मानव स्वयं के होने के बोध यानि अहम् के साथ नहीं जन्म लेता हैं। अहं का भाव समय के की धारा के संग-संग दिलोदिमाग पर छा जाता है। यह बाहरी दुनिया से हमारे मन के संसार का मिलन होने से आता है। माता-पिता ,भाई-बंधू ,परिवार -समाज के नियंत्रण, उनकी अपेक्षाओं, सामाजिक व पारिवारिक परिवेश का मन के ऊपर प्रभाव होना स्वाभाविक हीं है।
प्रसिद्द मनोवैज्ञानिक फ्रायड इसे ईगो लिबिडो यानी आत्मरति कहते हैं। आत्मरति या आत्ममोह अर्थात खुद के लिए और प्रशंसा में एक असाधारण मनोभाव ।जब कोई माँ -बाप,परिजन ,शिक्षक आदि बच्चों से यह कहते हैं कि तुम बहुत खूबसूरत हो, मेधावी हो और दूसरों से अलग हो, तो आपको इसका तनिक भी बहन नहीं हो होता कि वो बच्चे में विशिष्टता का एक ऐसा भाव पैदा कर रहे हैं जो भविष्य में उसके व्यक्तित्व को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। बच्चों की एक सीमा तक तारीफ ही अच्छी है । तुलना की यह प्रक्रिया जब बहुत बढ जाती है और व्यक्ति कई स्थितियों में स्वयं को हीन महसूस करने लगता है । मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जिन बच्चों को विशिष्ट करार दिया जाता है, वे आगे चल कर आत्मकेंद्रित, अहमवादी और अक्खड़ बन जाते हैं। ऐसे बच्चे अपने गलत कार्य को भी सही मानने लगते हैं। बड़े होकर उनमें सहानुभूति की भावना बेहद कमजोर पड़ जाती है और वे धोखेबाज व बेवफाई जैसे कदमों को भी अपना बड़प्पन मानने लगते हैं जिन बच्चों को विशिष्ट करार दिया जाता है, वे आगे चल कर आत्मकेंद्रित, अहमवादी और अक्खड़ बन जाते हैं। ऐसे बच्चे अपने गलत कार्य को भी सही मानने लगते हैं। बड़े होकर उनमें सहानुभूति की भावना बेहद कमजोर पड़ जाती है और वे धोखेबाज व बेवफाई जैसे कदमों को भी अपना बड़प्पन मानने लगते हैं।
बचपन में पनपी आत्ममुग्धता की भावना धीरे-धीरे अति ओर बढ़ती हुई मनुष्य की मनोस्थिति को ऐसे स्तर पर ले जाता है जहाँ वह स्वयं को किसी की तुलना में हीन समझता है या फ़िर औरों को अपने समक्ष नगण्य । दोनों हीं स्थिति में मनुष्य की मनुष्यता का ह्रास होता है । यदि मानव के अन्दर हीनता का भाव पैठ जाए तो वह समाज से बचने का प्रयत्न करता है और इसी क्रम में अपने ऊपर एक छद्म आवरण बना लेता है ताकि दूसरो को उसकी वास्तविकता का ज्ञान न हो ।जब उसे लगता है कि उसकी असलियत जाहिर हो सकती है, वह रक्षात्मक हो जाता है। व्यक्ति यदि शक्तिसंपन्न हुआ तो रक्षा का यह तरीका डांट-फटकार और कमजोर हुआ तो उलाहनों, रोने व नकारात्मक सोच के रूप में सामने आता है। इस अवस्था में व्यक्ति को यदि चाटुकारों से पाला पड़ जाए तो इससे निकल पाना बेहद मुश्किल हो जाता है ।
मनुष्य के मनोविज्ञान पर शोध कर रहे ट्वेंजे मुताबिक पूर्ववर्ती पीढ़ियों की तुलना में आज बच्चे इसलिए अधिक आत्मकेंद्रित हो गए हैं, क्योंकि माता-पिता उनके दोष को भुला कर उनकी हद से ज्यादा तारीफ करते हैं। बच्चों पर ‘आत्मसम्मान संवर्द्घन अभियान’ जैसी मुहिम का भी असर पड़ा है। वे अपने को अधिक विशिष्ट समझने लगे हैं। बच्चे को यह बताना बंद किया जाना चाहिए कि ‘तुम खास हो’।


