गुलाममंडल खेल और नेहरू स्टेडियम

दिल्ली में होने वाले गुलाममंडल खेलों के उद्घाटन, समापन आदि के लिए बने जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम का नाम बिल्कुल ठीक रखा गया है, क्योंकि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत में गुलाम परम्पराओं को जीवित रखने के सबसे बड़े अपराधी नेहरू ही हैं।

वे स्वयं को गर्वपूर्वक भारत में अंतिम अंग्रेज कहते थे। इसी प्रकार वे स्वयं को जन्म से हिन्दू, कर्म से मुसलमान और विचारों से ईसाई मानते थे। जो लोग इस तमाशे के समर्थक हैं, वे सब नेहरूवादी गुलाम मानसिकता के शिकार हैं। मणिशंकर अय्यर ने जीवन में बस यही अच्छा काम किया है कि वे इस सर्कस के विरोधी हैं।

इस तमाशे पर कितना धन खर्च हो रहा है, यह ठीक-ठीक किसी को नहीं पता। 15 से लेकर 50 हजार करोड़ रु0 तक की बात लोग कह रहे हैं। इससे भारत के हर विकास खंड में एक चिकित्सालय और विद्यालय तथा हर जिले में एक खेल स्टेडियम बन सकता था; पर गांव और गरीब किसी की प्राथमिकता में तो हो…। पांच करोड़ रु0 तो केवल ए.आर.रहमान को ही दिया जा रहा है, जो उद्घाटन कार्यक्रम में कुछ देर गीत-संगीत प्रस्तुत करेंगे।

दुर्भाग्यवश भारत के सभी बड़े नेता, राजनीतिक दल तथा संस्थाएं चुप हैं। उन्हें डर है कि इससे कहीं युवा शक्ति उनसे नाराज न हो जाए। वे भूलते हैं कि जींसधारी आधुनिक युवक भले ही कितने फैशनपरस्त हों; क्रिकेट, सिनेमा या कैरियर के लिए भले ही वे दीवाने हों; पर उनके मन में देशभक्ति की आग विद्यमान है। यदि उन्हें ठीक से बात समझाएं, तो यह आग शीघ्र ही दावानल बन सकती है।

छह दिसम्बर, 1992 और अयोध्या को याद करें। जिन युवकों को बुजुर्ग लोग नालायक बताते नहीं थकते थे, उन्होंने कुछ घंटो में ही बाबरी गुलामी के उस कलंक को ढहा दिया था। यदि सही नेतृत्व द्वारा आह्नान किया जाए, तो यही फैशनपरस्त युवक बड़े से बड़ा बलिदान देने में पीछे नहीं हटेंगे।

हर्ष की बात है कि स्वामी रामदेव जी ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई है। यदि वे आह्नान करें, तो इस मुद्दे पर करोड़ों भारतवासी उनके साथ आ सकते हैं। क्या ही अच्छा हो यदि स्वामी जी के नेतृत्व में तीन अक्तूबर, 2010 (रविवार) को दिल्ली के देशभक्त नागरिक सत्याग्रह करें। वे सुबह से ही सड़कें जाम कर किसी खिलाड़ी, नेता या दर्शक को उद्घाटन कार्यक्रम में न जानें दें। विश्व भर का मीडिया उस दिन यहां होगा। उनके माध्यम से दुनिया देखेगी कि ‘हम भारत के लोग’ इस गुलामी के चोगे को उतार फेंकना चाहते हैं।

यदि स्वामी रामदेव जी अभी से तीन अक्तूबर, 2010 को दिल्ली में रहकर इस सत्याग्रह का नेतृत्व करने की घोषणा कर दें, तो गुलाममंडल खेलों के विरुद्ध वातावरण बनने लगेगा। दिल्ली के आसपास के लाखों लोग भी उस दिन यहां आ जाएंगे। दो अक्तूबर गांधी जी का जन्मदिवस भी है, जिन्होंने सत्याग्रह रूपी शस्त्र का अंग्रेजों के विरुद्ध प्रयोग किया था। अंग्रेज रानी की गुलामी में सम्पन्न होने वाले ‘गुलाममंडल सर्कस’ के विरुद्ध इस शस्त्र को एक बार फिर आजमाने की जरूरत है।

Tags: , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , ,

About विजय कुमार

राष्ट्र को समर्पित जीवन जीने वाले एक प्रखर विचारक और स्वतंत्र पत्रकार | आपसे इस मेल पते पर संपर्क किया जा सकता है | vj.kumar.1956@gmail.com
Subscribe to Comments RSS Feed in this post

One Response

  1. सहमत हूँ आपसे | भारत की विडम्बना ही है की गुलामी वाली मानशिकता को अभी भी पूजा जा रहा है |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*
*

Featuring Recent Posts Wordpress Widget development by YD