लेखक: सुनील बघेल
हाल ही में क्रिकेट इतिहास के सबसे महानतम गेंदबाज श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन ने शिखर पर रहते हुए टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया,ऐसे मौके पर फिरकी के इस जादूगर के करियर से जुड़े उस घटनाक्रम को याद करना जरूरी है, जब मुरली को हजारों दर्शकों के सामने बीच मैदान में थ्रो गेंदबाज घोषित कर दिया गया था. आॅस्टेªलिया के खिलाफ ही 28 अगस्त 1992 को अपने टेस्ट करियर का आगाज करने वाले मुरली शायद ही इस मुकाम तक पहुंच पाते, अगर इन विवादों ने उनकी अग्निपरीक्षा न ली होती. 26 दिसंबर 1995 के बाॅक्ंिसग डे टेस्ट से पहले मुरली एक साधारण आॅफ स्पिन गेंदबाज थे. उनकी गेंदों में टर्न तो मौजूद था, लेकिन रहस्यमयी गेंदे, बल्लेबाजों के दिमाग को पढ़ लेने की योग्यता नहीं थी. इससे भी बढ़कर, इन विवादों से पहले मुरली में खुद को विश्व क्रिकेट के महानतम गेंदबाज के तौर पर स्थापित करने का जज्बा भी नहीं आ पाया था. आॅस्टेªलिया के खिलाफ इस मैच से पहले मुरली अपने करियर के 22 टेस्ट मैचों में 32 से ज्यादा की औसत से मात्र 80 विकेट ले पाए थे.
लेकिन 26 दिसंबर 1995 में मेलबोर्न टेस्ट में जो कुछ घटित हुआ, उसने मुरली की सोच पर गहरा प्रभाव छोड़ा. आॅस्टेªलिया क्रिकेट में हर साल 26 दिसंबर यानी बाॅक्ंिसग डे के मौके पर टेस्ट मैच खेले जाने की परंपरा उस टेस्ट श्रंृखला के दौरान भी निभाई जा रही थी, जब 26 दिसंबर 1995 को मेजबान टीम श्रीलंका के साथ टेस्ट मैच खेलने उतरी थी. मेलबोर्न में खेले गए इसी टेस्ट के दूसरे दिन यानी 27 दिसंबर को श्रीलंका के फिरकी गेंदबाज मुथैया मुरलीधरन की गेंदों को आॅस्टेेªलिया मूल के अंपायर डेरेल हेयर ने तीन ओवरों के भीतर ही सात बार ‘नोे बाॅल’ घोषित किया था. आमतौर पर गेंदबाज जब गेंदबाजी रेखा से बाहर जाकर गेंद डालता है, तब अंपायर उसे ‘नो बाॅल’ घोषित करता है, लेकिन इस मामले में खास बात यह थी कि डेरेल हेयर ने गेंदों को इसलिए ‘नो बाॅल’ करार दिया था, क्योंकि उनकी नजर में मुरलीधरन गलत एक्शन के साथ गेंदबाजी कर रहे थे. इसके 10 दिन बाद जब 5 जनवरी 1996 को श्रीलंका टीम आॅस्टेªलिया और वेस्टइंडीज के साथ खेली गई त्रिकोणीय श्रंृखला के सातवें मैच में वेस्टइंडीज के खिलाफ ब्रिस्बेन के मैदान पर उतरी, तो फिर से यही कहानी दोहराई गई. इस बार हेयर के बजाए अंपायर राॅस इमरसन ने मुरली के पहले ही ओवर की तीन गेंदों को ‘नो बाॅल’ घोषित कर दिया. हेयर की तरह ही अंपायर इमरसन ने भी अवैध एक्शन के साथ गेंदबाजी के लिए मुरली की गेंदों को ‘नो बाॅल’ करार दिया था.
मात्रा 23 साल की उम्र में अवैध गेंदबाज घोषित कर दिए जाने के बाद मुरली के करियर का अंत निश्चित था. मुरली ने भी हार मान ली थी. आने वाले सालों में जो गेंदबाज क्रिकेट की दुनिया का हर बड़ा कीर्तिमान अपने नाम दर्ज कराने वाला था, उसने स्पिन को छोड़कर मध्यम तेज और लेग स्पिन गेंदबाजी का भी फैसला कर लिया था. लेकिन तभी, कप्तान अर्जुन राणातुंगा की अगुवाई में समूचा श्रीलंका मुरली के पक्ष में आ गया. आईसीसी से लंबी लड़ाई लड़ी गई, तकनीक के सहारे यह साबित किया गया कि मुरली के गेंदबाजी एक्शन में कोई खोट नहीं है.
टीम, प्रशंसकों और श्रीलंका बोर्ड के इसी समर्थन को मुरली के करियर का निर्णायक मोड़ कहा जा सकता है. तब तक विश्व क्रिकेट में आॅफ स्पिन गेंदबाजी के मामले में पाकिस्तान के अब्दुल कादिर और भारत के बिशनसिंह बेदी ने ही नाम कमाया हुआ था. लेकिन फिर भी स्पिन गेंदबाजी की यह कला तब तक क्रिकेट में अपना ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाई थी. लेकिन आॅस्टेªलियाई अंपायरों के गतिरोध के बाद मुरली ने इस कला को नया जीवनदान देने का संकल्प ले लिया.
नतीजा यह रहा कि बाद के सालों में मुरली ने गेंदबाजी के हर कीर्तिमान को अपने नाम दर्ज कराया. भारत के खिलाफ वर्तमान में खेलीे जा रहीे तीन टेस्ट मैचों की श्रंृखला के पहले मैच के बाद जब मुरली ने टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लिया, तो गेंदबाजी का हर कीर्तिमान उनके साथ जुड़ा हुआ था. 800 विकेटों के साथ वे टेस्ट क्रिकेट के सबसे कामयाब गेंदबाज हैं, उन्होंने सबसे ज्यादा 67 बार एक पारी में 5 विकेट झटके हैं, मैच में सबसे ज्यादा 22 बार दस विकेट लेने का कारनामा भी उनके नाम दर्ज है. टेस्ट की तरह ही एक दिवसीय क्रिकेट का हर कीर्तिमान भी उनके नाम ही दर्ज है. 337 एक दिवसीय मैचों में 512 विकेटों के साथ वे क्रिकेट के इस संस्करण के भी सबसे कामयाब गेंदबाज हैं.
लेकिन मुरली की महानता सिर्फ विकेटों की संख्या तक ही सीमित नहीं है. किसी भी खेल में खिलाड़ी की महानता को इस पैमाने पर आंका जाता है कि उसने अपने देश, अपनी टीम को शिखर तक पहुंचाने में कितना योगदान दिया? इस मायने में यह बात बगैर किसी शक-शुबहे के कहीं जा सकती है कि विश्व क्रिकेट में मुरली से बड़ा मैच विजेता खिलाड़ी नहीं हुआ है. टेस्ट क्रिकेट में मुरली ने 67 बार एक पारी में 5 विकेट झटके हैं, जिनमें से 40 टेस्ट मैचों में श्रीलंका को जीत हासिल हुई है. 1983 में टेस्ट क्रिकेट खेलने की शुरुआत करने वाली श्रीलंका टीम मुरली के पहले भी गेंदबाजी के मामले में साधारण थी और शायद मुरली के बाद भी साधारण रहेगी. लेकिन जब तक मुरली श्रीलंका के लिए खेलने उतरते रहे, उन्होंने हर विपक्षी टीम के खिलाफ अपने देश का झंडा लहराया. 1996 के विश्वकप में अगर श्रीलंका विश्वविजेता बनकर उभरी और उसके बाद टेस्ट क्रिकेट की भी सबसे कामयाब टीमों में शुमार हुई, तो इसका श्रेय बहुत हद तक मुरली को ही जाता है. टेस्ट क्रिकेट में तब तक ‘नवजात टीम’ कही जाने वाली श्रीलंका को मुरली ने न सिर्फ अपने घरेलू मैदान पर मैच जिताए, बल्कि विदेशी सरजमीं पर भी ऐतिहासिक कामयाबियां हासिल कीं. इसी के बूते वे पिछले सत्रह सालोें से श्रीलंका ही नहीं, विश्व क्रिकेट के भी शीर्ष गेंदबाज बने हुए थे.
फिर, किसी खिलाड़ी की महानता का एक पैमाना यह भी होता है कि विपक्षी टीम के खिलाड़ियों पर उसके प्रभाव का आकलन किया जाए. इस मामले में भी मुरली अपने प्रतिद्वंद्वियों- शेन वार्न और अनिल कुंबले से श्रेष्ठ नजर आते हैं. आध्ुानिक क्रिकेट के दो महानतम बल्लेबाजों- सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ मानते हैं कि मुरली की गेंदों को खेलना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती रही. वहीं, आध्ुानिक क्रिकेट के सबसे विस्फोटक बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग ने भी मुरली को आखिरी विदाई देते हुए खुलेतौर पर स्वीकार किया है कि वे मुरली की रहस्यमयी गेंदों को कभी भी समझ नहीं पाए. बाद के सालों में मुरली ने अपनी गेंदबाजी में कई नए आयाम जोड़े. क्रिकेट को ‘दूसरा’ गेंद देेने का श्रेय भले ही पाकिस्तान के सकलेन मुश्ताक को जाता है, लेकिन मुरली ने इस गेंद को दुनियाभर के बल्लेबाजों के लिए परेशानी का सबब बना दिया. इन्हीं घूमती हुई गेंदों के बूते मुरली ने अपने सत्रह साल के करियर में हर बल्लेबाजा को अपनी ध्ुान पर नचाया. इससे भी बढ़कर, अपनी रहस्यमयी गेंदों के बूते उन्होंने विश्व क्रिकेट में आॅफ स्पिन गेंदबाजी को भी सम्मानजनक स्थान दिलाया, जो उनसे पहले खत्म होती जा रही कला मान ली गई थी.
तो, अब इस कला के सबसे बड़े जादूगर ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया है. हालांकि उनके प्रशंसकों के लिए यही बात राहतभरी है कि वे एकदिवसीय और ट्वेंटी-20 क्रिकेट में खेलते रहेंगे. फिलहाल तो महान उपलब्धियों के लिए मुरली को सलाम करने का वक्त है.
