खेल-कूद|2010/03/15 9:50 pm

आंसू बहा रहा है दद्दा की विरासत

हाकी विश्व कप ख़त्म हुआ और आई पी एल का भूत सवार हुआ , मगर हाकी के बारे में कुछ तो कहना बचा  रह ही गया है भाई  | कहा है की फिर दिल दिया हाकी को और फिर दिल टुटा हाकी से | जब भी हाकी की बात होती है तो इसके दुर्दिन का दोष क्रिकेट के सर मढ़ दिया जाता है | आसान भी होता है, अपनी गलती छुपाने के लिए दोष किसी और के ऊपर डाल देना , मगर सच्चाई तो यही है की दद्दा (मेजर ध्यानचंद) की विरासत आज अपनी आखरी सांसे ले रहा है | हमारा राष्ट्रीय खेल आज अपने नौनिहालों की वजह से कहीं एक कोने में खड़ा आंसू बहा रहा है | जिस विधा ने कभी ओलम्पिक जैसे खेल में हमारे देश को सम्मानित किया था, आज उसी खेल की इज्ज़त को हमने तार-तार कर के रख दिया |

भारत ने हॉकी में अब तक ओलंपिक में आठ स्वर्ण, एक रजत  और दो कांस्य पदक जीते हैं। स्वतंत्र भारत ने इसे अपना राष्ट्रीय खेल भी घोषित किया है। मगर अब जो स्थिति है, उसने  इस खेल को कही का नहीं रखा है | हम अपने देश में अपने दर्शकों के सामने ऐसे खेल रहे थे जैसे की हमने कसम खा रखी हो, की कुछ भी हो जाये इस हाकी का हम बंटाधार कर के ही दम लेंगे | कहीं किसी ने कहा था की विश्वकप तक बर्बाद हो जाएगी हाकी , और देखिये ऐसा ही हुआ | कहा जाता है की भारतीये  हाकी गुटबाजी की शिकार है, और इसका साफ़-साफ़ असर  इस विश्व कप हाकी आयोजन में देखने को मिला |

हमारे टीम के खिलाडीओं  को देख ऐसा लगा जैसे पूरे टूर्नामेंट में विपक्षी टीम  से नहीं, अपने ही खिलाडिओं से खेल रहे हो | ये ना गेंद पास करने को तैयार  थे, और ना ही इनकी आपसी तालमेल नजर आई | ये तो बस गेंद मिलते ही ऐसे भागते  नजर आते थे जैसे वो मैदान में अकेले खेल रहे हों | पेनाल्टी कॉर्नर को गोल में तब्दील ना करने की हमारी पुरानी आदत रही है , इसका भी खामियाजा भुगता टीम ने | डी एरिया के पास गेंद लेकर भटकने से ज्यादा ये कुछ नहीं करते नजर आये | मुझे परगट सिंह की बहुत याद आती है , मुझे याद है परगट सिंह डिफेंडर हुआ करते थे और जब गेंद एक बार उनके पास आ जाती थी, तो ज्यादातर बार वो गेंद को लेकर विपक्षी डी एरिया में चले जाते थे , और कई  मौके पर गोल भी दाग देते थे | उसी तरह मो: शाहिद, एम .पी. सिंह, थोएबा सिंह, जगबीर सिंह, अशोक कुमार और बाद में धनराज पिल्लई ये सभी ऐसे खिलाड़ी थे जो हाकी देखने के लिए लोगों को मैदान तक खींच लाते  थे | सोंचिये जब दद्दा (मेजर  ध्यानचंद) या रूप सिंह जैसे खिलाड़ी खेलते होंगे तब हाकी कैसे होती होगी | मगर आज के हमारे खिलाड़ी…  अर्जेंटीना के खिलाफ हुए अपने आखिरी मैच में खिलाडी अपने ही दर्शकों से उलझ पड़े , उन्हें भद्दे भद्दे इशारे तक कर दिए | अरे भाई आप ख़राब खेलेंगे तो तो लाजमी है दर्शक तो आप से नाराज होंगे ही, तालियाँ भी तो वही बजाते हैं आपके लिए | पर कम से कम आप तो धैर्य रखते, लगे उलटे सीधे इशारे  करने | आप तो दर्शकों को अपने से दूर ही कर रहे हैं | याद रखियेगा खामियाजा भी आप ही भुगतेंगे |

आज  हम भारतियों को गर्व है की हम ऐसे समय  में है , जब हमने तेंदुलकर को खेलते देखा है, हमने भारतीये क्रिकेट को विश्व का सिरमौर बनते देखा है | लेकिन इस सुख पर एक दुःख भी हमें ही हैं की  , हम ऐसे समय में भी हैं जहाँ भारतीय हाकी अर्श से फर्श तक का सफ़र तय कर रही है |  आज हमारी हाकी अपने देश में बेगानी बन कर रह गयी है | यहाँ की खेल राजनीति ने हाकी को इतना ज्यादा जख्म दे दिया है , की आज वो कराहती  हुई अपने को बचा लेने की गुजारिस करती नजर आ रही है | क्या आज हमारे देश में हाकी को बदहाल स्थिति से उबारने वाला कोई नहीं है ?

हाकी के पहले मैच मैं जब हमारी टीम ने पकिस्तान को हराया था तब, हर तरफ से इनामों की झड़ी लग गयी थी , ये कुछ जल्दी में लिया गया फैसला भी कहा जा सकता है | कम से कम टूर्नामेंट ख़त्म होने का तो इंतज़ार कर लेते | अब ऐसे प्रदर्शन के बाद जो इनाम की राशी है वो कही खुन्नस में ना दिए गये तो ये भी हमारे खिलाड़ियों के लिए मनोबल तोड़ देने वाला होगा | आज  अगर हमारे खेल प्रशासन और खिलाडियों की  हरकते ऐसे ही चलती रही तो यकीं माने एक दिन ऐसा भी आ जायेगा जब ये हाकी खेलने मैदान में तो जरुर जायेंगे, पर इन्हें देखने के लिए शायद उस मैदान में कोई नहीं हो| मेरे देश के खेल प्रशासको जागो , अपनी हाकी को बचाने का प्रयास करो, हाकी को अभी सही पटरी पर लाने का समय है, कही समय बीत गया तो कुछ नहीं बचेगा | अपनी धरोहर को बचा लो, कही ऐसा समय ना आ जाये  की, फिर  कोई भी हाकी को दिल देने के लिए भी ना कहे, क्यूंकि तब तक हाकी के लिए दिल किसी के पास बचेगा ही नहीं |

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