विश्वकप को सालभर से भी कम समय बचा है और भारतीय टीम के दर्जनभर प्रतिभावान गेंदबाज टीम में जगह पाने के लिए जूझ रहे हैं. यह 2008 में भारतीय टीम के ऑस्ट्रेलिया दौरे की बात है, जब प्रथम श्रेणी क्रिकेट में दिल्ली से खेलने वाले छह फुट चार इंच लंबे ईशांत शर्मा ने कंगारूओं को उनकी ही सरजमीं पर चारों खाने चित्त कर दिया था. खासकर पर्थ टेस्ट में ईशांत का जादू सर चढ़कर बोला था, जब उन्होंने विकेट के दोनों तरफ स्वींग लेती अपनी गेंदों से रिकी पोटिंग जैसे महानतम बल्लेबाज को भी चकित कर दिया था. उस पूरे दौरे में ईशांत ने 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रप्तार से गेंदबाजी की थी, जिससे प्रभावित होकर ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट के सर्वकालिक महानतम कप्तानों में शुमार होने वाले स्टीव वाॅ ने भी इस तेज गेंदबाज को भारतीय टीम का ‘भविष्य’ करार दिया था.
लेकिन अब हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं. ऐसे वक्त में, जबकि 2011 में एशिया में होने वाले विश्वकप को सालभर भी नहीं बचा है, ईशांत शर्मा भारतीय टीम में खेलने के आसपास भी नहीं है. ईशांत ही नहीं, आरपी सिंग, एस श्रीसंथ, मुनफ पटेल और इरफान पठान जैसे गेंदबाजों का भी यही हाल है. ये सभी कभी न कभी भारतीय क्रिकेट के सबसे चमकते सितारे थे. अपनी रप्तार और स्वींग खाती गेंदों से इन सभी ने विश्व क्रिकेट के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों को भी पैवेलियन भेजा था. 2007 के दक्षिण अफ्रीका दौरे पर अपनी रफ़्तार से सबको चौकाने वाले श्रीसंथ इसके बाद से अब तक भारतीय टीम के लिए 17 टेस्ट और 49 एकदिनी मैच खेल चुके हैं. कभी कपिलदेव के समकक्ष करार दिए गए इरफान पठान भारत के लिए 29 टेस्ट और 107 एकदिवसीय मैच खेल चुके हैं. वहीं, अपनी स्वींग गेंदबाजी से भारतीय टीम को विदेशी मैदानों पर कई यादगार जीतें दिलाने वाले आरपी सिंह अभी तक 13 टेस्ट और 55 एकदिनी मैच खेल चुके हैं. इसी तरह भारत के लिए 12 टेस्ट और 43 एकदिवसीय मैच खेल चुके मुनफ पटेल को उनके करियर की शुरुआत में सटीक लाइन-लैंथ के चलते ग्लैन मैग्राथ की तरह का गेंदबाज माना गया था.
लेकिन हाल-फिलहाल ये सभी टीम से बाहर हैं. 2011 के बहुप्रतीक्षित विश्वकप से पहले दुनिया की अन्य टीमों की तरह ही भारतीय क्रिकेट के लिए भी यह तैयारियों का दौर है. लेकिन विश्वकप के लिए तैयार की जा रही टीम में इन सभी गेंदबाजों का नाम दूर-दूर तक भी नहीं है. इसके लिए सीधे तौर पर बीसीसीआई के मुख्य चयनकर्ता एस. श्रीकातं जिम्मेदार है. तमिलनाडू से ताल्लुक रखने वाले ये महाषय शायद भारतीय टीम में सिर्फ तमिलनाडू के खिलाड़ियों को ही देखना चाहते हैं. तभी, तो जिम्बाब्वे के लिए चुनी गई टीम में तमिलनाडू के बल्लेबाज मुरली विजय को तो आराम से जगह मिल गई, लेकिन इरफान पठान सहित भारत के ये सभी युवा गेंदबाज एक मौके के लिए भी तरस गए. हाल ही में भारतीय चयनकर्ताओं ने तीन अलग-अलग दौरों के लिए टीम का चयन किया- इंग्लैंड दौरे के लिए ए टीम का, जिम्बाब्वे दौरे के लिए सुरेश रैना की अगुवाई में युवा टीम का और श्रीलंका में खेले जाने वाले एशिया कप के लिए सबसे मजबूत टीम का. इन तीनों टीमों के लिए चयनकर्ताओं ने दर्जनभर तेज गेंदबाजों का चयन किया, लेकिन उनमें भी पठान, श्रीसंथ, मुनफ पटेल और ईशांत शर्मा का नाम नहीं था. चयनकर्ताओं के इस फैसले के चलते कई सवाल खड़े हो गए हैं. ऐसे में, जबकि दूसरे देश विश्वकप के लिए अपने सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों को तैयार कर रहे हैं, भारतीय चयनकर्ताओं ने इन अनुभवी गेंदबाजों को नजरअंदाज क्यों किया हुआ है ?
हालांकि इसका जवाब इन खिलाड़ियों के हालिया प्रदर्शन में छुपा हुआ है. गौरतलब है कि करियर की शुरुआत में करिश्माई प्रदर्शन करने वाले इन सभी गेंदबाजों के हालिया प्रदर्शन में खासी गिरावट दर्ज की गई है. चोटों से जूझते करियर के बीच न सिर्फ इन गेंदबाजों की रप्तार में कमी आई है, बल्कि बल्लेबाजों के मन में खौफ पैदा करने वाली स्वींग भी कहीं खो गई है. इसी के चलते कभी भारतीय गेंदबाजी के अगुवा रहे ये गेंदबाज अपनी लय पूरी तरह खो चुके हैं, जिसका उदाहरण हाल ही में आईपीएल में भी देखने को मिला.
फिर भी, विश्वकप से ठीक पहले 40 से ज्यादा एकदिवसीय मैच खेल चुके इन सभी गेंदबाजों को नजरअंदाज करना किसी भी मायने में सही नहीं है. पूर्व चयनकर्ता और विकेटकीपर किरण मोरे के मुताबिक- ‘कुछ महीने पहले तक ये सभी गेंदबाज भारतीय आक्रमण के अगुवा थे, लेकिन अब वे संभावित 60 खिलाड़ियों में भी नहीं है.’ खास बात यह है कि ये सभी गेंदबाज 27 साल से कम उम्र के हैं, साथ ही इनके पास भारतीय मैदानों पर अच्छे प्रदर्शन का अनुभव भी है.
इसीलिए चयनकर्ताओं के फैसले को क्रिकेट गलियारों में एकमत से गलत ठहराया जा रहा है. भारत के पूर्व गेंदबाज मनोज प्रभाकर के मुताबिक- ‘ये ठीक है कि इनका हालिया प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. लेकिन विश्वकप के लिए नए गेंदबाज तैयार करने से बेहतर यह है कि इन्हें ही फार्म में आने का मौका दिया जाए.’
वैसे, हाल-फिलहाल तो चयनकर्ता इस तरह की दरियादिली दिखाने के मूड में नहीं है. इसीलिए कई वरिष्ठ खिलाड़ियों की गैरमौजूदगी के बावजूद इन युवा तेज गेंदबाजों को जिम्बाव्बे दौरे पर नहीं भेजा गया. मोरे कहते हैं- ‘भारतीय टीम के पास फिलहाल जहीर खान और आशीष नेहरा ही बचे हैं. इनमें से भी नेहरा अक्सर चोटिल होते रहते हैं. ऐसे में भारतीय टीम की विश्वकप को लेकर तैयारियां अधूरी ही प्रतीत होती हैं.’ बात सही भी है. और इसमें भी संदेह नहीं कि चयनकर्ताओं की गलत नीतियों के चलते विश्वकप से ठीक पहले खराब पफार्म से जूझ रहे इन युवा गेंदबाजों को भी अपनी लय हासिल करने का मौका नहीं मिल पा रहा है.

