बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं थे प्रभाष जोशी

सम्पादक उवाच | जयराम "विप्लव" | November 8, 2009 at 7:41 pm

Prabhash Joshi/

प्रभाष जोशी से मेरी जान-पहचान पुरानी ना सही पर तीन बरसों में कार्यक्रमों के दौरान हुई कुछ एक मुलाकातों का असर गहरा जरुर है .दिल्ली जैसे महानगर में प्रभाष जी का ठेठपन मेरे जैसे कितने गंवई इंसानों को उनके करीब चुम्बक की भांति खींच लाता था .जनसत्ता हो या तहलका उनके आलेखों को पढ़कर और यदा-कदा टेलीविजन के कार्यक्रमों में उनको सुनकर खुद को उनसे जुडा हुआपाता था ."प्रभाष जोशी " यह नाम पहली बार दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश हेतु साक्षात्कार के दौरान सुधीश पचौरी के मुख से सुना था .उन्हीं दिनों हिन्दी विभाग जामिया में दाखिला लिया तो जनसत्ता पढने की लत लगी और यहीं से शुरू हुआ प्रभाष जोशी और हमारा संबंध जो तक़रीबन एकतरफा होते हुए भी सीमाओं से परे था .एक पाठक की हैसियत से  देशकाल को लेकर जो समसामयिक सवाल  मन में कौंधते, उनका उत्तर 'कागद कारे' में उनको पढ़कर मिल जाया करता . इस अनोखे संवाद ने धीरे-धीरे जोशी जी को मेरे हर रविवार का साथी बना दिया था .जहाँ दिन भर जनसत्ता हाथ में लेकर उनके आलेख में मीनमेख ढूँढना मेरा काम था .ऐसा इसलिए की मुझे उनसे जलन होती थी आखिर हर कोई उनका नाम क्यूँ लेता है .मन हीं मन उनसे लम्बी बहस होती और उसी बहस से अपने विचारों की धार भी बनाता . लगभग ढाई बरस तक कागद कारे पढ़ते हुए उनकी साफगोई और वादनिरपेक्षता ने मुझे भी उनका प्रशंसक -समर्थक बना दिया था .हालाँकि आप मुझे उनका अंधभक्त नहीं कह सकते क्योंकि मेरा मानना है – 'किसी विचारधारा या व्यक्ति के विचारों को अनुसरित करने और खुद को उसमें बाँध लेने से स्वयं का विकास  और नए विचारों का मार्ग स्वतः अवरुद्ध हो जाता है .' 

प्रभाष जोशी को कुछ लोग गांधीवादी तो कोई समाजवादी और कुछ लोग तो ब्राह्मणवादी ,रुढिवादी पत्रकार बताते हैं . परन्तु मैं उन्हें सिर्फ और सिर्फ एक पत्रकार जानता और मानता हूँ . एक पत्रकार को पत्रकार हीं रहने दिया जाए तो बहुत है ! प्रभाष जी सच लिखते थे और उनके सच को पढ़कर ,सुनकर उन्हें कभी वामपंथी,कभी समाजवादी ,कभी रुढिवादी ,कभी ब्राह्मणवादी तो कभी संघी भी मान लिया जाता रहा है . अभी दो महीने भी नहीं बीते जब रविवार में छपे उनके एक साक्षात्कार को लेकर उन्हें ब्राह्मणवादी और संघी कहा गया { ब्राह्मणवादी या संघी होना गलत है या सही अथवा अपमानजनक यह अलग सवाल है } .हिन्दी चिट्ठाकारी के एक गुट ने उनके खिलाफ बेसिर -पैर का अभियान चलाने की कोशिश की थी .जोशी जी के नाम पत्रकारिता की दूकान चलाने वाले शायद भूल गये कि प्रभाष जोशी को किसी भी वाद से नहीं जोड़ा जा सकता है .क्योंकि प्रभाष जी की नज़रों में नंदीग्राम और गुजरात में बहाया गया खून एक था .उनके लिए सत्ता मद में चूर इंदिरा गाँधी और बुद्धदेव भट्टाचार्य में कोई भेदभाव नहीं था . उनके शब्द बाण किसी की व्यक्तिगत आलोचना में नहीं बल्कि शोषण और अन्य के खिलाफ शोषितों के हक में चला करते थे . क्या ऐसे किसी पत्रकार को किसी भी वाद से जोड़ना उचित है ? पत्रकार शब्द और उसके मायने स्वयं में परिपूर्ण हैं इसलिए यह सोचने की जरुरत  है कि किसी पत्रकार बोला जाए और किसे नहीं ? जोशी जी अनुकरणीय क्यों है और उन्हें पत्रकार क्यों माना जाए ? इन दो सवालों के जबाव उनके जीवनकर्म में समाहित हैं . प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट / कार्यकर्त्ता थे ,जो गाँव ,शहर ,जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर ना केवल समाज को खबर देते थे अपितु उसे दूर करने का हर संभव प्रयास भी उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का हीं एक हिस्सा  था .

आज प्रभाष जी इस दुनिया को त्याग कर अनंत यात्रा पर जा चुके हैं . उनके निधन पर शोक प्रकट करने वाले लोगों  व अखबारों और ब्लॉग पर स्मृति लेख के जरिये संवेदना जताने वालों ने उनके आगे आखिरी शब्द लगा कर इस बात को उभारने की भरसक कोशिश की है कि अब कोई प्रभाष जोशी जैसा नहीं बनना चाहता है .अब कोई उनकी समृद्ध पत्रकारीय विरासत का  दामन थामने को तैयार नहीं है .लेकिन क्या सच इतना अंधकारमय है ? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता ! कई नौजवान पत्रकार और पत्रकारिता के सैकड़ों छात्र उनकी इस विरासत से जुड़ने का ख्वाब पाल रहे हैं . ये वही लोग हैं जिनके बीच प्रभाष जी किसी न किसी कार्यक्रम में अक्सर आते और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहे हैं . 

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2 Comments

  1. anoop aakash verma says:

    MAIRI YAADO K PARBHASH JOSHI……..

    Ab ise mai apna durbhagay hi kahuga ki mai apne vishyvidyaalay parisar me jin logo k sanidhay me adhik samay vayteet karta hu wahan patrkarita par bhul kar bhi charcha nai hoti..shayad isliye patrkaarita par charcha aur PARBHASH JOSHI mere antarman ka adhyann hai..ek aur baat mujhe KATTAR shabd se bahut nafrat hai par na jaane ku is shabd ko jb PARBHASH JOSHI ji k aage laata hu to badi taslli hoti hai..isliye ye kahna mujhe apne astr par galat nai lagta ki PARBHASH JOSHI sahmuch ek KATTAR PATRKAAR the..ek aisa shaks jo puri trh se patrkaarita me racha basa tha……”parbhash joshi”is naam se mera parichay jamia me aane se pahle hua magr inhe padne ka avsar jamia me hi mila..mujhe inhe padne ka nasha bhi hua aur jalan bhi..magar mai apni is jalan k liye PARBHASH JOSHI k aakarshan bhare lekho ko jimmedar na mankar apne jamia k seneir bhaiyio ko jimmedar manta hu..aksr mai apne priye!! bde bhaiyio ko JANSTTA se adhik PARBHASH JOSHI par chacha karta hua pata..wo mujhe nirantr JANSTTA padne ki hidayat bhi dete magr unki baato va charchao ne mere antarman ko itna draa diya tha ki mai saal bhar jamia jaisi partishthit univarsity me rahne k bavjud bhi JANSATTA me ek adad chitthi likhne ki bhi himmat nahi juta paya..mujhe baar baar apne jamia k bade bhaiyo se ye sakhat hidayat milti ki yadi likhna hi hai to JANSTTA me likho,yahan-waqhan likhne se koi fayda nai..is baat ko mai samjhta jarur tha magar likhne ki himmat hi na hoti thi..aur jb mairi pahli chitthi JANSATTA me parmukhta k saath chhapi,to wo JANSATTA sirf JANSTTA tha PARBHASH JOSHI ka JANSATTA nai jisme kuchh likh kar chhapwane ki mairi aakanshha thi…isliye mujhe zra bhi khushi nai hui…..waise mare ek param mitr ne mujh par vyang bhi kiya ki-”BHAISAHAB PARBHASH JI K BAAD TO HAMNE JANSTTA PADNA HI CHHOD DIYA THA,MAGAR AAPKE LIKHNE K BAAD SOCHTE HAIN PHIR PADNA SHURU KAR DE..”mujhe is vayangy par barbas hi hasi aa gai,magar iske baad ek ajeeb se sukun ne mujhe apne antar bhanvar me kheech liya………………………..PARBHASH JOSHI ji se judi hui bahut si yaado ko maine apne man me samet rakha hai..magar yaha par shabd seema mujhe izzazat nai degi…to abhi na chahte hue bhi mai apni kalam ko rokna chahuga…..JAI HIND….anoop aakash verma………wwwanoopverma@gmail.com………….

  2. Rakesh Singh says:

    प्रभाष जोशी जी की साफगोई और भाषाशैली हमेशा मुझे मन्त्र मुग्ध करती रही है | उन्हें सत्य लिखने के क्रम मैं सेकुलरों या अन्य की परवाह नहीं की, इसीलिए सेकुलरों के विचारधारा के इतर इन्होने जब कभी सत्य लिखा …. सेकुलरों ने खूब हल्ला मचाया | ब्लॉग जगत के भी कुछ स्वार्थी तत्व ने जोशी जी के खिलाफ असफल अभियान चलाया | प्रभाष जोशी जी को सच्ची शद्धांजलि तभी मिलेगी जब उनके पत्राकारिता की महान विरासत को आगे बढाया जाए |

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