खेल-कूद|Shortlink: 2010/07/14 6:06 pm

क्रिकेट के देश में बैडमिंटन का जलवा

टेनिस में भले ही आजाद भारत के साठ बरस के इतिहास में सिर्फ सानिया मिर्जा ने ही आंशिक कामयाबी हासिल की हों, लेकिन बैडमिंटन के खेल में समय-समय पर ऐसी प्रतिभाएं सामने आती रही हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमाई है. हैदराबाद के लाल बहादुर स्टेडियम से निकलकर दुनिया की तीसरे नंबर की खिलाड़ी बनने तक का सफर तय करने वाली साइना नेहवाल के पहले भी अपर्णा पोपट और प्रकाश पादुकोण जैसे खिलाड़ियों ने बैडमिंटन के खेल में भारत का मान बढ़ाया है.

खासकर, 80 के दशक में प्रकाश पादुकोण की बैडमिंटन के खेल में उपलब्धियों ने समूचे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था. सायना नेहवाल की तरह ही पादुकोण ने भी 1980 में स्वीडन ओपन, डेनमार्क ओपन और आल-इग्लैंड टूर्नामेंट जीतकर इतिहास रचा था. हालांकि उस दौर में अधिकृत तौर पर व्यावसायिक टूर्नामेंट आयोजित नहीं किए जाते थे. हालांकि बैडमिंटन की विश्व स्पर्धा की शुरूआत 1977 में ही हो गई थी, लेकिन खिलाड़ियों को ‘व्यावसायिक खिलाड़ी’ का दर्जा हासिल नहीं था. तब बैडमिंटन के खिलाड़ियों को ‘लाइसेंसी खिलाड़ी’ कहा जाता था और उन्हें एशियन गेम्स जैसी कुछ स्पर्धाओं में तो भाग लेने की इजाजत भी हासिल नहीं थी. बावजूद इसके प्रकाश पादुकोण की उपलब्धियों को लेकर किसी को संदेह नहीं था. उस दौर में खिलाड़ियों के प्रदर्शन को आंकने के लिए विश्व रैकिंग की सुविधा मौजूद नहीं थी, बावजूद इसके पादुकोण उस दौर के निर्विवाद श्रेष्ठ खिलाड़ी थे.

बाद के सालों में महिला खिलाड़ियों ने भी पादुकोण की कामयाबी के सफर को आगे बढ़ाने की पुरी कोशिश की. 80 के दशक में ही मधुमिता गोस्वामी ने अपने तेज और आक्रामक खेल से राष्ट्रीय स्तर पर धमाकेदार आगाज किया. हालांकि सुरक्षात्मक खेल के उस दौर में आक्रामक नजरिए के बावजूद गोस्वामी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी कामयाबियों को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर दोहराने में नाकाम रही. इसके बाद नब्बे के दशक में अर्पणा पोपट ने भी खूब सुर्खियां बटोरी. पूणे निवासी पोपट को प्रकाश पादुकोण ने अपनी देखरेख में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कामयाबी के लिए तैयार किया था. 1998 में कुआलालम्पुर में आयोजित कॉमनवेल्थ खेलों में पोपट ने रजत पदक जीतकर अपनी प्रतिभा की झलक भी दिखाई, लेकिन आने वाले सालों में वे भी अपनी प्रतिभा को सफलता में नहीं बदल पाई.

लेकिन सायना नेहवाल मानसिक और शारीरिक दृढ़ता दोनों में ही अपनी पूर्ववर्ती महिला खिलाड़ियों से ज्यादा मजबूत नजर आती है. पूर्व राष्ट्रीय चैंपियन विमल कुमार का मानना है कि इन्हीं खूबियों के बूते सायना लंबे समय तक टूर्नामेंट जीतने में कामयाब रहेगी. विमल कुमार के मुताबिक-‘अपनी शारीरिक और मानसिक मजबूती के चलते सायना लंबे चलने वाले मुकाबलों में अपने विपक्षी पर भारी पड़ती है.’ प्रकाश पादुकोण की भी सायना के बारे में इसी तरह की राय है, जिनके मुताबिक-‘अगर वे अपने खेल मेें निरंतरता बनाए रखती है, तो फिर यह तय है कि वे भारतीय बैडमिंटन की सबसे कामयाब महिला खिलाड़ी साबित होगी.’ सायना के खेल से बेहद प्रभावित पादुकोण ने सालभर पहले ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि हैदराबाद की यह खिलाड़ी जल्द ही दुनिया की शीर्ष तीन खिलाड़ियों में शामिल हो जाएगी. अब नंबर तीन की खिलाड़ी बनकर सायना ने इस भविष्यवाणी को सही भी साबित कर दिया है.

वैसे भी, सायना का लक्ष्य एकदम स्पष्ट है-भारत की सर्वकालिक महान महिला एथलिट बनना. वे कहती भी हैं-‘मैं आने वाले सालों में भारत के लिए कईं टूर्नामेंट जीतकर शीर्ष पर पहुंचना चाहती हूं.’ ठीक चार दशक पहले 1980 में बैंकांक में आयोजित एशियन खेलों में कंवलजीत संधू ने 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर भारत के लिए पदक जीतने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया था. इसके बाद अस्सी के दशक में पीटी ऊषा ने भी अपनी कामयाबियों से देश का मान बढ़ाया था. इक्कीसवीं सदी में सानिया मिर्जा भले ही अपनी प्रतिभा को सफलता में तब्दील करने में नाकाम रही हो, लेकिन सायना नेहवाल से उनके प्रशंसकों को कामयाबी के दौर के लंबे समय तक रहने की उम्मीदें हैं. भले ही बैडमिंटन के खेल में क्रिकेट की तरह आंखें चूंधिया देने वाला पैसा नहीं बरसता, लेकिन सायना ने देश के गौरव को बढ़ाने को अपना लक्ष्य मान लिया है. प्रकाश पादुकोण की तरह ही सायना नेहवाल भी मौजूदा दौर में सर्वश्रेष्ठ भारतीय एथलिट नहीं है, लेकिन उनमें वे दो खूबियां मौजूद है, जो किसी भी खिलाड़ी के कामयाब होने के लिए बेहद जरूरी है-मेहनत और समर्पण. इन्हीं खूबियों के बूते बीस वर्षीया हैदराबादी सायना बैडमिंटन के क्षेत्र में भारतीय तिरंगा लहराने के अपने सफर का आगाज कर चुकी है.

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