हर बार समर्पण करता हूँ हर बार गया ठुकराया हूँ
अधखुली उनींदी पलकों पर
इक मधुर मिलन की आस रही
दो अधरों पर तिरते सपने
चिर अन्तर्मन की प्यास रही
हर बार याचना सावन की हर बार अवर्षण पाया हूँ
तेरे घर आने की चाहत
गिरता हूँ कभी फिसलता हूँ
पाथेय नहीं औ दुर्गम पथ
लम्बा है सफ़र ,पर चलता हूँ
हर बार कल्पना मधुबन की, हर बार विजन वन पाया हूँ
अभिलाषाओं की सीमाएं
क्यों खींच नहीं डाली हमने
कुछ पागलपन था और नहीं
ये हाथ रहे खाली अपने
हर बार समन्वय चाहा है, हर बार प्रभंजन पाया हूँ
क्यों मेरे प्रणय समर्पण को
जग मेरी कमजोरी समझा
क्यों मेरे पावन परिणय को
तुमने समझा उलझा उलझा
हर बार भरा हूँ आकर्षण , हर बार विकर्षण पाया हूँ
हर बार समर्पण करता हूँ……….
-आनन्द


August 1, 2009 at 11:11 am
आ० डा० श्याम गुप्ता जी/वर्मा जी/दिनेश माली जी/ओम आर्या जी/महक जी
उत्साह वर्धन के लिए आप सभी लोगों का बहुत-बहुत धन्यवाद
सादर
–आनन्द
July 31, 2009 at 6:13 pm
पाथेय नहीं औ दुर्गम पथ
लम्बा है सफ़र ,पर चलता हूँ
हर बार कल्पना मधुबन की, हर बार विजन वन पाया हूँ
behad sunder abhivyakti
July 31, 2009 at 5:54 pm
bahut bahut hi sundar rachana jo apane bhawanao ko badi hi khubsurati se piroya hai…….bahut hi sundar baate karee hai kawita ke maadhyam se
July 31, 2009 at 4:02 pm
अति-सुंदर रचना ! बधाई स्वीकार करो .
July 31, 2009 at 3:50 pm
बेहतरीन रचना
July 31, 2009 at 3:16 pm
सुन्दर गीत.