खेल-कूद|2010/02/25 4:04 pm

सचिन तेंदुलकरः महानता पर सवाल नहीं

समाचार पत्र में खेल संपादक होने के नाते कल का दिन मेरे लिए भी उतना ही ऐतिहासिक था, जितना कि करोड़ों भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के लिए. बतौर खेल संपादक दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, प्रभात किरण जैसे मीडिया संस्थानों में पिछले छह साल के कार्यकाल के दौरान मैंने हमेशा ही यह माना कि एकदिवसीय क्रिकेट में दो सौ रनों के एवरेस्ट को कुछेक खिलाड़ी ही पार कर सकते हैं. इन खिलाड़ियों में मैं सचिन तेंदुलकर के साथ ही वेस्टइंडीज के क्रिस गेल, पाकिस्तान के शाहिद अफरीदी, श्रीलंका के सनत जयसूर्या और भारत के वीरेंद्र सहवाग को शामिल किए हुए था. और कल मेरी वह उम्मीद पूरी हुई, जब सचिन ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ दोहरे शतक का कारनामा कर दिखाया.

लेकिन इस लेख में बहस का मुद्दा सचिन का दोहरा शतक नहीं है. यहां बहस का मुद्दा यह है कि आखिर कीर्तिमानों के शिखर पर खड़ा होने के बावजूद सचिन को क्रिकेट इतिहास का महानतम बल्लेबाज क्यों नहीं माना जाता ? आखिर टेस्ट, एकदिवीय क्रिकेट के हर कीर्तिमान को अपने नाम करने के बावजूद सचिन को महानतम खिलाड़ियों में से एक क्यों माना जाता है, महानतम क्यों नहीं ? क्या यह सचिन की उपलब्धियों को लेकर पूर्वाग्रह है? या फिर क्या, सचिन को वह क्रेडिट नहीं दिया जा रहा है, जिसके वे हकदार हैं ?

यह सारी बातें दिमाग में इसलिए आती हैं, क्योंकि कल सचिन के दोहरे शतक के कीर्तिमान के बाद टीवी समाचार चैनलों पर जो कुछ भी बहसबाजी दिखी, उसमें किसी न किसी तरह से यह साबित करने की कोशिश की गई कि सचिन कीर्तिमानों के शिखर पर खड़े होने के बावजूद अभी भी सर्वकालिक महान बल्लेबाज नहीं है. आईबीएन सेवन पर आशुतोष यह बात करते नजर आएं, तो आज तक पर कपिल देव कह रहे थे कि भारत का महानतम बल्लेबाज अभी भी सुनील गावस्कर है. दूसरे चैनलों पर भी मनिंदर सिंह, यशपाल शर्मा जैसे भूतपूर्व क्रिकेटर सचिन को महानतम बल्लेबाज कहने से परहेज ही करते नजर आएं.

जाहिर है, यह सारी बातें बेफिजूल की हैं. और इस बात के पर्याप्त प्रमाण भी हैं. बात सचिन के कीर्तिमानों से शुरू करते हैं. एकदिवसीय क्रिकेट में उनके नाम सत्रह हजार से ज्यादा रन, छियालिस शतक दर्ज हैं. इसी तरह टेस्ट क्रिकेट में तेरह हजार से ज्यादा रन और सैंतालिस शतक उनकें नाम दर्ज है. मतलब, क्रिकेट के दोनों संस्करणों में उनके नाम तीस हजार से ज्यादा रन और नब्बे से ज्यादा शतक दर्ज हैं. अब महान खिलाड़ी होने के दूसरे दावेदारों ब्रेडमेन और विवियन रिचर्ड्स से सचिन की तुलना करें तो बात आईनें की तरह साफ हो जाती है. बे्रडमेन का टेस्ट क्रिकेट में 99 के औसत का कीर्तिमान यकीनन ऐसा है, जिस तक सचिन भी नहीं पहुंच सकते. लेकिन यहां यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि ब्रेडमेन ने अपनी ज्यादा क्रिकेट इंग्लैंड के साथ खेली, यानी कि मात्र एक टीम के साथ. दूसरे, उस जमानें में तकनीक इस कदर विकसित नहीं थी कि आउट होने के सभी फैसलें बिल्कुल सही मान लिए जाएं. रन आउट, पगबाधा और नजदीकी कैंचों जैसे मामलों में मैदानी अंपायर का फैसला ही सर्वमान्य होता था, जो गलती भी कर जाते थे. लेकिन आज सचिन उस युग में खेलते हैं, जहां एक दर्जन कैमरें उनके आउट होने पर अपनी मुहर लगाने को तैयार रहते हैं. मतलब साफ है ब्रेडमेन तकनीक के न होने से कई बार आउट होने के बावजूद नाटआउट रहे होंगे, जबकि सचिन के लिए आउट का मतलब आउट है. तीसरे, बे्रडमेन के जमाने में एकदिवसीय क्रिकेट नहीं था, जबकि सचिन ने एकविसीय क्रिकेट को नई पहचान दी है. कहा जा सकता है कि अगर उस जमाने के सर्वकालिक महान बल्लेबाज ब्रेडमेन थे, तो आधुनिक क्रिकेट के सर्वकालिक महान बल्लेबाज सिर्फ सचिन ही हैं. इसी तरह का मामला रिचर्ड्स के साथ भी है. यकीनन, रिचर्ड्स ने एकविसीय क्रिकेट में सचिन से ज्यादा महान पारियां खेली हैं, लेकिन उनका जादू सिर्फ एकदिवसीय क्रिकेट तक ही सीमित था, टेस्ट क्रिकेट में वे उस तरह की कामयाबियां हासिल नहीं कर पाए. लेकिन सचिन एक संपूर्ण बल्लेबाज है, जिन्होंने एकविसीय और टेस्ट दोनों संस्करणों में नए कीर्तिमानों का शिखर खड़ा किया. रही बात सुनील गावस्कर से तुलना की तो, इस तुलना का आधर ही गलत है. गावस्कर ने अपने एकदिवसीय क्रिकेट में मात्र एक शतक लगाया, जबकि सचिन पचास शतक पूरे करने वाले हैं.

फिर, महानता सिर्फ आंकड़ों के आधर पर ही तय नहीं होती. खिलाड़ी के उस खेल पर प्रभाव को भी इसमें तवज्जो दी जाती है. सचिन भारतीय क्रिकेट में ही नहीं, विश्व क्रिकेट में भी पैसा लाएं. आज अगर युवराज सिंह और महेंद्रसिंह धोनी जैसे युवा आईपीएल के एक सत्र के लिए चार-पांच करोड़ रूपए ले रहे हैं, तो यह सचिन की बदौलत ही है. वे क्रिकेट में ग्लैमर लाएं और ग्लैमर से पैसा आया.

इसी तरह इस तथ्य को भी मानना होगा कि सचिन पिछले इक्कीस सालों से भारत के सबसे बड़े मैच विजेता बल्लेबाज बने हुए हैं. उनके खेल में वो निरंतरता है, जो विश्व क्रिकेट के अन्य किसी खिलाड़ी के कॅरिअर में देखने को नहीं मिली. 1989 से कॅरिअर की शुरूआत करने वाले सचिन की रनों की भूख अभी भी कायम है. वे अभी भी भारत को मैच जिता रहे हैं. 1989 में ही विश्व क्रिकेट के दो अन्य महान बल्लेबाजों ब्रायन लारा और सनत जयसूर्या ने भी अपने कॅरिअर का आगाज किया था. लारा दो साल पहले ही क्रिकेट से सन्यास ले चुके हैं, जबकि जयसूर्या टेस्ट क्रिकेट से सन्यांस के बाद एकदिवसीय और ट्वेंटी-20 तक ही सीमित हो गए हैं. 1989 में ही सचिन के साथ कॅरिअर की शुरूआत करने वाले वकार युनूस और माइकल टेलर जैसे खिलाड़ी कईं साल पहले संन्यास लेकर भूतपूर्व खिलाड़ियों की जमात में शामिल हो चुके हैं. लेकिन सचिन का बल्ला आज भी भारत के लिए मैच जीत रहा है.

इसलिए सचिन की आलोचना नहीं, तारीफ कीजिए. ग्वालियर वनडे में उन्होंने जो कीर्तिमान रचा, वह उनकी नियति थी. इससे पहले भी सईद अनवर, 194 सनत जयसूर्या 189 और विव रिचडड्र्स 189 जैसे बल्लेबाज दोहरा शतक जड़ने के बिल्कुल करीब पहुंच गए थे. लेकिन वे यह कारनामा नहीं कर पाएं, क्योंकि यह कारनामा भी अन्य कीर्तिमानों की तरह ही सचिन के नाम ही दर्ज होना था. और ग्वालियर वनडे में यह इतिहास दर्ज भी हो गया. कम से कम अब तो किसी को इस बात में शक नहीं होना चाहिए कि सचिन आधुनिक क्रिकेट के महान नहीं, महानतम बल्लेबाज हैं.

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