300 सौ करोड़ की आग और करोड़ों की जान का खतरा। सुनकर अटपटा लगा था आश्चर्य हुआ? जयपुर आईओसी डिपों में लगी आग से 150 करोड़ की तेल और लगभग इतने ही मूल्य की क्षति डिपों की हुई है। गुलाबी शहर से लेकर दिल्ली नोएडा तक आकाश छाई जहरीली गैस की धुंध से करोड़ों जानों का खतरा भी बना हुआ है। वातावरण का विषैला करने की क्षमता वाले गैसों के धुंए उसी आग की लपटों से निकले हैं जिनका परिणाम प्रभावित क्षेत्र की आबादी को रिसरिस कर भुगतना पड़ेगा। सिर्फ मानव स्वास्थ्य की बात नहीं है, ओजोन परत भी ऐसी ही गैसों से कमजोर होती जा रही है जो आज उपस्थित सबसे गंभीर समस्या ग्लोबल वार्मिंग को जन्म देने वाली है। आखिर कब तक यूं आग लगती रहेगी? यूं हानिकारक गैसों का रिसाव होता रहेगा? आखिर कब खत्म होगी आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में हमारी अकर्मण्यता इतना बड़ा प्रकृति विरूद्ध अग्निकांड हो गया, दिल्ली की सड़कों पर बेमौसम दिन भर धुंध छाई रही परन्तु न तो जनता और न ही सरकार के उपर कुछ खास प्रभाव पड़ा।
"एडजस्टमेंट’’ की आदत जो पड़ी है। हाँ, समिति जरूर गठित की गई है। पर उससे क्या होगा? एक तो समितियों की रपट आती नहीं और अगर आ भी जाए तो क्या संबंधित एजेंसिया अथवा विभाग आगे के लिए सतर्क होता है? नहीं, प्राकतिक आपदा, हो या आकस्मिक दुर्घटना या आतंकी घटना आदि अब तक गठित समितियों द्वारा सुझाए गए तथ्यों पर कभी अमल नहीं हुआ।
इस मुददे पर संबंधित विभागों और अधिकारियों की लापरवाही का सबके सामने है। डिपों निर्धारित सुरक्षा मानकों को पूरा नहीं करता था बावजूद इसके उसे खोल दिया गया।
(1) डिपों में लगे वाल्व खराब थे और उनमें लीकेज होता था।
(2) डिपों में लगा ऑटोमेटिक फोम पोरर सिस्टम भी काम नहीं कर रहा था।
(3) टैंक के नीचे आवश्यक एमरजेंसी आउटलेट नहीं था।
(4) तथा विंड फायर भी नहीं लगाया गया।
आग लगने के बाद भी एहतियात का ख्याल नहीं रखा गया। आननफानन में सेना बुला ली गई मानों युद्ध की तैयारी हो। लेकिन न तो फायर विशोषज्ञों से संपर्क किया गया और ना ही निकटवर्ती सहायता केंद्र अर्थात मथुरा रिफाइनरी से कोई मदद मांगी गई। अगर ऐसा किया गया होता तो शुरूआती दौर में ही आग खत्म हो जाती। इसे महज भूल के नाम पर टाला नहीं जा सकता है। प्रकृति और मानव के बीच अगर प्रदूषण की आग बार – बार लगाई जाती रही तो अन्य ग्रहों की तरह पृथ्वी भी जीवनशून्य होगा।


