भारत की संसद को गाँधी ने 1909 ई० में हीं बाँझ और वेश्या बताया था .धीरे -धीरे वेश्यावृत्ति के पावन कर्म में अपनी राजनीति भी शामिल हो गयी जो अब भारत को कुछ नया दे सकने की हालत में नहीं है . राजनीति का यह चाल -चलन तो 1990 से ही वैधानिक मान्यता पाने को उत्सुक है .आज की राजनीति का एक ही गणित है किसी भी विधि से सत्ता हासिल करो .सत्ता पाने और खोने की इस गणित में सब जायज है . यहाँ सत्ताधीशों की आँखों पर ऐसी परत चढ़ जाती है जिससे गलत और सही में फर्क दिखना ख़त्म हो जाता है . अब नक्सली द्वारा किये गये हालिया नरसंहारों को ही देखिये .नरसंहार हुआ नहीं कि राजनीति शुरू हो गयी. अपने-अपने गणित के अनुसार किसी भी दल को इसमें रूचि है ही नहीं .सभी दिल्ली में बैठकर मुंह चलाये जा रहे हैं . चमड़े का मुंह है कुछ भी बोलो ! आज बोलो कल मुकर जाओ ! कोई क्या उखाड़ लेगा? ऐसे में समस्याएं जड़ से कैसे साफ़ हों? .समस्याओं की गिनती में सत्तापक्ष और विपक्ष सभी भाषण करते हैं परन्तु, समाधान के नाम पर सांप सूंघ जाता है सबको .
मामले का एक पक्ष यह है कि नक्सलियों को इस तरह ताकतवर बनने किसने दिया ? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने पिछले कार्यकाल में दो बार ऑन रेकॉर्ड कहा है कि नक्सलवाद आजादी के बाद की सबसे बड़ी चुनौती है. अजी , आप देश के प्रधानमंत्री हैं. आपसे ताकतवर कोई दूसरा पद नहीं है. तो समस्या की गंभीरता को समर्पित अपना शोक किससे प्रकट कर रहे हैं , आप तो मामले हल की ताकत रखने वाले संवैधानिक पद पर हैं. आप हल ढूढिए ? अगर नक्सलवाद /माओवाद / उग्रवाद को समाप्त कर समाज में नई सुबह को आगाज करना प्रशासन के बूते से बाहर है, तो राजनीतिक बातचीत से ही पहल करें. इस मुद्दे पर किसी राजनीतिक प्रयत्न को जमाना बीत गया . अंतिम पहल लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने की थी .मुशहरी के नक्सलियों के बीच बिताये उनके अनुभव ‘आमने-सामने’ पुस्तिका में दर्ज है. आज जेपी -लोहिया को अपना आदर्श बताने वाले तमाम राजनेता खुद को इस समस्या से अलग-थलग किये हुए हैं . गाँधी की अहिंसा और धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटने वाले भी बार -बार बयान बदलने में माहिर हो चले हैं . क्या आज गाँधी होते तो बीस राज्यों के दो सौ जिलों में फैली अशांति पर वो चुप रहते ? अरे ,गाँधी के ठेकेदारों ने तो गाँधी को ,उनके विचारों को,उनके आदर्शों को , उसी दिन मिटा दिया था जब आजीवन अहिंसा की पूजा करने वाले महात्मा की फोटो हिंसा के मूल स्रोत " रुपयों" पर छाप दिया गया . और ऐसा उनके सम्मान में किया गया . आज कल बहुत कुछ सम्मान के नाम पर हो रहा है . वर्तमान केंद्र सरकार की सबसे भ्रष्टतम योजना "नरेगा" जो कुछ लोगों के मुताबिक नक्सलवाद को २-३ सालों के अन्दर तेजी से बढाने में सहायक रही है,का नाम भी गाँधी को श्रद्धांजलि देने के लिए उनके नाम पर रखा गया . आजकल अधिसंख्य दलों में ठेकेदार ही राजनीतिक कार्यकर्ता हैं. न विचार है न दल. राजनीतिक दल परिवारों, रिश्तेदारों के कुनबे या प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन गये हैं. दलों में आंतरिक लोकतंत्र ही नहीं रहा.
अब केंद्र राज्यों को कहता है ‘कानून व्यवस्था ’ राज्य सूची का विषय है इसलिए नक्सलवाद भी आपकी समस्या , ये सरासर धोखा, झूठ और फ़रेब है. पूरे देश में फ़ैले नक्सली समूहों से कोई एक राज्य निबट पायेगा. सरकारों से पूछना चाहिए कि नक्सलियों के पास हथियार कहां से पहुंचते हैं? कौन देता है? उन पर नकेल लगाने का काम किसका है? पैसे कहाँ से आते हैं ? दिल्ली में बैठे राजनीतिक ,सामाजिक और बौद्धिक जगत के छद्म लोग नक्सलवाद की जमीन तैयार करते हैं तब सरकारें कहाँ सोयी रहती है ? पर भ्रष्टाचार में डूबा तंत्र सब करवाता है, सब देख-जान रहे हैं, पर किंकत्तर्व्यविमूढ़ हैं. ’92 के मुंबई विस्फ़ोट में भारतीय पुलिस-कस्टम के लोग ही दाउद के विस्फ़ोटक भारत लाये थे. इसके बाद वोरा कमिटी बनी थी, जिसने राजनीतिज्ञों-अफ़सरों-उद्यमियों के सांठगांठ की चर्चा की थी. पर वह रिपोर्ट दबा दी गयी. आज भी दर्जनों समितियों की रपट प्रधानमंत्री कार्यालय की धूल फांक रही है .
भ्रस्टाचार हमारी रगों में पैठ गया है.आज ऐसा बोलना एकदम सामान्य सा लगता है . लोग भ्रष्ट होना अपनी शान समझने लगे हैं . सत्ता के ऊपर कुछ देख ही नहीं पा रहे. नाव दुर्घटना हुई, उस पर भी राजनीति, लाशों से हानि -लाभ का गणित. यह सवाल नहीं उठा कि केरल में कहां-कहां कितनी नावें चलती हैं? कितने ऐसे संवेदनशील स्थान हैं? इनका आधुनिकीकरण कैसे हो? कैसे आपात स्थिति में लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित हो ? एक नाव दुर्घटना तो उदाहरण मात्र है . बाढ़ और सुखाड़ की विभीषिका को अनेक राज्य हर साल भुगतते हैं लेकिन सरकारें समस्या पैदा होने पर हीं जगती है . कैसे सारे लोग ऐसी आपदाओं में मिल कर दिल्ली पर दबाव डालें कि वह अधिकतम धन दे, तकनीक दे, एक्सपर्ट दे . आपदा प्रबंधन एकदम सटीक और हर स्थिति ,हर समस्या मसलन बाढ़ -सुखाड़ से लेकर नक्सली हमलों और आतंकी धमाकों तक को तुंरत काबू में किया जा सके . पर ये समाधान हो जायेंगे, तो राजनीतिक कैसे चलेगी? सत्ता का खेल किन मुद्दों पर होगा ? देश को राजनीतिक ,सामाजिक और बौद्धिक जगत में नवीनतम सोच , नया संकल्प और नया खून चाहिए .लेकिन इसके आसार कहां हैं ?क्या हम किसी भगवान् के अवतार लेने की प्रतीक्षा करें या फ़िर ‘अहम् ब्रह्मास्मि ‘ का ध्यान कर स्वयं कर्मयुद्ध में कूद पड़ें . फैसला हमें ही करना है .
राजनीतिक वेश्यावृत्ति की शुरुआत तो सन 90 में ही हो गयी
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8 Responses
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January 16, 2010 at 9:30 pm
जयराम जी आप का लेख सचमुच सराहनीय है…..पढ़ कर खुशी हुई की अब भी समुदाय मे ऐसे लोग है जो अपनी बात को सहज ढंग से समझा सकते है…. राजनीति अपने आपमे एक उलझा हुआ विषय है …. और राजनेता अपने ही जाल मे उलझी हुई मकड़ी समान है….. किसी को शायद पता ही नही की वो क्या चाहता है…. कभी उदेश्यो के लिए लड़ते है तो कभी धन के लिए ..तो कभी पार्टी के लिए…और हद तो तब करते है जब उस पार्टी के खिलाफ ही लड़ते है जिसको वो कुछ ही दिन पहले इस देश की एक मात्र हितेशी पार्टी का ढिंढोरा पिट रहे होते है…….वैसे मे इन सब के लिए हम सब को दोषी मानता हूँ …क्योंकि जब ये राजनेता वोट माँगने आते है तब तो हम इनसे कोई सवाल नही करते …की ये देश को किस किस दायरे मे बाँट रखा है…… ???हम केवल बोलते है …लिखते है ….और सुनते है…….. लकिन कुछ करते नही ….और शायद कभी कुछ करेंगे भी नही……
November 21, 2009 at 10:27 am
Hindi typing me fluent nahi hu so sorry….. but HAMARE 'JANOKTI" KE LIYE AAPKO HARDIK SUVKAMNAE… Aaj bahoot dino ke baad mai waapas hindi me paagal hu.jaise high school life me hua karta tha… YOUR ALL THINKING ON DIFFERENT BUT IMPORTANT TOPIC ARE REALLY INNOVATIVE. PLEASE WRITE SOMETHING ABOUT ENGINEERING LIFE YAAR……..
PATA NAHI AAJ KAL KE ENGINEER APNI EK ALAG HI LIFE JEETE HAI………
October 25, 2009 at 5:37 pm
साधुवाद, पर हल किया है
October 23, 2009 at 2:08 pm
आपकी प्रतिक्रिया और उत्साहवर्धन हेतु शुक्रिया । शायद , आपको भी इस विषय से परहेज है ! सेक्स और समाज जैसे मुद्दे पर सामग्रि विश्वकोश के लिये जरुरी है ऐसा मैं मानता हूं । क्या आप सेक्स को सामाजिक मुद्दा नहि मानते है? और मैने जो लिखा है उस में कोइ मस्तराम की कहानी नही लिखि है !
और दुसरी बात कि आपने शायद देखा नही वहां मेरे दो और आलेख है अन्य विषयों पर । और आगे और भी लिखना है अभि तो शुरुआत है ।http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B5_%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF
is link ko bhi dekhiyega
October 23, 2009 at 12:36 pm
जयराम जी,
हिन्दी विकि पर आपने लिखना शुरू किया है; आपका स्वागत है। आपसे आग्रह है कि कुछ सामाजिक राजनैतिक विषयों पर लेख लिखें तो हिन्दी का हित हो। ऐसे विषयों पर लिखें जो किसी विश्वकोश में सामान्यतया होते हैं या होने चाहिये।
October 20, 2009 at 4:37 pm
जयराम जी बिलकुल सटीक और सुन्दर विश्लेषण किया है आपने |
आज की इस विकट स्थिति के लिए गलत लोगों की अपेक्षा सही लोग ज्यादा दोषी हैं | देखिये जब तक अच्छे लोग राजनीति या अन्य क्षेत्रों मैं आगे नहीं आयेंगे तब तक बुरे लोग ही अच्छे लोगों पे साशन करते रहेंगे |
नेताओं से अच्छाई की आशा अब बेमानी लगती है, जब जनता ही अपने वोट का गलत स्तेमाल कर रही है तो स्थिति तो ख़राब होगी ही …