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रावण’ मणि रत्नम की नई फिल्म का नाम है। फिल्म अच्छी है या बुरी, नहीं कह सकता। लेकिन फिल्म कई नये सवाल खड़े करती है। क्या राम उतने अच्छे थे जितने रामचरित मानस में दिखाए गए हैं? क्या रावण उतना बुरा था जितना तुलसीदास बता गए? क्या अच्छाई और बुराई एक सीधी सपाट लकीर हुआ करती हैं? फिल्म रावण सीधे-सीधे रामचरित मानस नहीं है लेकिन फिल्म देखते हुए कोई भी कह सकता है कि मणि की कहानी की प्रेरणा रामचरित मानस है।
इस फिल्म में एक रावण है जो अच्छा है या बुरा फिल्म इस बारे में चुप रहती है। एक राम है जिसकी पत्नी का अपहरण रावण कर लेता है। राम की मदद के लिये एक हनुमान है जो अशोक वाटिका तक पहुंच भी जाता है। फिल्म में रावण की एक बहन भी है यानी सूर्पनखा जिसके साथ राम की वजह से गलत होता है। सीता के चरित्र पर राम शक भी करते हैं और अंत में राम रावण में युद्ध होता है। रावण मर जाता है। राम की जीत होती है लेकिन सीता राम के पास लौटती है ये नहीं दिखाया जाता। और फिल्म जिस बिंदु पर खत्म होती है वहां रावण दर्शकों और सीता की सहानुभूति जीत लेता है।
फिल्म में रावण विक्टिम है, वो जो कुछ भी करता है वो अपनी बहन के साथ हुए अत्याचार के प्रतिशोध में करता है। उसकी बहन पुलिस की ज्यादती का शिकार होकर आत्महत्या कर लेती है। बदले की भावना से वशीभूत हो वह पुलिस अफसर की पत्नी का अपहरण कर लेता है। उसे अपने साथ रखता है। उसे तकलीफ भी देता है और उसकी तरफ आकर्षित भी होता है लेकिन उसकी इज्जत पर हाथ नहीं डालता। रामचरित मानस की तरह।
तुलसी की रामचरितमानस में रावण सीता का अपहरण क्यों करता है? क्या वो सीता पर आसक्त हुआ था? नहीं। क्या वो पापी था इसलिए? नहीं। वो गुस्से और बदले की आग में सीता को उठाता है क्योंकि उसकी बहन सूर्पनखा जंगल में भटकते राम पर मोहित हो जाती है। वो राम के सामने प्रणय निवेदन करती है। राम कहते हैं कि वो शादीशुदा हैं लिहाजा वो निवेदन ठुकरा देते हैं। उसे लक्ष्मण के पास भेजते हैं, लक्ष्मण उसे दुबारा राम के पास भेजते हैं, राम फिर लक्ष्मण के पास। इससे नाराज हो कर सूर्पनखा हमला कर देती है। लक्ष्मण सूर्पनखा की नाक काट लेते हैं। क्या सूर्पनखा की नाक काटना जायज है? क्या किसी भी नजर से इसको सही ठहराया जा सकता है? राम और लक्ष्मण ने क्या यहां गलती नहीं की? सूर्पनखा को राम का लक्ष्मण और लक्ष्मण का राम के पास बार-बार भेजने का क्या औचित्य था? क्या सूर्पनखा को जानबूझकर परेशान नहीं किया गया?
सूर्पनखा की नाक कटने की खबर रावण तक पहुंचती है। वो गुस्से से पागल हो जाता है। सूर्पनखा से वो बहुत प्यार करता था। पूरी दुनिया उसके नाम से कांपती थी, देवलोक तक में उसका डंका बजता था, पाताल लोक में भी उसका कोई सानी नहीं था। ऐसे पराक्रमी राजा की बहन की नाक सिर्फ इसलिये काट ली जाये कि उसका दिल किसी पर आ गया और उसने प्रणय निवेदन की गुस्ताखी की तो उस राजा की प्रतिक्रिया क्या होगी? सहज कल्पना तो यही कहती है कि वो फौरन आक्रमण कर ऐसे लोगों को मजा चखा दे। लेकिन वो शायद खून खराबे से बचना चाहता था। इसके बदले वो सीता हरण करता है। और आप पूरी रामचरित मानस पढ़ जाइये कहीं भी आपको अंश भर ये नहीं दिखेगा कि उसने कभी भी सीता के साथ अनाचार करने की कोशिश की। हां, वो उन्हें बंधक बनाकर अशोक वाटिका में रखता है और इस बात का इंतजार करता है कि सीता उन्हें अपना बना ले।
बदले की आग में जलते हुए व्यक्ति के लिये इतने सब्र का कोई कारण नहीं था। दुष्ट बुद्धि तो यही कहती है कि उसे जबरन अपना बना लेना चाहिये लेकिन वो ऐसा नहीं करता। वो इंतजार करता है, सब्र से काम लेता है। अगर लक्ष्मण ने भी जल्दबाजी नहीं की होती, सब्र से काम लिया होता तो शायद राम-रावण युद्ध नहीं होता। तो किसे कहा जाये युद्ध के लिये दोषी? वो जिसने नाक काटी या वो जिसने सीता के हरण के बाद भी इंतजार किया?
मुझे लगता है कि अब इस सवाल को हमें अपने अंदर पूछना चाहिए। राम को धर्म के साथ बताया गया और रावण को अधर्म का प्रतीक। लंका की लड़ाई को पाप पर पुण्य की विजय के रूप में हम उत्तर भारतीय मनाते हैं। विजय दशमी पर रावण को फूंका जाता है। अगर रावण सीता हरण की वजह से पापी हो गया तो सूर्पनखा की नाक काटने वाले को पुण्यात्मा कैसे कह सकते हैं? रावण पापी होता तो राम युद्धभूमि में धराशायी होने के बाद लक्ष्मण को ज्ञान प्राप्ति के लिये उसके पास क्यों भेजते? राम भी मानते थे कि रावण महाज्ञानी था। और लक्ष्मण को उससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत थी। शायद राम ने मन में कभी भी सूर्पनखा की नाक काटने के लिये लक्ष्मण को सही नहीं माना था। और ये राम का अपना तरीका था लक्ष्मण को सबक देने का।
सवाल फिर वहीं आकर टिक जाता है कि जनमानस में रावण पापी है, अधर्मी है और राम धर्म के साथ। क्या इसलिए कि राम की जीत हुई थी और रावण हार गया था? हकीकत ये है कि सत्य अपनी संपूर्णता में भी सापेक्ष है। वो काला या सफेद नहीं, इन दोनों के बीच कहीं अटका रहता है। और हम उसे देख नहीं पाते या देखना नहीं चाहते। मणि रत्नम की पूरी कोशिश इस सत्य को दिखाने की है कि राम उतने पाक नहीं हैं जितने दिखते हैं और रावण उतना पापी नहीं है जितना बताया गया है। और हमें अपनी दृष्टि बदलने की जरूरत है। अपने मिथकों को भी नये संदर्भों में नये सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है।
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