खेल-कूद|2010/03/07 11:49 am

सचिन की उपलब्धियों को स्वीकारने का वक्त

तकरीबन दो सप्ताह पहले दक्षिण अफीका के खिलाफ एकदिवसीय श्रंखला के दौरान ग्वालियर वनडे में दो सौ रनों की कीर्तिमान भरी पारी खेलकर समूचे देश को मंत्रमुग्ध
कर देने वाले सचिन तेंदुलकर को लेकर अब देश में एक नई बहस छिड़ गई है. यह बहस सचिन को देश का सर्वोच्च पुरस्कार ‘भारत-रत्न’ दिए जाने के मुद्दे पर छिड़ी है. उम्मीद के मुताबिक ही सवा अरब से ज्यादा की आबादी वाले क्रिकेट के दीवाने इस देश की नब्बे फीसदी से भी ज्यादा आबादी सचिन को यह पुरस्कार दिए जाने के हक में है. हालांकि कुछेक फीसदी लोग ऐसे भी है, जिन्हें सचिन को यह पुरस्कार दिया जाना उचित नहीं लगता. लेकिन सचिन को भारत रत्न दिए जाने का विरोध करने वाले ऐसे लोगों का आंकड़ा आटे में नमक के बराबर है.

सच यह है कि भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा सचिन को यह पुरस्कार दिए जाने के पक्ष में है. भारत रत्न, देश का सर्वोच्च सम्मान है, जो 1947 में आजादी मिलने के बाद अब तक इकतालिस शख्सियतों को दिया जा चुका है. आजाद भारत के पहले राष्ट्रपति डा० राजेंद्र प्रसाद ने 2 जनवरी 1954 को भारत रत्न सम्मान पर अपनी मुहर लगाई थी और 1954 में ही भारत के पहले उप-राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन को सबसे पहले इस सम्मान से नवाजा गया. आमतौर यह सम्मान राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया जाता है. 1954 के बाद ‘भारत-रत्न’ अभी तक सीवी रमन, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, उस्ताद जाकिर हुसैन, डा० राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, राजीव गांधी, सरदार वल्लभ पटेल, मोरारजी देसाई, डाॅ अब्दुल कलाम, रवि शंकर और अर्मत्य सेन जैसी महान शख्सियतों को भारत के सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र में योगदान के लिए दिया जा चुका है.

और अब, समूचे देश में सचिन तेंदुलकर को यह सम्मान देने की मांग उठने लगी है. ऐसे में पहले यह परखना जरूरी हो जाता है कि क्या सचिन देश के इस सर्वोच्च सम्मान को पाने के हकदार है ? अतीत में भारत-रत्न पाने वाली महान विभूतियों के नामों पर नजर दौड़ाएं तो स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो जातीे है. नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों को भारतीय राजनीति में अहम योगदान के लिए इस सम्मान से नवाजा गया. वहीं, लता मंगेशकर, भीमसेन जोशी और पंडित रवि शंकर को कला क्षेत्र में भारत का मान बढ़ाने के लिए यह पुरस्कार दिया गया. इसी तरह डा० अब्दुल कलाम आजाद को तकनीक के क्षेत्र में भारत का नाम वैश्विक मंच पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज कराने के लिए ‘भारत-रत्न’ से सम्मानित किया गया. निस्संदेह, ये सभी भारतीय सरजमीं पर जन्मी वे महान शख्सियतें है, जिन्होंने अपने कर्मों से भारत का गौरव बढ़ाया.

जाहिर है, गांधी-नेहरू परिवार ने जो योगदान भारतीय राजनीति में दिया, डा० अब्दुल कलाम ने जो योगदान भारत की तकनीकी विकास में दिया और पंडित रवि शंकर व उस्ताद जाकिर हुसैन ने जो योगदान कला के क्षेत्र में दिया, वैसा ही योगदान सचिन तेंदुलकर भी खेल के क्षेत्र में दे रहे हैं. पिछले दशक से भी ज्यादा समय से सचिन ने क्रिकेट के मैदान पर सिर्फ कीर्तिमान ही नहीं बनाएं है, बल्कि भारतीय क्रिकेट का झंडा भी बुलंद किए रखा है. सैंतीस वर्षीय सचिन भारतीय क्रिकेट का पर्याय हैं, तो सिर्फ इसलिए कि उन्होंने दुनिया के प्रत्येक कोने में भारतीय टीम के लिए मैच जीते हैं, उसकी साख बढ़ाई है. मैदान में उनकी मौजूदगी ही करोड़ों भारतीयों को इस बात की गारंटी देती है कि मैच में उनकी टीम जीत हासिल कर सकती है. आज शाहरूख खान, प्रिटी जिंटा जैसे फिल्मी सितारे और मुकेश अंबानी व विजय माल्या जैसे उद्योगपति भी अगर क्रिकेट में पैसा निवेश कर रहे हैं, तो यह सिर्फ सचिन की बदौलत है. सचिन के खेल से क्रिकेट भारत का सर्वाध्कि पसंदीदा खेल बना और उसमें ग्लैमर और पैसा आया.

फिर, सचिन का योगदान सिर्फ क्रिकेट के मैदान तक ही सीमित नहीं है. पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से वे भारत की एकमात्र ऐसी शख्सियत बने हुए है, जिसके नाम पर समूचा देश एकजूट हो जाता है. उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक, सचिन का जादू देश के हर कोने में महसूस किया जा सकता है. वे देश के सबसे बड़े ब्रांड एम्बेसडर है और एकता के प्रतीक भी. समूचे देश को एकजूट करने का माद्दा न तो भारतीय फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन में है और न ही देश को संचालित करने वाली सरकारों के किसी नेता में है. यह करिश्मा सिर्फ सचिन में है. हाल ही में बाल ठाकरे के साथ सचिन के एक तथाकथित विवाद ने इस बात पर मूहर भी लगा दी, जब समूचे देश के साथ ही मराठीभाषी भी सचिन के साथ खड़े दिखाई दिए थे.

इसके साथ ही, सचिन की जीवनशैली और उनका नजरिया भी क्रिकेट के मैदान पर उनके द्वारा बनाए गए कीर्तिमानों से कम नहीं है. क्रिकेट की दुनिया का हर कीर्तिमान अपने नाम दर्ज होने, करोड़ों रूपए की सालाना कमाई करने और शोहरत के शिखर पर आसिन होने के बावजूद सचिन के पैर अभी भी जमीन पर टिके हुए हैं. उनके व्यहार की सरलता और मासूम मुस्कान भी उनके चैको-छक्कों की तरह ही प्रत्येक भारतीय को मंत्रमुग्ध कर देती है. देश की युवा पीढ़ी के लिए सचिन की जीवनशैली एक मिसाल है, जो सिखाती है कि दौलत-शोहरत के बावजूद विनम्र बनकर कैसे रहा जाता है. देश को लेकर उनका नजरिया भी मंत्रमुग्ध कर देने वाला रहता है. राज ठाकरे और बाल ठाकरे जैसे पथभ्रष्ट राजनेताओं की ‘देश बांटो , राज करो’ की नीति को धता बताते हुए सचिन को यह कहने में गर्व होता है कि वे पहले एक भारतीय है, उसके बाद महाराष्ट्रीयन. यह कहने का साहस न तो उत्तरप्रदेश से आए अमिताभ बच्चन में है और न ही दिल्ली से आए शाहरूख खान में. यह कहने का साहस सिर्फ सचिन तेंदुलकर में है, जो पिछले दो दशकों से भारतीय तिरंगा अपने हेलमेट पर लगाकर मैदान में सिर्फ भारतीय क्रिकेट की विजय के लिए उतरता रहा है.

जाहिर है, सचिन को भारत-रत्न दिए जाने के मुद्दे पर विवाद खड़ा करने में कोई तुक नहीं है. खेल के क्षेत्र में उनका वही योगदान है, जो राजनीति में गांधी-नेहरू परिवार और कला में लता मंगेशकर, भीमसेन जोशी और पंडित रवि शंकर का. आलोचकों का तर्क है कि देश के इतिहास में आज तक किसी भी खिलाड़ी को यह सम्मान नहीं दिया गया है. अगर यह मान भी लिया जाएं कि नहीं दिया गया है, लेकिन अब सचिन को दे दिया जाए तो इसमें बुराई क्या है. भारत रत्न में जरूरत पढ़ने पर संसोध्न किया जा सकता है, यह तभी स्पष्ट हो गया था जब दक्षिण अफीका के महान स्वतंत्रता सेनानी नेल्सन मंडेला को ‘भारत-रत्न’ से सम्मानित किया गया था. सम्मान की नियमावली से बाहर जाते हुए 1987 में पाकिस्तानी स्वतंत्रता सेनानी खान अब्दुल गफार खान को भी ‘भारत-रत्न’ से नवाजा जा चुका है. तो अगर ऐसे में सचिन भारत-रत्न पाने वाले पहले खिलाड़ी बन सकते हैं, तो इसमें कोई बुराई नहीं है. कुछ अन्य आलोचकों का यह भी मानना है कि सचिन की उम्र इस सम्मान को पाने के लिए बहुत कम है. इसका मतलब तो यह है कि हमें सचिन की उपलब्धियों ;जो उन्होंने क्रिकेट के मैदान में सैंतीस साल की उम्र में ही हासिल कर ली, को स्वीकार करने के लिए उनके साठ या अस्सी साल तक होने का इंतजार करना चाहिए. इन्हीं नीतियों के चलते भारत सरकार ने भीमसेन जोशी जैसी महान शख्सियत को ‘भारत-रत्न’ से सम्मानित करने में साठ साल लगा दिए. तो क्या हमें वहीं गलती सचिन तेंदुलकर के मामलें में भी करनी चाहिए. जाहिर है, यह गलती शर्मनाक साबित हो सकती है. अगर सचिन भारत-रत्न के लायक हैं, तो उन्हें यह सम्मान अभी दिया जाना चाहिए, न कि उनके साठ या अस्सी साल के होने पर.

इसीलिए, देश के राजनीतिक गलियारों में भी सचिन के पक्ष में खड़े होने का सिलसिला शुरू हो गया है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने स्पष्ट कर दिया है कि वे केंद्र के पास सचिन को ‘भारत-रत्न’ दिए जाने का प्रस्ताव भेजेंगे. क्रिकेट की दुनिया के भूतपूर्व महानतम खिलाड़ियों-रवि शास्त्री, नवजोतसिंह सिद्धू और सौरव गांगुली ने भी सचिन को सम्मान दिए जाने की वकालत की है. यहां तक कि बदले हुए हालात के मद्देनजर बाल ठाकरे ने भी सचिन को ‘भारत-रत्न’ का सच्चा दावेदार करार दिया है. चंद दिनों पहले मराठी मुद्दें पर सचिन की खिलाफत करके फजीहत करा चुके बाल ठाकरे ने अब ऐलान कर दिया है कि भारतीय क्रिकेट का यह कोहिनुर अभी भी करोड़ों भारतीयों के दिलों में ‘रत्न’ की तरह विराजमान है.

सचिन अगर ‘भारत-रत्न’ पाने में कामयाब हो जाते हैं, तो वे कईं नए कीर्तिमान स्थापित करेंगे. वे ‘भारत-रत्न’ लेने वाले सबसे कम उम्र के भारतीय तो बनेंगे ही, सम्मान पाने वाले पहले खिलाड़ी भी बन जाएंगे. एक ऐसे सच्चे भारतीय, जिसने पिछले दो दशकों से भारतीय क्रिकेट की शान को बनाए रखा है, के नाम पर अगर यह कीर्तिमान दर्ज हो जाते हैं, तो इसमें कोई बुराई नहीं है. सही मायनों में, यह सचिन का विरोध करने का नहीं, उनकी उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए उनके पक्ष में खड़े होने का समय है.

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