मॉनसून सत्र के तीसरे दिन भी संसद में हंगामा जारी है | सारा विपक्ष एक स्वर में महंगाई के मुद्दे पर चर्चा और मतदान की मांग पर अड़ा हुआ है | कांग्रेस सरकार की हवा निकलती हुई दिख रहा है | जिस तरह से मॉनसून सत्र के ठीक पहले सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ और हिन्दू आतंकवाद का जिन्न निकाला गया उससे सरकार के रणनीतिकार काफी निश्चिन्त थे कि मुख्य विपक्षी दल भाजपा को इन मुद्दों पर घेर कर महंगाई के मुद्दे को दबा दिया जायेगा | लेकिन , भाजपा नेतृत्व ने अमित शाह प्रकरण में सीबीआई को लेकर सरकार को घेरने के बजाय महंगाई के दर्द को उठाना उचित समझा और नतीजा सामने है कि वाम हो या दक्षिण या फ़िर समाजवादी ताकतें सभी एकजुट हैं | सरकार चारों ओर से सदन में कमजोर पद रही है | एक ओर जहाँ राज्यसभा में सत्तापक्ष की संख्या का संतुलन बिगड़ गया है वहीँ लोकसभा में सहयोगी दलों के ऊपर भरोसा ना होने से सरकार उहापोह की स्थिति का सामना कर रही है | और यही कारण है कि सरकार 184 के तहत चर्चा नहीं करवाना चाहती क्योंकि इस नियम में चर्चा के बाद मतदान का प्रावधान है | यदि मतदान की नौबत आई तो सरकार की हार तय है क्योंकि इस बार सीबीआई के भय से ना तो सपा मानने वाली है और ना ही बसपा ! वैसे भी मामला महंगाई का है और सबको अपनी चुनावी जमीन बचाए रखना है |
कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी कहते हैं सरकार बहस को तैयार है और विपक्ष भी बहस की मांग कर रही है फ़िर आखिर पेंच कहाँ है ? क्यों सदन हंगामे की भेंट चढ़ रहा है ? पेंच तो है और वो भी क़ानूनी ! मामला १८४ और १९३ के बीच फंसा हुआ है | दरअसल कांग्रेस नेतृत्व को विपक्ष की समझदारी का अंदाजा ही नहीं था | खास कर भाजपा को उन्होंने रणनीति विहीन समझ लिया था |
गौर किया जाए तो सरकार महंगाई के पाप को गुजरात सरकार को कटघरे में खड़ा कर छुपाना चाहती थी , विपक्ष ( जिसमें भाजपा को अछूत समझने वाले वामपंथी भी शामिल हैं ) को सांप्रदायिक मुद्दों में फंसा कर बाँटना चाहती थी | कुछ लोग इसे गलत आरोप कह सकते हैं लेकिन अमित शाह और हिन्दू आतंकवाद टेप प्रकरण में कुछ सवाल छुपे हैं जो सीधे सरकार की मंशा को स्पष्ट करते हैं | पहला बड़ा सवाल , बम ब्लास्ट के आरोपी दयानंद पण्डे के लेपटॉप से प्राप्त विडिओ मीडिया के पास कैसे पहुंचा जबकि वह लेपटोप तो सरकारी जांच एजेंसियों के पास था ? दूसरा सवाल , अमित शाह से पूछताछ के पहले 30 हजार पन्नों का चार्जशीट पेश करना क्या सीबीआई की कार्यवाई को पूर्वनियोजित नहीं दर्शाती ? ( यहाँ पर मेरी कोशिश आरोपियों को सही या गलत साबित करने की कोशिश नहीं है , वो तो कानून का काम है| इन सवालों का मकसद सरकार द्वारा अपने हित में गलत समय पर इन मुद्दों को उछालने की साजिश का पर्दाफाश करना है )
खैर , कांग्रेस के यह कोशिश उनके सपनों में ही दम तोड़ गयी | टूटे सपनों से दुखी मनीष तिवारी महंगाई के मुद्दे पर सरकार का बचाव करते हुए एनडीए सरकार में बढाई गयी कीमतों का ब्यौरा देने लग जाते हैं | लेकिन यह कोई बात हुई भला , तुमने बढ़ाई तो हम भी बढ़ाएंगे ! अरे , तिवारी साहब भारत की जनता ने ” हाथ ” को आम आदमी के साथ मानकर ही तो आपको गद्दी सौंपी थी ! अब जब वही हाथ साथ छोड़ कर अपनी जेबें भरने लग जाए और जनता का गर्दन तक जा पहुंचे तो हंगामा होगा ही ! एक ओर , सरकार महंगाई बढ़ने के लिए वैश्विक परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराती है वहीँ दूसरी ओर सरकार की लापरवाही से लाखों टन अनाज सड़ रहे हैं ! लोग भूखों मर रहे हैं लेकिन सरकार ३ रूपये किलो पर अनाज बाँटने का ढोंग रचा रही है सपने दिखा रही है, उन आँखों को जिन्हें सिर्फ रोटी दिखाई देती है |
बहरहाल , संसद में मुंह की खा रही कांग्रेस को बचाने के लिए लोकतंत्र का जर्जर खंभा मीडिया भी प्रयासरत है तभी तो महंगाई के मुद्दे के बीच-बीच में गुजरात , मोदी ,अमित शाह और सी बी आई के शिगूफा छेड़ना नहीं भूलती | दर्शकों में भ्रम पैदा करने का और उनका ध्यान महंगाई से हटा कर अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक , सांप्रदायिक , दंगे , फर्जी मुठभेड़ आदि की ओर मोड़ने का प्रयास भी किया जा रहा है | मीडिया का क्या कहें साहब , अभी -अभी संसद हंगामा और महंगाई के मुद्दे पर चल रही चर्चा में आईबीएन -७ पर आशुतोष वामपंथी नेता मोहम्मद सलीम से एक ही सवाल बार-बार पूछे जा रहे थे कि इस मुद्दे पर ” भाजपा ” के साथ खड़े रहेंगे ? वाह भाई वाह ! क्या पत्रकारीय दायित्व निभा रहे हैं साहब ! वैसे आशुतोष को जवाब भी खूब मिला ! मोहम्मद सलीम ने कहा -” हम भाजपा के साथ इसलिए खड़े हैं क्योंकि हम जनता के साथ हैं और महंगाई के विरोध में हैं ” | लेकिन मुख्यधारा की मीडिया सरकार के साथ है और सत्ता की दलाली इनका कर्तव्य है !
ये लेखनी कैसी कि जिसकी बिक गयी है आज स्याही ,
ये कलम कैसा कि जो देता दलालों की गवाही !

