अब बालीवुड के अमरसिंह

समाजवादी पार्टी के महासचिव पद से अपमानजनक ढंग से विदाई के बाद अमरसिंह इन दिनों फुरसत में बैठे हुए हैं. सो, अपनी आदत के मुताबिक ही इस खाली वक्त का इस्तेमाल वे अपने विरोधियों के खिलाफ आरोप मढ़ने में कर रहे हैं. चूंकि इन दिनों उनके सबसे बड़े विरोधी मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी ही है. सो, कुछ अरसा पहले मुलायम सिंह के झंडे तले दुसरे राजनीतिक विपक्षियों की बखियां उधेड़ने वाले अमर अब अपने पूर्व आका की ही फजीहत में लगे हुए हैं. मामला यह है कि मुलायम सिंह नोएडा में जमीन को लेकर एक आरोप से घिरे हुए हैं. अब चूंकि मुलायम से नजदीकियां रही नहीं, सो अमर सिंह को सभी भूली-बिसरी बातों की तरह ही यह विवाद भी याद आने लगा है. उत्तरप्रदेश में एक रैली में अमर सिंह ने फरमाया कि वे इस मामलें में मुलायम सिंह के खिलाफ गवाही देने के लिए तैयार हैं. इतना ही नहीं, विरोधियों पर निम्नतम श्रेणी के आरोप लगाने के लिए कुख्यात अमर सिंह ने मुलायम सिंह को झूठा समाजवादी कहने से भी परहेज नहीं किया. कहा जा सकता है कि अमर सिंह अब पूरी तैयारी के साथ मुलायम सिंह को चुनौती देने के लिए मैदान में आ गए हैं.

वैसे इसके मूल में वह अपमान है, जो अमर सिंह को झेलना पड़ा. चैदह साल के समर्पण के बदले जब मुलायम सिंह ने अपने इस सबसे सच्चे सिपहासालार को पार्टी से रूखसत किया, तो इस विदाई को जिल्लतभरी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई. अब खिसियाएं अमरसिंह कहते हैं कि समाजवादी पार्टी सिर्फ यादवों की पार्टी है. लेकिन यह बात वे बहुत देर से कह रहे हैं. हकीकत यह है कि समाजवादी पार्टी की नींव ही परिवारवाद की अवधारणा पर रखी गई थी. दशकों पहले जब मुलायम सिंह यादव ने विश्वनाथ प्रताप सिंह का साथ छोड़कर पहले चंद्रशेखर के साथ समाजवादी जनता पार्टी और फिर समाजवादी पार्टी बनाई थी, तब उनकी वरीयताएं और सोच बहुत स्पष्ट थीं. समाजवादी पृष्ठभूमि को साथ रखते हुए उन्हें उत्तरप्रदेश के जातीय समीकरणों के आधर पर अपनी राजनीति करनी थी. हालांकि समाजवाद और जातिवाद दोनों में बहुत जबर्दस्त अंतरविरोध है, लेकिन मुलायम सिंह ने दोनों को ऐसा साधा कि वे उत्तरप्रदेश में कांग्रेस और जनता दल दोनों के विकल्प बन गए. अयोध्या के घटनाक्रम के बाद मुसलमानों का कांग्रेस से मोहभंग हुआ और जनता दल पहले ही विघटित हो चुका था. ऐसे में उत्तरप्रदेश के मुसलमान स्वाभाविक रूप से समाजवादी पार्टी की ओर मुड़े और मुस्लिम-यादव गठजोड़ से मजबूत हुए मुलायम सिंह उत्तरप्रदेश में सत्ता में आने में सफल रहे. हालांकि अन्य क्षेत्रीय दलों की ही भांति उनकी पार्टी में भी उनके अपने परिवार और जाति के नेताओं की प्रधानता बनी रही. जाहिर है, समाजवादी पार्टी शुरू से मुलायम सिंह के परिवार की निजी पार्टी बनी हुई है. यदि अमर सिंह, अमिताभ बच्चन, जयाप्रदा और अनिल अंबानी जैसे लोग भी उसमें प्रमुखता पाने में सफल रहे तो इसीलिए कि वे भी यादव के मित्र या परिवारजनों के समान ही थे. लेकिन अमर सिंह की छत्रछाया में लगातार शिकस्त के बाद ही सहीं, लेकिन मुलायम सिंह को अहसास हुआ कि उनकी असल ताकत फिल्मी सितारों और उद्योगपतियों के साथ बैठना नहीं है, बल्कि आम आदमी और पिछड़े तबके को लेकर चलना है. अमर सिंह की राजनीति के खिलाफ अगर मुलायम सिंह का दिल खट्टा हुआ, तो इसमें सबसे अहम भूमिका हालिया उपचुनावों में उनकी बहू डिंपल की अप्रत्याषित हार रही. अपने ही कुनबे की बहू की हार ने मुलायम सिंह को यह अहसास करा दिया कि वे आम आदमी से बहुत दूर हो चुके हैं. वे यह भी समझ गए कि इसके लिए अमर सिंह की हवा-हवाई राजनीतिक विचारधारा सबसे ज्यादा है. इसीलिए, अब मुलायम सिंह अब अपनी जमीनी राजनीति की ओर लौटना चाहते हैं. उस राजनीतिक विचारधारा की ओर लौटना चाहते हैं, जिसके बूते वे देष के सबसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हुए थे.

सवाल अमर सिंह को लेकर भी है कि अब वे आगे क्या करेंगे. चूंकि अमरसिंह विध्वंसक राजनीति में यकीन रखते हैं, इसलिए माना जा रहा है कि कांग्रेस, एनसीपी, बसपा समेत कोई भी बड़ी पार्टी उन्हें अपने खेमे में शामिल करने का जोखिम नहीं उठाएगी. तो फिर अमर सिंह का अगला कदम क्या होगा? राजनीतिक गलियारों में अटकलें लगाई जा रही हैं कि अमरसिंह ने बाॅलीवुड में अपनी नई पारी शुरू कर दी है. वैसे भी राजनीतिज्ञ रहते हुए अमर सिंह को हमेशा बाॅलीवुड की चकाचैंध के पीछे भागने वाला शख्स ही माना गया. बच्चन परिवार, संजय दत्त, जयाप्रदा समेत बाॅलीवुड की कई बड़ी हस्तियों ने उन्हें अपने पारिवारिक सदस्य का दर्जा दे रखा है. वैसे भी अभिनेता के तौर पर उनकी चार्जशीट नामक एक फिल्म रिलीज होने वाली है, जिसका निर्देशन देव आनंद ने किया है. चर्चा यह भी है कि अमर सिंह अपनी करीबी दोस्त जयाप्रदा द्वारा बनाई जाने वाली एक फिल्म में भी दिखाई देंगे. इसके साथ ही एक अन्य फिल्म में वे माओवादियों के समर्थक की भूमिका में नजर आएंगे. खास बात यह है कि अमर सिंह भी बाॅलीवुड में अपने आगाज से संतुष्ट हैं. हाल ही में उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक गलियारों में दोबारा लौटने के बजाय वे फिल्मों में काम करके अपने आपको व्यस्त बनाए रखेंगे. राजनीतिक गलियारों में अमर सिंह को हमेशा ही एक खलनायक के तौर पर देखा गया. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि फिल्मी गलियारों में वे किस रूप में अपनी पहचान बनाते हैं.

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About पुष्पेन्द्र आल्बे

मैं हमेशा से ही लेखक बनना चाहता था, लेकिन जीवन के शुरूआती सालों में पता नहीं था कि लक्ष्य तक पहुंचा कैसे जाए ? सो, माता-पिता के दबाव में साइंस सब्जेक्ट लिया और एमएससी कर लिया. लेकिन सरकारी नौकरियों से अपना जी घबराता है, शुरू से ही. सो, घर से बगावत की और शहर से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर आ गए, अखबार में नौकरी करने. शुरूआत खराब रही,, चपरासी के तौर पर भी एक अखबार में काम करना पड़ा, लेकिन अपन भी कहां हार मानने वाले थे. दो सालों के भीतर ही उस अखबार के न्यूज एडिटर बन बैठे. अखबार का नाम है ‘प्रभातकिरण-मप्र का सबसे प्रतिष्ठित सांध्यकालिन अखबार. अब पत्रकारिता जगत में आठ साल होने को आए हैं, उसी अखबार में न्यूज एडिटर हैं, तो एक राष्ट्रीय न्यूज पत्रिका में काॅपी एडिटर की जिम्मेदारी संभाल रहा हूं. क्रिकेट और फिल्मों के अपन बचपन से शौकीन हैं, सो हाल ही में दो नए ब्लाॅग भी शुरू किए हैंः WWW.bollywoodextraa.blogspot.com www.cricextraa.blogspot.com उम्मीद है, जल्द ही इन ब्लाॅग को वेबसाईट का रूप देने में कामयाब हो जाऊंगा. तब तक, सफर जारी है, जिंदगी का.... मेरा मंत्र बहुत स्पष्ट है: "you cannot reach out to people by saying things the same way you have been saying them. You have to say them differently.” . "और मुझे लगता है कि मैं उस के लिए अब तैयार हूँ ...

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