कौआ और मीडिया

भारतीय समाज में कौए को आमतौर पर अच्छा नही माना जाता। कारण, शायद उसकी कर्कश आवाज, कुटिल बुद्धि, तांक-झांक करने की आदत, उसका काला रंग आदि हो। लेकिन, अपनी इन बुराईयों के कारण दुत्कारे जाने के बावजूद, वह सम्मान भी पाता है। अटरिया पर कागा बोले तो, त्यौहार या संक्रांति हो तो,कौआ ग्रास खिलाने को, हमारे यहाँ तो बच्चे को आशीर्वाद भी काक-चेष्टा का दिया जाता है और काले रंग का टीका भी कौए को याद करके लगाया जाता है और पितृपक्ष में तो कौआ विशेष सम्मान पाता है। इन्हें बुद्धिमान भी माना जाता है |

एकता में कौओं का कोई सानी नहीं; इनके साथी के साथ कोई घटना घट जाए तो, या कोई इनके घोंसले को छेड़ दे तो, मतलब, जब ये अपनी एकता प्रर्दशित करते हैं तो अपनी कांव- कांव के आगे किसी की नहीं सुनते”एक ही जगह पर मंडराते” रहते हैं। एक आदत इनकी और अच्छी है कि ये खाना मिलने पर खूब काँव-काँव करके अपने साथियों को जमा कर लेते हैं तब एक साथ खाने पर टूटते हैं | इन्हें कोई मरा जानवर मिल जाये तो इनकी एकता देखने को मिल जाती है |

हमारे गांवों में दो तरह के कौए होते हैं एक जरा ज्यादा काला व बड़ा होता है, उसे सच्चा कौआ कहते हैं ।वैसे गुण-अवगुण लगभग एक जैसे होते हैं। खाने में सामान्य गंदगी से लेकर कुछ भी अच्छा-बुरा खा लेते हैं। अपनी इसी आदत के कारण पहले जैसे विश्वसनीय नहीं रहे। वरना पहले तो हमारा ग्रामीण समाज इन पर बहुत भरोसा करता था, अब तो गाँवों से इनकी संख्या शहरों को पलायन कर गई है। क्योंकिगावों में खाने व तांक- झांक करने के अवसर कम होते हैं, शहरों में तरह- तरह के खाने या ये कहना चाहिए प्रयाप्त जूठन उपलब्ध होती है। और अपनी जिज्ञासु(खोजी)प्रक्रति के कारण शहर इन्हें अपने लिए ठीक लगता है। हमारे यहाँ एक पौराणिक कथा के अनुसार इनके एक पूर्वज ने अपनी प्रकृतिवश श्रीराम की पत्नी माता सीता के पाँव में चोंच मार दी जिससे रक्त निकल आया, भगवान राम को क्रोध आ गया उन्होंने बाण से कौए की एक आँख फोड़ दी। तब से यह एकचक्षू माना जाता है। इसीलिए बहुत चंचल होता है। वैसे काकभुषण्डी के रूप में इनके पूर्वज ने अच्छा सम्मान भी पाया है। आप भी सोच रहे होंगे की कौआ-कौआ -कौआ ये कौआ पुराण क्यों लिखने लगा, लेकिन क्या करूँ जब से टी.वी. न्यूज चैनल चले हैं, बुरा मत मानना मुझे इन चैनलों के रूप में कौए ही कांव-कांव करते सुनाई देते हैं। अब समानताएं ढूंढना आप भी शुरू कर दो। हाँ चुनावों को इनके लिए पितृपक्ष माना जा सकता है।

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About शंकर दत्त फुलारा

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One Response

  1. सही कहा आपने, मीडिया की छवि बदलती ही जा रही है. इनपर अब नियंत्रण लगाना जरूरी है. लोगो के द्वारा सर्कार के द्वारा नहीं.

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