वर्तमान पत्र-अकारिता और माखनलाल चतुर्वेदी -3

OnteachingJournalism1 देश के अन्य पत्रों में जिनकी सेवाएं मूल्यवान ही रही हैं वे हैं अलमोड़ा की शक्ति और उसकी लगातार अपने क्षेत्र की राष्ट्रीय सेवाएं  बिहार के ‘देश’और ‘महावीर’आगरे का ‘आर्य मित्र’ आदि । ‘प्रताप’ के साथ  जिन पत्रों का उल्लेख होना चाहिए उसमें ‘सैनिक’ की तेजस्विता और उसके संपादक श्रीयुत श्रीकृष्णदत्त पालीवाल के प्रयत्न हिनदी भाषियों के आदर करने की चीज है।  ‘अभ्युदय’ का सेवा सतत जारी है और जब स्वयं पं. कृष्णकांत जी लिखते हैं तब इस पत्रों की हिन्दी में भारी कमी है। चित्रों में, अन्य मासिकों के साथ, पूना के श्रीयुत वासुदेव रावजी जोशी के प्रयत्नों के फलस्वरूप ‘चित्रमय जगत’ का भी विशेष ध्यान है।

                                           सज्जनों, जिस प्रांत से मैं आ रहा हूं उसके अधिकांश जिलों में हिन्दी भाषियों की बस्ती है, और ऐसा एक भी जिला नहीं जहां हिन्दी भाषान समझी जा सकती हो। उस प्रांत में अंग्रेजी भाषा के नाम लेने भर को अंग्रेजी में एक प्रांतीय सरकारी गजट रहा है, और एक अर्द्ध साप्ताहिक हितवाद निकल  रहा है । उस प्रांत में अंग्रेजी भाषा ने नाम लेने भर को अंग्रेजी में एक प्रांतीय सरकारी गजट रहा है, और एक अर्द्ध साप्ताहिक हितवाद निकल रहा है। इधर हितवाद ने बहुत कुछ तरक्की की है, किंतु उसका व्रत जनता की जोखिम से भरी राजनीति को साहस के साथ प्रकट करना नहीं है। इन दो पत्रों को छोड़कर प्रायः उस सूबे भर में हिन्दी और मराठी भाषा के पत्र प्रकाशित हो रहे हैं। मराठी भाषी पत्रों में नागपुर के महाराष्ट्र का दर्जा ऊंचा है। मेरी सम्मति में, हृदय की उच्चता में उसका स्वर मराठी ‘केसरी’ से भी कभी-कभी ऊंचा रहता है ।
                                                                                   महाशयों, हिन्दी पत्रों में कुछ समय पहले उस प्रांत में ‘प्रभा’ ‘श्री शारदा’ और  ‘हितकारिणी’ प्रकाशित हो रही थी, किंतु इस समय केवल ‘हितकारिणी’ ही किसी प्रकार चल रही है । सागर के ‘समालोचक’ को हिन्दी के सम्मानय और पुराने सुकवि एवं सुलेखक सैयद अमीद अली ‘मीर’ के आशीर्वाद और सहायता का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। यों मेरे देशभक्त तरूण अब्दूल गनी जिस साहस के साथ हिन्दी मु्स्लिम समस्याओं पर अपने विचार ‘समालोचक’ में प्रकट कर रहे हैं, हिन्दी जगत में मुसलमानों में हिन्दी-पत्रकारों में शायद वे अकेले ही होंहे। वे जातिगत पक्षपात को राष्ट्रीयता पर कभी कब्जा नहीं करने देते। नागपुर के उत्साही और देश भक्त श्रुयत सतीदासजी मूंदड़ा की सेवाओं के स्वरूप हिन्दी अर्द्ध साप्ताहिक ‘प्रमवीर’ने हिन्दी जगत की अच्छी सेवा की है। यद्यपि ‘प्रणवीर’ के मुख्य पृष्ठ पर वयोवृद्ध श्री राधामोहन गोकुल जी नाम ता, और वे कभी-कभी उस पत्र में लिखते भी थे, किंतु उस पत्र को यशस्वी ढंग से चलाने का श्रेय श्रीयुत रामगोपाल जी विद्यालंकार और श्रीयुत सिद्धानाथ माधव अगरकर को  ही हैं । वीरवर भाई विजय सिंह जी पथिक जब वर्धा से चल गए, तब क्षीमान सेठ जमनालाल जीके आश्रय प्राप्त वर्धा के ‘राजस्थान भी हिन्दी की सेवा की। यद्यपी  मैं उन धनिक सज्जनों कृतज्ञ हूं जिनकी सहायता से उस प्रदेश में साहित्य सेवा होती रही किंतु मैं अपना कटु अनुभल निहायत अदब से प्रकट करना चाहता हूं कि धनिक मित्रों के आश्रय वाले सामयिक पत्रों का जीवन सदैव दाता की लहर पर निर्भर रहा है और श्री शारदा, राजस्थान केसरी, राजस्थान और मारवाड़ी के रूप में धनिकों की वह लहर आयी और चली गयी। मध्य भारत के पत्रों मं महात्मा गांधी के हिनदी ‘नवजीवन’ के सहृदय संपादक पं. हरिभाऊ जी उपाध्याय ने हमारे जंगलों में लौटने पर ‘मालव मयूर’ मेंअपनी शक्तियां लगायीं। उसकासंपादन बहुत अच्छा होता रहा है। अभीकुछ दिनों से श्रीयुत गोपीवल्लभ जी उपाध्याय के संपादकत्व में, मालव विद्यापीठ की मुख्य पत्रिका ‘विद्या’ बड़े सुंदर ढंग से प्रकाशित हो रही है, और यदि धनिक लहर ने संपादक को मजाक न समझा तो  विश्वास करना चाहिए कि यह पत्रिका हिन्दी में अपना स््तान ढूंढने का यतन करेगी। यों तो ‘हिन्दी केसरी’ के रूप में मध्यप्रदेश ने सबसे पहले राष्ट्रीयता की गंभीर गर्जना कीथी और राष्ट्रीय सभाका सन 1990 का निर्णय झंड़ा सत्याग्रह और मध्यप्रांतीय सरकार पर प्रजा पक्ष के लोगों का असर यह बात स्पष्ट रूप से प्रकट कर रहा है कि उस प्रांत में पुरानी ज्योति को हिन्दी के सामयिक पत्रों ने जिंदा रखा है। मध्यप्रदेश में पत्रकार के नाते जिनकी शक्तियां कीर्तिमान नहीं हैं  उनमें वयोवृद्ध पंडित रघुवर प्रसाद जी द्विवेदी ,ठाकुर छेदीलाल जी, ठाकुर लक्ष्मण सिंह, पंडित नर्मदा प्रसाद मिश्र, पं. द्वारका प्रसाद मिश्र के नाम उल्लेखनीय है। गो0रक्षा पर समाचार-पत्रों में पं. गंगाप्रसाद अग्निहोत्री की धूम है और व्याकरण तथा शिक्षा में समाचार पत्र लेखकों में श्री पंडित गोपाल दामोदर तामस्कर, श्रीयुत मैथिलीप्रसाद श्रीवास्तर और श्रीयुत कुलदीप सहाय का नाम लिया जा सकता है।

                                                         ‘विनोद’ साहित्य का प्राण है यह दिशा हिन्दी में नयी है अतः इसे साधना भी श्रम-साध्य होता है। इस विषय में ‘मतवाला’ का नाम सूझ की दृष्टि से प्रथम लिया जा सकता है, यद्यपि उसकी रूचि से लोग अधिकतर सहमत नहीं हो पाते। प्रकट साम्प्रदायिक पत्रों में श्री ईश्वरी प्रसाद जी के संपादन में ‘हिन्दू पंच’ अच्छी सफलता, प्राप्त कर रहा है। पत्रों को शोभने वाली सूझ सदैव श्री नरदेव जी शास्त्री के ‘शंकर’ में देखने को मिलती है। ‘सेवा’ बालवीरों का सुंदर मासिक है उसका संपादन अभी कुछ तक बड़े अच्छे ढंग से होता रहा है। मेरा विश्ष, लक्ष्य जाता है, पं. हृषिकेश शर्मा द्वारा संपादित मद्रास प्रांत के उस हिन्दी प्रचारक मासिक की ओर जिसकी सेवाएं भारत के हृदय मिलाने तथा हिन्दी भाषा को राष्ट्रव्यापी बनाने के लिए हैं।

                                               सज्जनों,भारतीय भाषा-समुद्र के इन प्रचारकों की भुजाएं इंग्लैंड के मल्लाहों से कम कीमत की नहीं गिनी जा सकती । धार्मिक पत्रों में ‘समन्वय’ का दाम गनीमत है किंतु मद्रास प्रांत से श्रीयुत रामचंद्र जी शुक्ल के सम्पादकत्व में ‘युग-प्रवेश’ जो सेवा कर रहा है व कम मूल्य की नहीं। यों ‘रिलियो-पोलिटिकल’ ढंग से काम करने वाले पत्रों की उपयोगिता में ‘भारत-धर्म’ साप्तहिक और ‘भारत-मित्र’ दैनिक का उल्लेख होना जरूरी है। शिक्षकों के विषय में मैं गरीब अध्यापकों के मुख्य पत्र ‘अध्यापक’ की सेवाओं की कद्र करता हूं । भिन्न-भिन्न विषयों के पत्रों के प्रयोग के मासिक ‘विज्ञान’ की सेवाएं मूल्यवान हैं। बैठक में कई उपयोग  पत्र प्रकाशित हो रहे हैं जिनमें श्री किशोरी दत्त जी  शास्त्री का ‘चिकित्सक’ और ‘धन्वन्तरि’ उल्लेखनीय है। प्रोफेसर चतुरसेन जी शास्त्री ‘संजीवन’ लेकर आगे बढ़े थे किंतु उस अच्छे पत्र के पैर न जमे । वैद्यक के पत्रों का उल्लेख करते हुए यह कहना पड़ेगा कि आज से तेहर-चौदह वर्ष पं. जगन्नाथ प्रसाद जी शुक्ल के सभापतित्व में ‘सुधानीति’ श्रेष्ठता के साथ निकल रहा ता, वैसे पत्र का हिन्दी में बड़ी आवश्यकता है। हिन्दी पत्रों की रूचि अब विशेषांकों के रूप में आगे बढ़ रही है ‘चांद’ और ‘मनोरमा’ जैसे मासिकों के तो वर्ष में अनेक विशेषांक निकल जाते हैं । विश्वास होता है यदि हिन्दी जनता ने लक्ष्य दिया, तो इन पत्रों के विशेषांकों का स्वरूप ही इनका स्थायी स्वरूप होगा। तो भी यह कहना पड़ेगा कि चटक-मटक के सिवा उच्च रूचि, मौलिकता,कला और सम्पादकीय कौशल के दर्शन हमें अभी अपने पत्रों में बहुत कम हो पाते हैं।इधर गत बारह-तेरह वर्षों से समाचार पत्रों में कविताएं देने की चाल चल पड़ी है और यह दुःख के साथ देखा जाता है कि राष्ट्रभक्ति के नाम पर खून-फांसी, कऔर कालापानी का जो नाम लिया जाता है वे कविताएं चाहे  हिन्दी भाषियों को खूल-फांसी और कालापनी की सूरते न देखने दें, किंतु काव्य का जरूर खून कर रही हैं। तेजस्वी भावों के ळिखने से मतलब चमत्कारहीन और बिना कल्पना पहुंच का गद्य लिखना नहीं है।कविता, न तो रसों का देश निकाला है न भावों और कल्पनाओं ही का। उसमें राष्ट्र की धमनियों को छूने वाली ज्योति, प्रेम की उन्मादकारिणी लहर और चरित्र की तपोपूर्ण आत्मा होना चाहिए। कविताओं को सदा जिन्दा रहना चाहिए किंतु वे समाचारों से पहले ही मर जाती हैं और प्रायः अधकतम प्राणहीन होकर ही समाचार-पत्रों में आती हैं। प्रोस्ताहन का प्रारंभिक युग निकल गया, अब तो प्रत्यक्ष सेवा कीतपस्याका युग है। होना चाहिए ‘वीर-संदेश’ ही, किन्तु वे समचारों से पहले ही मर जाती हैं और प्रायः अधिकतम प्राणहीन होकर ही समाचार-पत्रों में आती हैं। प्रोत्साहन का प्रारंभिक युग निकल गया, किंतु वह अमर स्फूर्तिदायी और काव्यमय होना चाहिए। छायावाद हो परंतु अस्पष्टता की ओर सेबेसमझी की अद्दण्डता न हो, नियमों को तोड़-फोड़ डालिए, जमाना आपके लिए अलग नियम बनायेगा, खूब निरंकुश हो जाइए, किंतु वामीऔर अर्थ को तो अछूतारहने दीजिए, सब दिशाओं के बंधन टूट तोड़कर न रख दीजिए । यह उनके लिए हैं, जो सुकवि नये युग के संदेश वाहक हैं, जो नहीं लिखते जोकेवलल नवीनता की सृष्टि करन वाले  वाले तरूणों की आलोचना करते हैं या उनकी सेवाओं को  उपेक्षा की दृष्टि सेदेखते हैं सामयिक पत्रों के नाते उनसे क्या कहा जाये ? मैं आपसे पूछता हूं हिन्दी में हमारे इतने शक्तिशाली होने का दिन कब उगेका ? देश में अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी नहीं, किंतु पत्र-संपादन में हम अंग्रेजी की ओर दुर्लक्ष्य नहीं कर सकते ।

यह संपादन कला की मैके कीबाषा है, कला के संभलने का ज्ञान और विस्तार की सूचना अंग्रेजी ही दे सकेगी। कार्यालयों में उसके जाने वालों की बड़ी राशि रहनी चाहिए। अमेरिका छपाई के व्यापार में छठवां नंबर रखता है, भारत में हम अभी कीलों ही जोड़ रहे हैं। हमारी दोश पूर्ण वर्णमाला में हमने छापे के उपयुक्त सुधार नहीं किए । अंग्रेजी पत्र कहता है, ज्ञान में मेरे से समता करे ? क्या हम इस चुनौती का जवाब न देंगे ? क्या हम अपने पाठकों को यह कहने देंगे, भाई मैं इन बातों को क्या जानूं ? मैंने अंग्रेजी नहीं पढ़ी। विज्ञापनों के अस्तित्व के विषय में प्रत्रों मंे बहस का खिलवाड़ न हो। उपदेश, उदाहरण के शतांष मूल्य पर भी नहीं ठहरता । हां, नीति का ख्याल रखिए, रूचियों की उच्चता पर ध्यान रखिए । विश्वास कीजिए अंग्रेजी के शराब के विज्ञापनों से हिन्दी पत्र आज भी अच्छे हैं , केवल दवाओं आदि के विज्ञापन मात्र हटाना, एक न निभने वाली प्रतिज्ञा है।
                                          सज्जनों चीन के बादलों, एशिया की आवश्यताओं और जिम्मेदारियों को देखिए इस हलचल में हिन्दी के पत्रों का कौन सा स्थान होगा? क्या अंग्रेजी पत्रों की नकल करना, धारा सभाओं, असेम्बली, स्टेट कौंसिल, नरेन्द्र मंडल, स्वदेशी और विदेशी हलचलें, कहीं भी हमारे आदमी नहीं। कब तक ? कठोर घटना स्थलों के मैदानों और राजकर्त्ताओं के गुप्त षड़यंत्रों के भी च हमारे तरूण किस दिन प्रवेश परेंगे ? किस दिन हमारा कोई तरूण चार कपड़ों, बहुत छोड़ीजरूरत की वस्तुओं और केवल एक सिपाही की तरह थोड़ा सा खर्च लेकर लड़ाई के समाचारों की चोखम भरी जिम्मेवारी अपने सिर पर लेकर किसी हिन्दी पत्र के कार्यालय से विदा होगा ? किस दिन हमारे पत्रकार राजशासन को ऐसा झुला डालेंगे कि देश की ताकत देशवासियों के हाथों में होगी और हमारे पत्रकार युद्ध क्षेत्रों में जाकर टेलीफोन, तार और बेतार के तार का उपयोग कर भारत में संदेश भेज सकेंगे ? क्या ये सब गुलाम के स्वप्न है ? अब 124 ए, 153ए, और अन्य छोटी मोटी धाराओं से हम ऊप गये, किस दिन घोड़े के सवार की तरह तैयार चुस्त, बालचरों की तरह फुर्तीले और देश के गरीबों की तह भूख प्यास बर्दाश्त करने में पक्के होकर हमारे तरूण विदेशों में खबरें लाने जावेंगे ? और किस दिन उनकी भेजी हुई खबरों के बल पर राजकर्मचारी हमारे कार्यलयों में पूछताछ करेंगे औत तलाशियां लेंगे। जापान, अमेरिका, इंग्लैंडकी कहानियां पढ़ लीं । किस दिन हिन्दी पत्र अपने पत्रों के कार्यालयों से देश के शासक भिजवा सकेंगे ? किस दिन कहा जायेगा कि अमुक रण क्षेत्र का लड़ाका अमुक धारासभा का  सभापित, अनुक वैदेशिक मंत्री, हिन्दी उपसंपादक ता ? किस दिन हमारे तरूण युद्ध क्षेत्रों में लड़ाई के कप्तानों से सुनेंगे ‘अच्छा एडीटर साहब बिना इजाजत आप अमुक सीमा से बाहर नहीं जा सकते । अपने संवाद सांकेतिक भाषा में नहीं भएज सकते, और तब तक संवाद नहीं भेज सकते जब मैं देख न लूं मैं आपके संवाद और अखबार की खाक परवाह नहींकरता खबर जितना जरूरत समझूंगा, जाने दूंगा, जितना जरूरत समझूगा रोक लूंगा।’ इसके बाद वह फिर गरजकर कहेगा ‘तुम्हारे अखबार की प्रति मेरे पास पहुंचनी चाहिए मैं देखूंगा, संवाद भेजने में कोई चालाकी तो नहीं की गयी, आपके एडीटर-इन-चीफ न उसके शीर्षक देने में तो कोई चालाकी नहीं की।’

                                  हमारा अज्ञान तरूण-पूछेगा और ‘आज्ञाभंग’ या गलती का दंड ? और उत्तर पावेगा, ‘गलती का दण्ड, लाइसेंस का छिल जाना और जरूरत होने पर शत्रु पक्ष के साथ रहना, आज्ञा के भंग का दंड, कोटमार्शल’ यही गंभीर परिश्थिति होगी, जो हमारे तरूणों की बुद्धि की कसौटी होगी, जब वे घर से, साथियों से, स्वदेश से बहुत दूर कठोर अनूशासन में रहकर वार-पत्र कला की महान साधना को जन्म देगा। क्या यह कभी होगा ?यह जवाब में बूढ़ों के आशीर्वाद से चाहता हूं, मित्रों की संयुक्त शक्ति से चाहता हूं। और तरूणों की बलिदान की भावना से चाहता हूं।

 मैं कई जरूरी प्रश्नों की चर्चा न कर सका, यह परिमित समय के साथ ही, मेरी  स्मृति का, मेरे ज्ञान का अपराध है, मुझे तो न बोलना पड़ता यही अच्छा ता बोलते हुए एक बात मन में रह जाती है-

आबरू ली कलम उठाने ने

लायकी जान ली जमाने ने

थी खामुशी बयान से अच्छी

बात खो दी जुबां हिलाने ने।

 

( माखनलाल चतुर्वेदी जी का संभाषण समाप्त )

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कली बेच देंगे चमन बेच देंगे , धरा बेच देंगे गगन बेच देंगे, कलम के पुजारी अगर सो गये तो , ये धन के पुजारी वतन बेच देंगे बाज़ार के चंगुल से मुक्त अभिव्यक्ति का मन्च ब्लागिंग के रूप में सामानांतर विकल्प बन कर उभरा है तो हमारी जिम्मेदारी है कि छोटी लकीरों के बरक्स कई बड़ी रेखाए खिची जाएं. बाज़ारमुक्त और वादमुक्त हो समाजहित से राष्ट्रहित की ओर प्रवाहमान लेखन समय की मांग है. और इस दिशा में " जनोक्ति .कॉम " जनोक्ति वेब मीडिया का प्रथम प्रयास है

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