लकड़ी और लोहे का विकल्प पौलीवूड स्लीपर

देश भर में गर्मी विकराल रूप लेता जा रहा है। इस वर्ष भी बारिश के सही से न होने पर पूरे देश में पानी के लिए हहाकार सा है। कई जगहों पर तो पानी की वजह से सरकार और प्यासे लोगों के बीच घमासान भी मचा हुआ है। वहीं जनसंख्या भी तेजी से बढ़ता जा रहा है। और देश भर में शहरीकरण के कारण पारंपरिक श्रोतों का बेजा इस्तेमाल भी तेजी से होने लगा है। बढ़ती जनसंख्या ने देश में विभिन्न प्रकार की समस्याओं को जन्म दिया है जैसे अशिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, पलायन, जलयावु परिवर्तन, जंगलों का कटाव, प्रदुषण, ग्लोबल वार्मिंग आदि।

सरकार अशिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, गरीबी आदि पर तो लगातार अंकुश लगाने का दांवा करती है हांलाकि यह संभव नहीं हो पा रहा है। लेकिन प्रदुषण, मृदा अपर्दन, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण असंतुलन आदि जैसी समस्याओं पर ना सही रूप से ध्यान केन्द्रित है और ना ही जनता इसके निदान के लिए आगे आना चाहती है। दरअसल शहरों में लोग इस कदर सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से जुझ रहे है कि अन्य दायित्वों से भागते नजर आ रहे है। उदाहरण के तौर पर अगर सरकार लाख कहती है कि प्लास्टिक थैलियों का इस्तेमाल न करें यह पर्यावरण के लिए खतरा है। बावजूद सुविधाभोगी हो चुकी जनता इसे हर वक्त नकार देती है। परिणाम होता है कि ये थैलिया न सिर्फ प्रदुषण फैलाने में मदद करती है बल्कि इसके खाने से हर साल लाखों जानवर मारे जाते है।

आज भी देश में प्लास्टिक थैलियों के रिसाईकल की सही व्यवस्था मौजूद नहीं हैं। यहीं कारण है ये थैलियां यत्र-तत्र बिखरी होती है और अक्सर नालियों को जाम कर देती है। हिमालय का ग्लेसियर आज पिघल रहा है तो इसकी सबसे बड़ी वजह आने वाले पर्यटको द्वारा प्लास्टिक सामग्रीयों को छोड़ा जाना एक बड़ा कारण माना गया है।

वहीं हम पेड़ों की बात करे तो यह न सिर्फ बारिश कराने में मददगार साबित होती है। बल्कि वायुमंडल में फैले जानलेवा जहरीली गैसों को अवशोषित कर हमारे लिए प्राण वायु बनाने का काम करती है। बावजूद बढ़ती जनसंख्या के कारण जंगलों और पेड़ों को धड्ल्ले से कांटा जा रहा है। और उसकी जगह मानव निर्मित कोंक्रिट के जंगल खड़े किए जा रहे है। अगर जंगल और वृक्ष लोगों के लिए इतना महत्वपूर्ण है तो भला इसे अत्यधिक मात्रा में क्यों कांटा जा रहा है? ऐसे सवाल अक्सर लोगों के मन में उठते होंगे। इस सवाल का जवाब अगर ढूंढा जाए तो हम पाएंगे एक जोड़े इंसान पैदा होते ही जैसे-जैसे वह बढ़ता जाता है उसे किस-किस चीजों की आवश्यकता पड़ती है।

सबसे पहला उसे सर के उपर छत चाहिए होता है जिसके लिए हैसियत अनुसार घर, फ्लैट, बंगला आदि का निर्माण किया जाता है। स्वास्थ संबंधी देखभाल के लिए क्लीनिक और अस्पतालों की जरूरत होती है। पढ़ाई के लिए स्कूल, काॅलेज, लाईब्रेरी, विश्ववि़द्यालय आदि की जरूरत पड़ती है। फिर जीविकोपार्जन के लिए दुकान, औद्योगिक इकाईया, कार्यालय इत्यादि की जरूरत होती है। भोजन के लिए खेत-खलिहान, गोदाम की आवश्यकता। व्यापार के लिए दुकान, माल, बाजार आदि की जरूरत। मनोरंजन के लिए होटल, मॉल, पार्क, थियेटर आदि की चाहत। देश व समाज की सुरक्षा के लिए सैन्य बलों एवं आयुद्ध सामग्रियों को रखने का स्थान। चलने के लिए सड़क, एक्सप्रेस वे, हवाई अड्डे, रेलवे, मेट्रो, पुल-पुलिया आदि। और मरने के बाद दो जग जमी। इन तमाम चीजों के लिए जगह की आवश्यकता होती है। जिसके लिए हम न चाह कर भी जंगलों और पेड़ों को कांटते जा रहे है। और ये जितने भी संसाधन है वहां किसी न किसी रूप में लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में पर्यावरण में बदलाव आना तो लाजमी ही है। इसलिए हम विनाश की आरे तेजी से बढ़ रहे है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि हमारी आबादी अन्य देशों के मुकाबले काफी तेजी से बढ़ रही है।

आज लोगों को वृक्ष, जंगल, जमीन और पानी बचाने की सख्त जरूरत है। जो गांव वाले तो थोड़ा बहुत यह कर भी रहे है लेकिन शहरी नवधनाढ्य इसके प्रति काफी उदासीन है। जो उनके व्यवहारों से देखा और समझा जा सकता है। उन्हें फल, सब्जिया खाना और साफ हवां का आनंद लेना तो पसंद है लेकिन 500 से हजारों गज के प्लोटों में दो-चार फलदार वृक्ष लगाना मंजूर नहीं। क्योंकि इससे किराया के साथ जमीन की कीमत का नुकसान जो होता है। आज लोग पेड़ लगाना तो दूर पेड़ बचाने में भी अपनी भागीदारी नहीं निभा पाते।

इन्हीं सब बाते को ध्यान में रखते हुए आज दिल्ली में एक ऐसी प्राईवेट संस्था है जो न सिर्फ पेड़ो को बचाने के लिए एक नई तकनीक अमेरिका से आयात की है बल्कि इसके माध्यम से प्लास्टिको को भी रिसाईकल कर इससे फैलने वाले प्रदुषण से भी निजात दिला सकती है। जालान प्लाईवूड प्राईवेट लि. के निदेशक सुबल जालान ने अपने इस उत्पाद के बारे में विशेष चर्चा में बताया कि यह प्लास्टिक से बनी पोलीवूड स्लीपर लकड़ी और लोहे के विकल्प के तौर इस्तेमाल किया जा सकता है। यह इतना मजबूत है कि इसका इस्तेमाल बड़े-बड़े निर्माण कार्य में लोहे और लकडियों का स्थान ले सकता हैं। छोटे-छोटे सामग्रियों में कुर्सि, टेबल, सोफा, मेज, दरवाजे, खिड़कियाँ, कप, प्लेट, बर्तन, खिलौने, जूते, आदि बन सकते है वही बड़े-बड़े निर्माण कार्य जैसे पूल-पूलिया, मेराईन पाईप, पैदल पार पथ, पटरियों के नीचे बीछने वाले स्लीपर, के साथ-साथ पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों में बांधों का निर्माण किया जा सकता है जहां पर आज भी लकड़ियों का इस्तेमाल होता चला आ रहा है।

जहां तक रही इसकी कीमत की बात तो यह लगभग लकड़ी से 2-3 गुना मंहगा होता है लेकिन लोहे से काफी सस्ता। वहीं इसके टिकाउ की बात करे तो लकड़ी के मुकाबले यह काफी मजबूत और लम्बे समय तक चलने वाला होता है। इसपर न तो पानी का असर होता है ना ही मौसम परिवर्तन का। इसमें लोहे की तरह जंग भी नहीं लगता जिससे बार-बार पेंट करने की जरूरत भी नहीं पड़ती। उन्होंने कहा कि इस उत्पाद का प्रशिक्षण यू.एस आर्मी कोर्प्स इंजीनियर द्वारा किया गया है। इसकी क्षमता 150 मिलीयन टन वजन तक हो सकती है। अमेरिका में इसका इस्तेमाल रेलवे ट्रैक के स्लीपर, अंडर ग्राउण्ड नेटवर्क, पैदल पार पथ, पुल-पुलिया और बिजली के खम्बे के साथ-साथ यूएस आर्मी द्वारा पहाड़ी इलाकों में बांध बनाने के काम में किया जा रहा हैं। सबसे बड़ी खासियत होती है कि इसे न तो आसानी से जलाया जा सकता है ना ही बम से उड़ाया जा पाएगा। 400 डिगरी तापमान तक सहने की क्षमता होती है।

जालान पोलीवूड ने जिस बहुराष्ट्रीय कम्पनी से यह तकनीक स्थानांतरण की है उसके कार्यालय अमेरिका और लंदन में मौजूद है। जालान पोलीवूड विगत कुछ वर्षो में अपना एक प्रोजेक्ट भारत में लगाने जा रही हैं ताकि इस तकनीक के माध्यम से प्लास्टिक को रिसाईकल कर इस उत्पाद को बनाया जाएगा। इस बहुआयामी प्रोजेक्ट से जहां लोगों को रोजगार मिलेगा वहीं प्लास्टिक के प्रदुषण और वृक्ष, जंगल और पानी जैसे बहुउपयोगी तत्वों से विरान होते इस धरती को भी बचाया जा सकेगा।

पर्यावरण दिवस को ध्यान में रखते हुए इस बहुउपयोगी प्रोजेक्ट की सफलता के लिए इसकी चर्चा ब्लॉग जगत में वांछनीय है। क्योंकि एक स्वस्थ समाज के निर्माण में ब्लॉग जगत सदैव सराहनीय कदम उठाता रहा है।

1 Comment

  • If pollywood usage is started in India, then we should be prepared for a new danger of pollywood waste – undestroyable waste.

    This can be a point of debate that what is more dangerous – Making of plastic OR cutting trees.

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