constitution club कंस्टिट्यूशन  क्लब ऐसी ही स्वयंसेवी संस्थाओं के दलालों का गढ़ बनता जा रहा है। जहां बैठने वाला हर छोटा बड़ा शक्स किसी न किसी संस्था का अध्यक्ष या सचिव होता है। कंस्टिट्यूशन क्लब नेताओं और दलालों का हब सेंटर के रूप में उभरता जा रहा है। जहां राजनैतिक सौदेबाजी और सरकारी नौकरशाह अक्सर दलालों से बड़े साठ-गाँठ में लगे रहते है। इस सांठगाठ में ऐसे पत्रकार भी शामिल है जो पत्र-अकारिता में ज्यादा विश्वास करते है।
कंस्टिट्यूशन क्लब में जितने भी कार्यक्रम में मैंने उपस्थिति दर्ज कराई उसमें ज्यादातर कार्यक्रम नेहरू परिवार से जुड़े दिखाई दिए। वह फिर चाहे इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, जवाहरलाल नेहरू की जयन्ती समारोह हो या फिर श्रद्घांजलि समारोह। इसके अलावा अगर कोई अवॉर्ड फंक्शन भी होता है तो उस फंक्शन के नाम के आगे इंदिरा गांधी या राजीव गांधी अवश्य लगा दिया जाता हैं। इससे एक बात तो साफ है कि इन नामों के लगने और एक कांग्रेसी नेता की पैरवी से ऐसी संस्थाओं को कार्यक्रमों के लिए लाखों रूपय आसानी से मिल जाते है। वहीं देश के अन्य क्रांतिकारियों और देश भक्तों के नाम से कार्यक्रमों का आयोजनों के लिए न तो कारपोरेट जगत ही उन्हें मदद करते है और ना ही सरकारी निगम।
दरअसल स्वयं सेवी संस्थाओं का एक मात्र काम होना चाहिए कि वह असहाय, निर्बल, असमर्थ, विकलांग, मजबूर लोगों के अलावा लावारिश जीव-जन्तुओं की मदद का कार्यक्रम चलाए। जिस तरह बढती आबादी के जंगलों की सफायें का कार्यक्रम चलाया जा रहा है जिससे जंगली जीव-जन्तु के जीवन पर जो खतरा मंडरा रहा है इससे पृथ्वी का संतुलन और जीवन चक्र भी खासा प्रभावित हो रहा है। उसे भी बचाने की जिम्मेवारी इन स्वयंसेवी संस्थाओं की होनी चाहिए। क्योंकि पूंजीपति वर्ग केवल लाभ चाहता है और इसके लिए वह किसी भी हद तक गिरने से कतराता नहीं है। और नेताओं और पूंजीपतियों की मिलीभगत किसी से छुपी भी नहीं है। संस्थाओं को लेकिन इसके लिए संस्था के नेता को राजनेता से साठ-गांठ कम आम जनता से जुड़कर कुछ नया प्रयास करने की जरूरत है।
इसलिए सरकार को चाहिए की संस्थाओं के निर्माण की रूपरेखा में बदलाव के साथ इस पर नियंत्रण स्थापित करने की जरूरत है और इसके लिए सरकार से ज्यादा आम जनता को संस्थाओं के रवैये को समझने और उसपर पैनी निगाह रखने की जरूरत है क्योंकि आने वाले दिनों में जब सरकार अपने कामकाजी भार कम करने के लिए स्वयं सेवी संस्थाओं पर आत्म निर्भर करने लगेगी तो ऐसे में जनता के मौलिक अधिकारों की जवाबदेही सरकार से कम इन स्वयं सेवी संस्थाओं से लेनी पड़ सकती है।

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About नरेन्द्र निर्मल

नरेन्द्र निर्मल , जनोक्ति के कार्यकारी संपादक हैं . निर्मल मूलतः बोकारो (झारखण्ड) के निवासी है और वर्त्तमान में दिल्ली में पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं. गत पांच वर्षो से विभिन्न सामाजिक और काव्य मंचो पर उपस्थित रहे. निर्मल जी कवि और समाजसेवक के रूप में भी जाने जाते हैं. “वाई एम् सी ए ” से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर करने के बाद ‘ जन आवाज’ निर्माण संवाद ‘ जिन्दा लोग’ आदि पत्रिकाओं के साथ -साथ जयप्रकाश अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थान से भी जुड़े रहे हैं .
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One Response

  1. एनजीओ माफिया ! नरेन्द्र जी आपने बहुत खूब शब्द निकला है ! वैसे आपकी बात खरी है . आज कल सेवाधर्म के आम पर सब मलाई मर रहे हैं ……. आखिर ये सब कौन हैं .? ये कहाँ से आये हैं ? क्या ये कोई एलियन हैं ? या फिर हमारे समाज से ही पैदा हुए है ? क्यों कर समाज में मूल्यों का ह्रास हो रहा है और अधिक से अधिक धन कमाने और जमा करने की होड़ लगी है ?

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