गरीब के घर भी मेहमान आता है तो अपनी हैसियत के हिसाब से कुछ न कुछ उपहार जरुर ले आता है . आजकल दलित बस्तियों में एक राष्ट्रीय मेहमान खाली हाथ आता है , चंद चिकनी -चुपड़ी बातें करता है , फोटो खिंचवाता है और फ़िर चला जाता है . देश की तक़दीर बदलने वाले इस मेहमान के आतिथ्य से उस गरीब का कुछ भला तो नहीं हो पाता उल्टे एकाध दिन की मजदूरी मारी चली जाती है .
अपनी लोक छवि तैयार करने की कवायद लोकतान्त्रिक भारत के सबसे बड़े और पुराने राजवंश के वारिस का दलित प्रेम कोई नई बात नहीं है . युवराज तो बस पुरखों की लीक पर पाँव साध रहे हैं . इस लोकतांत्रिक राजवंश की बुनियाद को ईमारत की शक्ल देने वाली इंदिरा गाँधी को भला कौन भूल सकता है ? साठ के दशक में बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके और राजघरानों के ' प्रिवी पर्स ' को समाप्त करके इंदिरा गांधी ने भी गरीबों का दिल जीता था . गरीबी हटाओ के एक नारे ने सन् इकहत्तर के चुनाव में इंदिरा को अपार बहुमत दिलाई थी .यह बात अलग है कि तब भी गरीबों के साथ छल हीं हुआ ! गरीबी हटाने के नाम पर गरीबों को हटाया गया . अब ,इतिहास के पन्नों में आगे बढ़ते हैं . संजय की असामयिक मौत के बाद राजीव गाँधी को कांग्रेस का महासचिव बनाया गया . तत्कालीन समय में भी राजीव के पास सत्ता की चाभी थी जैसे आज राहुल के हाथों में मनमोहन सरकार की नकेल है .उस समय राजीव ने अपनी ताकत के बल पर "सत्ता के दलालों " का हुक्का -पानी बंद कराया था . लोग काफी खुश हुए . गरीबों को एक सच्चा नौजवान नेता मिल गया जो उनकी उम्मीद को सहारा दे रहा था . राजीव ने अपने भाषणों में गरीबों के हक़ के ८५ पैसे बिचौलियों द्वारा हड़पे जाने की बात कही तो लोगों को लगा जल्द हीं बदलाव की बयार बहेगी . लेकिन गरीब जनता फ़िर ठगी गयी जब कांग्रेसी सिपहसलार वी०पी० सिंह ने राजीव गाँधी सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करते हुए जंग का एलान कर दिया .
आज इतिहास स्वयं की पुनरावृत्ति कर रहा है . फर्क कुछ खास नहीं है .आज कार्यपद्धति बदल गयी है .गरीबों को मुर्ख बनाने के नये -नये प्रयोग किये जा रहे हैं .गरीब शब्द के साथ दलित विशेषण जुड़ गया है . बाप ८५ पैसे हड़पे जाने की बात करता था वहीँ बेटा ९० पैसे चुराए जाने की ! स्वतंत्र भारत में इस लोकतांत्रिक राजवंश की चार-चार पीढियाँ गरीब उद्धार में लगी रही है . सठियाई आज़ादी के बाद भी भारतवर्ष के चौरासी [८४] करोड़ नागरिक भूखे नंगे हैं . इनके अथक प्रयासों के बावजूद भी गरीबी के आंकड़ों में सुधार नहीं हुआ है . हाँ , भ्रष्टाचारियों द्वारा डकारे जाने वाले मद की राशि ८५ से बढ़ कर ९० % जरुर हो गयी है .
इसी राजवंश की छत्र-छाया में पनपा नक्सलवाद का पौध आज भारत के बीस राज्यों में अपनी जड़ें जमा चुका है .हालिया नक्सली हिंसाओं से प्रभावित लोगों के आंसू पोछते हुए राहुल गाँधी ने कहा था – ' सरकार की नाकामी नक्सलवाद की वजह है . पिछडे इलाकों में विकास योजनाओं का ना पहुँच पाने से लोगों में नक्सलवाद की पैठ हो रही है ". बात तो सही है ! राहुल ,राजीव और इंदिरा तीनों गांधियों की बात सही है . पर क्या राहुल गाँधी यह भी बताएँगे कि इसका जिम्मेदार कौन है ? सरकार किसकी थी और है ? इसका समाधान क्या है ? समस्या की वजह किसे बता रहे हैं ओबामा को ?
गरीबी नक्सलवाद को फलने -फूलने का मौका देती है . गरीबी और बेकारी विकास योजनाओं के ना पहुँच पाने से जन्म लेती है और योजनाओं की ना पहुँच पाना सरकारीतंत्र में फैले भ्रष्टाचार का नतीजा है . आखिरकार , भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की जिम्मेवारी किसकी है ? जिस राहुल के एक इशारे पर हजारों करोड़ रुपयों के खर्चे वाले बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण का गठन हो जाता हो , जिसके मुंह से एक बार कलावती का नाम निकल जाए तो वो लखपति बन जाती हो , उस सर्वशक्तिमान के रहते देश के अन्य पिछडे क्षेत्रों और करोडों कलावतियों की दशा दयनीय क्यों है ? अब , सवाल यह उठता है कि क्या आने वाले दिनों में जनता {विशेष रूप से गरीब और दलित} यह हकीकत समझ पाएगी ? क्या कोई दलित राहुल से यह सवाल पूछने की हिम्मत जुटा पायेगा कि आये तो सही पर क्या लाये हो हमारे लिए ?


May 4, 2010 at 7:59 pm
Excellent & Dhaardaar. Keep it up.
April 3, 2010 at 7:54 pm
mein apki baat se sehmat nahi hu.agar Rahul Gandhi kuch uphaar le bhi aate to bhi to unke uppar ye iljaam lag hi jata ki wo vote purchase karne ke irade se aye the.
January 22, 2010 at 8:54 pm
एक साहब अपने ब्लॉग “सचिन की दुनिया ” पर लिखते हैं कि राहुल गाँधी ऐसे आदमी हैं जो बरसों बाद भारत एक खोज जैसा कार्यक्रम चला रहे हैं . दरअसल उनका मकसद भारत को नहीं बल्कि उन युवाओं को खोजना है जिन्हें खुली आँखों से भी लोकतान्त्रिक देश में राजतंत्र नहीं दिखता वो राजवंश नहीं दिखता है जिसके वारिश राहुल गाँधी हैं
भारत एक खोज की बात कर रहे हैं , अरे साहब भारत को खोजने की जरुरत नहीं है भारत को और भारत के वासियों को उनके दुःख-दर्द और तकलीफों को समझने की जरुरत है . पर यह किस तरह की खोज है जो जातिगत वोट बैंक के आधार पर , मजहब के आधार पर , और मीडिया सुर्ख़ियों के आधार पर किया जा रहा है ? क्या राहुल को किसी ने किसी गरीब ब्राह्मण के घर खाते देखा ? छोडिये , अगर ऐसा ही होता कि वो पाक साफ़ मन से यह सब कर रहे हैं तो कम से कम इस बात का जिक्र नहीं होना चाहिए था कि जिसके यहाँ गये थे वह कौन सी जात और धर्म का है ! अरे गरीबों का कोई धर्म नहीं होता उसे तो राहुल जैसे स्वांग करने वालों ने मीडिया के दलों की मदद से बाँट रखा है . आज कल आतंरिक चुनाव की बात उछल कर राहुल गाँधी बहुत सुर्ख्यियन बटोर रहे हैं . पर इतना ही साफ़ और पारदर्शी चरित्र चाहते हैं तो अपने नाम के आगे से गाँधी हटा दे , कांग्रेस छोड़ कर नई पार्टी बनाएं फ़िर उनकी काबिलियत का पता सबको चाल जायेगा . लोक्तान्य्त्रिक देश में अपने राजतन्त्र को छुपाने के लिए आतंरिक चुनाव का ढोंग किसलिए ?
January 13, 2010 at 4:08 am
आदरणीय जयरामजी विप्लव, आपके लेख विचारों में ज्वार-भाटा पैदा करने वाले हैं। राहुल गांधी वो सब नौटंकी सीख रहे हैं जिससे दलित उन्हें अपना मसीहा मानने लगें जबकि इस प्रजातान्त्रिक राजघराने की किसी भी पीढ़ी ने अपनी अन्तरात्मा से दलितों के विकास के लिये समुचित प्रयास नहीं किये हैं। गरीब लोग राहुल के अपने घर पर आने से गद गद तो होते हैं पर इससे उनकी हालत पर कुछ सकरात्मक प्रभाव शायद ही पडता है। इतने अच्छे लेख के लिये साधुवाद!
January 9, 2010 at 9:19 pm
maf kijiyega….magar mai aur aap shayad ek hi samasya ko alag alalg tarike se vayakt kar rahe hai..aur shayad isi ka parinaam ye hai ki kendr se bhaja vikaas ka rupyaa rajy tak pahuchta jarur hai magar un logo tak nai jinko unki jarurat hai….aur isliye jise ham badhaal kah rahe hai uske liye raajy sarkar hi jimmedar hai…mujhe nai samjh aata ki congresi sansad RAHUL GANDHI se pahle kisi ne KALAVATI jaise muddo ko sansad me ku nai uthaaya??….jabki ye koi nai samasya nai thi…aur kam se kam vipakshi dalo ko to is trh k muddo ko jarur uthaana chahiye tha….RAHUL GANDHI congres k sansad aur party k mahasachiv hai….unhone apne aapko kbhi yovraaj nai kaha…aur yahi baat congres adhyaksh SONIA GANDHI par bhi laagu hoti hai..aur yahi baat maujuda kendr sarkar par bhi ……….pahle kam ku nai hua ya kya hua kitna hua…..ye hamare samne hai…..isliye ise bahas ka mudda banana bemani hoga…aur baat yadi aur kisi ki nai to matr uttar pardesh ki hi kare to maujuda sarkar yahan bhi fail sabit ho rahi hai….yahi baat aap bhi kahte hue lag rahe hai ham bhi kah rahe hai aur RAHUL GAMDHI bhi….RAHUL GANDHI garebo ka haal jaanne pahuche to aaj ham unse sawaal kar rahe hai…..BAEHN JI bekhabar hai to koi baat nai…….pta nai ku magar cogres k alava pardesh me kisi aur vipakshi dal ko ye samasya dikhai ku nai de rahi…..isliye mai aapse sahmat hu jo karta hai ya karna chahta hai swaal bhi usi se hote hai…..aapne bilkul thik parshan kiya hai……….aur bilkul jayaz bhi………………anoop aakash verma…………….
January 9, 2010 at 1:55 pm
” बीत गयी सो बात गयी ” पांच पंक्तियों के आपकी टिप्पणी खुद द्वन्द से भरी हुई है . एक तरफ आप बीती को बिसारने में लगे हुए हैं दूसरी तरफ प्राचीन काल के राजाओं को याद कर रहे हैं . साहब पूरे लेख में कहीं भी राहुल गाँधी के दलित बस्तियों में भ्रमण को लेकर कोई टीका-टिप्पणी नहीं है बल्कि इस बात पर ऐतराज है कि आखिर उनका दुःख-दर्द जानते हुए राहुल जी को चार साल हो गये अब तक निवारण का क्या प्रयास हुआ है ? शायद आप जिन राजाओं का जिक्र कर रहे थे .उनकी कहानियों में एक और बात का जिक्र मिलता है कि यदि उनके संज्ञान में किसी का दुःख-दर्द आता था तो उनके द्वारा तत्काल रात्रि में ही याअगले दिन सुबह उस समस्या का निदान कर दिया जाता था . यहाँ उसी त्वरित कार्यवाई को लेकर चिंता है . केवल राजनीतिक फायदे के लिए यह ढोंग क्यों ? आपने इस बात का जबाव नहीं दिया आखिर राहुल गाँधी इतने लाचार क्यों हैं कि अपनी सरकार की नाकामी पर मीडिया में रो रहे हैं ,जनसभा में बोल रहे हैं . अगर सरकार की नाकामी से वाकई उनका विरोध है तो खुद इस पर कुछ कदम क्यों नहीं उठाते जब सबको मालूम है उनकी मम्मी सोनिया ही सरकार की भी मम्मी है ?
January 9, 2010 at 10:37 am
dekhiye mera manna hai ki jo beet gai so baat gai….pahle vikas ku nai hua kaise nai hua hme is par bahas nai karni chahiye…magar ha hme yah bhi swekar karna hoga ki majuda haalat se majuda sarkar se congres k mahasachiv RAHUL GANDHI naakhush hai aur wo ghum ghum kr maujuda sarkar se peedit logo ki samsyao ka pta lga rahe hai….aur agr wo samsya ka pta lga kr use dur karna chahte hai to isme harz hi kya hai…jiske lliye wo bdi aasani se uttar pardesh k gaon me dekhe ja sakte hai….DO aadmi kbhi ek trh nai soch sakte isliye shayad mujhe apne astar par nai lagta ithihas apne aapko dohra raha hai….hme prachen kahaniyo se yahi sekh mili hai ki RAJA raat me bhesh badal kr logo ka haal chaal janne nikalta tha…………..anoop aakash verma……wwwanoopverma@gmail.com………….
November 19, 2009 at 6:12 pm
kuch had tak thik ho jairam , ab is ka samadhan kya is bare socha kya aapne ,
November 3, 2009 at 9:55 pm
इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर आप सभी की सहमतिपूर्ण प्रतिक्रिया देख कर संतोष हो रहा है कि आप हमारी बात को समझ गये . आज गाँधी परिवार के इस दलित स्वांग का पर्दाफाश होना बहुत जरुरी है ,
October 31, 2009 at 5:02 pm
हा आप्ने यहा पर जो लिखा है सब बहुत हि अच है और अगर आज जहा इत्ने लोग अन्ग्रेजि क पिचे भग रहे है वह इस तरह कि सिते हिन्दि भाशा को सफल बनाने का उचित प्रयोग है..
October 29, 2009 at 11:30 am
प्रणाम जयराम भैया .. ऐसे ही लिखते रहिये !!
October 29, 2009 at 9:20 am
जयराम जि राम्-राम आपका लेख बहुत सुन्दर है. आपकेिि ईस लेख को अप्ने समाचार पत्र मे लेना चाह्ता हु. आग्या दे .
October 28, 2009 at 12:03 am
आपने तो गूढ़ बात इन शब्दों मैं कह दी – “आज इतिहास स्वयं की पुनरावृत्ति कर रहा है . फर्क कुछ खास नहीं है .आज कार्यपद्धति बदल गयी है .गरीबों को मुर्ख बनाने के नये -नये प्रयोग किये जा रहे हैं .गरीब शब्द के साथ दलित विशेषण जुड़ गया है “…
काश गरीब इन धोखों को समय रहते समझ पाए !
October 26, 2009 at 4:56 pm
अच्छी वेबसाइट है … लिखते रहिये .
October 26, 2009 at 4:54 pm
कोइ तो है जो जन्ता के बिच जा रहा है
October 26, 2009 at 4:49 pm
आपका भी जबाव नहीं ! बिलकुल नया नजरिया पेश करते हैं अपने आलेख में . मुझे नहीं लगता कोई इस तरह पूछ पायेगा . अगर इस तरह जनता सवाल करना शुरू कर दे तो साड़ी समस्या ख़त्म हो जायेगी .