भारत के लोगों में common sense है ?

सभी संसदमार्गी दिव्यात्माओं ( नहीं समझे ,हमारा मतलब है नेताओं ) सहित सर्वसाधारण के ध्यान देने योग्य आनंद जी शर्मा की यह तल्ख़ टिप्पणी :

* यात्रा के दौरान एक गाँव में ठहरने का मौका मिला l सवेरे सवेरे टहलने निकला तो देखा की चाय की दुकान का मालिक ग्राहकों के बैठने की खटिया को पटक पटक कर उसमे से खटमल निकाल रहा था और जो खटमल नीचे जमीन पर गिरते थे उन्हें अपने फटे पुराने जूते से मार कर गन्दी गन्दी गलियां दे रहा था |
* मैंने कहा : चाचा, चाय पिला दो – खटमल बाद में मार लेना l
* चाय की दुकान के मालिक ने कहा : बाबूजी जरा ठहर जाओ – पहले सारे खटमल मारूँगा; फिर चाय बनाऊंगा l कल रात नई खटिया खरीद के लाया था l अभी बैठा तो एक खटमल ने काट लिया l अब तो पहले सारे खटमल ढूंढ़ ढूंढ़ कर मारूँगा – उसके बाद ही चाय बनाऊंगा l
* एक गाँव के सीधे सादे अनपढ़ चाय वाले का सामान्य ज्ञान देख कर मैं अचंभित रह गया l (१) काटा तो केवल एक ही खटमल ने था परन्तु उसने खटिया पटक पटक कर १०-१२ खटमलों को निकाल कर अपने जूते से मार दिया (२) पूरी तरह आश्वस्त हो गया कि अब एक भी खटमल नहीं बचा है (३) काम धंधा बाद में – पहले शत्रु का समूल नाश आवश्यक है l
* मैं सोच रहा हूँ कि भारत को तो पिछले २००० वर्षों से नाना प्रकार के खटमल काट रहें हैं – भिन्न भिन्न प्रकार की जोकें खून पी रहीं हैं – तरह तरह के पिस्सू शरीर पर चिपके हुए हैं – और फिर भी भारतीय मजे से – बिना कुछ सोच विचार किये हुए जी रहे है ! अथक शारीरिक एवं मानसिक परिश्रम करके अपने खून पसीने कि कमाई से नाना प्रकार के कर (टैक्स) भर रहें हैं ताकि इन खटमलों, जोंकों ऐवम पिस्सुओं का पोषण हो सके और इनकी आबादी भी बढती रहे l
* क्या भारत के लोगों में लेश मात्र भी विचार शक्ति नहीं है – या फिर भारत के लोग मानसिक ही नहीं अपितु शारीरिक रूप से भी शंढ हैं ?
* सामान्य ज्ञान (common sense ) की विडंबना (irony) है कि सामान्य ज्ञान प्रत्येक (सामान्य) व्यक्ति के पास नहीं होता है l
* वस्तुतः सामान्य ज्ञान (common sense ) एक विरोधोक्ति (paradox) अर्थात self contradicting शब्द है l
* क्या भारत के लोगों में सामान्य ज्ञान (common sense ) है ?

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यह लेखनी कैसी कि जिसकी बिक गयी है आज स्याही ! यह कलम कैसी कि जो देती दलालों की गवाही ! पद-पैसों का लोभ छोड़ो , कर्तव्यों से गाँठ जोड़ो , पत्रकारों, तुम उठो , देश जगाता है तुम्हें ! तूफानों को आज कह दो , खून देकर सत्य लिख दो , पत्रकारों , तुम उठो , देश बुलाता है तुम्हें ! बाज़ार के चंगुल से मुक्त अभिव्यक्ति का मन्च ब्लागिंग के रूप में सामानांतर विकल्प बन कर उभरा है तो हमारी जिम्मेदारी है कि छोटी लकीरों के बरक्स कई बड़ी रेखाए खिची जाएं. बाज़ारमुक्त और वादमुक्त हो समाजहित से राष्ट्रहित की ओर प्रवाहमान लेखन समय की मांग है. और इस दिशा में " जनोक्ति .कॉम " जनोक्ति वेब मीडिया का प्रथम प्रयास है

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